संभावना इस बात की है कि जैसे उनके 58 विधायकों ने अलग गुट बनाया है वैसे उनके 41 सांसदों में से 30 से ज्यादा सांसद अलग गुट बनाएं या सीधे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाएं। अगर ऐसा होता है तो भाजपा संसद के दोनों सदनों में अपने दम पर पूर्ण बहुमत के करीब तक पहुंच जाएगी। बहरहाल, अब ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के सामने अस्तित्व का संकट है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के मध्य में जिस बात की आशंका जताई जा रही थी वह सामने आने लगी है। हालांकि तब किसी को अंदाजा नहीं था कि इतनी मेहनत से बनाई गई ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस इतनी जल्दी बिखरने लगेगी। उन्होंने तिनका तिनका जोड़ कर जो पार्टी बनाई थी वह तिनका तिनका होकर बिखर जाएगी, इसका अंदाजा था और उसके कई तार्किक कारण भी हैं। परंतु यह काम इतनी जल्दी होगा, इसका अनुमान नहीं था। असल में यह पश्चिम बंगाल की राजनीतिक संस्कृति रही है कि सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टियां कमजोर होती हैं, उनमें बिखराव होता है और अवसरवादी लोग दूसरी जगह तलाशते हैं। फिर भी उसमें समय लगता है।
1977 में चुनाव हार कर सत्ता से बाहर होने के बाद भी कांग्रेस पार्टी कई दशक तक पश्चिम बंगाल में एक राजनीतिक शक्ति के तौर पर विद्यमान रही। ऐसे ही वाम मोर्चा भी 2011 में हार कर सत्ता से बाहर हुआ परंतु 2016 का चुनाव उसने पूरी ताकत से लड़ा था। कांग्रेस और वाम मोर्चा के बिखराव और एक राजनीतिक शक्ति के तौर पर बुरी तरह से कमजोर होने की परिघटना तृणमूल कांग्रेस के साथ भी दोहराई जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि वह प्रक्रिया बहुत जल्दी और बहुत तेज गति से दोहराई जा रही है।
तृणमूल कांग्रेस के तिनका तिनका होकर बिखरने का विश्लेषण करें उससे पहले कुछ तथ्यों को देखना जरूरी है। पार्टी की सुप्रीम लीडर ममता बनर्जी ने शुक्रवार, पांच जून को पार्टी नेताओं की बैठक बुलाई, जिसमें लोकसभा के तीन और राज्यसभा के सिर्फ दो सांसद शामिल हुए। ममता बनर्जी की पार्टी ने लोकसभा में 29 सीटें जीती थीं, जिसमें उसके एक सांसद का निधन हो गया है। यानी पार्टी के 28 लोकसभा सांसद हैं और 13 राज्यसभा सांसद हैं। इन 41 सांसदों में से सिर्फ पांच ममता बनर्जी की बैठक में शामिल हुए। इन पांच में से एक ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी भी थे। इसी तरह तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायक जीते हैं, जिनमें से 58 ने आधिकारिक रूप से बगावत कर दी है और विधानसभा अध्यक्ष से मिल कर अलग गुट की मान्यता हासिल भी कर ली है। स्पीकर ने बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मान्यता दी है। दो विधायक यात्रा पर हैं, जो इसी गुट के साथ हैं। इस तरह ममता बनर्जी के पास 20 विधायक बचते हैं। हालांकि इनमें 10 से 12 विधायक ऐसे हैं, जिनको बागी गुट लेना नहीं चाहता हैं।
बागी गुट में कई मुस्लिम विधायक भी हैं। इस गुट के सभी विधायक के साथ मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के बहुत अच्छे संबंध हैं और सीधा संवाद है। बहरहाल, पांच जून की ममता बनर्जी की बैठक में सिर्फ आठ विधायक पहुंचे। संभव है कि लोकसभा और राज्यसभा के जो पांच सांसद पहुंचे उनके अलावा कुछ और लोग पार्टी के प्रति निष्ठावान हों परंतु यह स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में सांसद और विधायक पार्टी का साथ छोड़ रहे हैं। सैकड़ों की संख्या में स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि पार्टी का साथ छोड़ रहे हैं और जिला व प्रखंड स्तर पर पार्टी संगठन से जुड़े लोग भी पाला बदल रहे हैं या कार्यालयों में ताला लगा कर गायब हो गए हैं।
धरातल पर तृणमूल कांग्रेस की वास्तविक तस्वीर देख कर लग रहा है कि पार्टी पर ममता बनर्जी की कमान लगभग पूरी तरह से समाप्त हो गई है। परंतु सवाल है कि क्या वे स्वंय इस स्थिति को स्वीकार कर रही हैं? ऐसा लग रहा है कि ममता बनर्जी अब भी वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर रही हैं। अगर वे कर रही होतीं तो पांच जून की बैठक में फिर से अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी का दूसरा सबसे बड़ा नेता नहीं घोषित करातीं। ममता बनर्जी ने कई पदों पर नेताओं को बदला परंतु अभिषेक बनर्जी को महासचिव बनाए रखा। साथ ही महासचिव के रूप से जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में उनकी मदद करने के लिए दो संयुक्त सचिव साथ जोड़े गए।
सवाल है कि क्या ममता बनर्जी नहीं समझ रही हैं कि पार्टी के अंदर और पश्चिम बंगाल की आम जनता के बीच भी अभिषेक बनर्जी को लेकर जो नाराजगी पैदा हुई, वह पार्टी की हार और बिखराव का कारण बनी है? ममता बनर्जी की पूरी राजनीतिक विरासत को अभिषेक की राजनीति ने कमजोर किया और इससे आम लोगों में नाराजगी पैदा हुई। इसी नाराजगी का प्रकटीकरण दक्षिणी सोनारपुर में देखने को मिला, जब आम लोगों ने अभिषेक बनर्जी के ऊपर हमला किया। तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने ही उनके ऊपर अंडे और गंदा पानी फेंका। उनकी कमीज फाड़ दी और धक्कामुक्की की। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में तो अभिषेक बनर्जी के प्रति नाराजगी नफरत की हद तक है। फिर भी ममता बनर्जी ने उन्हीं का नेतृत्व पार्टी के ऊपर आरोपित किया है। ध्यान रहे उनकी वजह से ही मुकुल रॉय और सुवेंदु अधिकारी जैसे नेताओं ने पार्टी छोड़ी थी।
इस तथ्य को भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि चार मई को आए चुनाव परिणामों के बाद तृणमूल कांग्रेस इतनी जल्दी नहीं बिखरती अगर ममता बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी को किनारे करके खुद पार्टी की कमान संभाली होती और नेताओं को प्रोत्साहित किया होता। इसकी बजाय उन्होंने छह मई को पार्टी के नए चुने विधायकों और अन्य नेताओं की बैठक बुलाई और उस बैठक में सभी नेताओं से अभिषेक का सम्मान कराया। ममता बनर्जी ने सभी नेताओं से कहा कि वे खड़े होकर अभिषेक का अभिनंदन करें क्योंकि तृणमूल को जितनी भी सीटें आई हैं वह अभिषेक के प्रयास से आई हैं। पार्टी की सुप्रीम लीडर ममता बनर्जी हैं, उनके नाम, काम और चेहरे पर चुनाव हुआ था लेकिन वे कह रही थीं कि अकेले अभिषेक ने मेहनत की इसलिए खड़े होकर उनका अभिनंदन करें। उस समय नेताओं ने ममता का मान रखा और खड़े होकर अभिनंदन कर दिया लेकिन उसी दिन यह सामूहिक भाव पैदा हो गया कि पार्टी से अलग होना है। इससे पहले विधायकों के अंदर निजी तौर पर नाराजगी थी लेकिन वे सामूहिक निर्णय करने की स्थिति में नहीं पहुंचे थे। छह मई के घटनाक्रम ने उनको सामूहिक रूप से निर्णय़ करने के लिए प्रेरित किया।
उस दिन की घटना ने पार्टी के विभाजन और बिखराव के लिए उत्प्रेरक का काम किया।
इससे पहले नेताओं की निजी नाराजगी के कई कारण थे। एक कारण तो यह था कि पार्टी के नेता ममता बनर्जी के प्रति निष्ठावान थे परंतु उनके ऊपर दबाव था कि वे अभिषेक को भी नेता स्वीकार करें, जबकि खुद अभिषेक बनर्जी सड़क पर उतर कर संघर्ष करने, मतदाताओं को पार्टी के साथ जोड़ने या कार्यकर्ताओं को मोटिवेट करने वाले नेता नहीं थे। उनमें पार्टी नेताओं को अपना भविष्य नहीं दिख रहा था। दूसरा कारण यह था कि ममता बनर्जी जैसी बड़ी और जमीनी नेता ने पार्टी का पूरा कामकाज एक एजेंसी आईपैक के हवाले कर दिया था। पार्टी के रोजमर्रा के कामकाज से लेकर, नीतियां तय करने, मुद्दे तय करने, उम्मीदवार तय करने से लेकर दूसरे तमाम काम यह एजेंसी करती थी। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भी इस एजेंसी के छोटे छोटे लोग निर्देश देते थे, जो उनको नागवार गुजरता था। तीसरा कारण यह था कि यह एजेंसी बुनियादी रूप से ममता बनर्जी के लिए नहीं, बल्कि अभिषेक बनर्जी के लिए काम करती थी।
इसका काम अभिषेक को भविष्य के नेता के तौर पर स्थापित करना था। चौथा कारण पार्टी की तुष्टिकरण की नीतियां थीं। तृणमूल कांग्रेस के बहुत सारे नेता और कार्यकर्ता भी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतियों से नाराज थे। उनको लग रहा था कि हिंदुओं को दोयम दर्जे के नागरिक की तरह ट्रीट किया जा रहा है। पार्टी नेताओं को जनता से फीडबैक मिल रही थी कि बंगाली हिंदू भी इस नीति से परेशान होकर इस बार भाजपा को वोट देने जा रहा है। लेकिन तृणमूल के नेता यह फीडबैक ऊपर तक पहुंचा नहीं पाए। तभी जब पार्टी हारी तो सबने अपनी भड़ास निकाली शुरू कर दी। पांचवां कारण सरकार से अलग समानांतर व्यवस्था बनाने का था, जिसमें कुछ चुनिंदा लोग यह तक तय करते थे कि राज्य के लोग क्या करेंगे और कैसे जिएंगे। इसमें अतिक्रमण को बढ़ावा देना, रंगदारी वसूलना सब शामिल था। इससे आम जनता में भी बड़ा गुस्सा था। छठा कारण हिंसा बढ़ती जा रही है। सरकार के संरक्षण में मुस्लिम समाज के गुंडों की मनमानी से लोग बुरी तरह नाराज थे और इसमें पार्टी के लोग भी थे। एक तात्कालिक कारण संदेशखाली से लेकर आरजी कर और दुर्गापुर में महिलाओं पर हुए अत्याचार का भी था, जिसने निर्णायक रूप से महिलाओं को पार्टी से अलग किया।
अब सवाल है कि क्या ममता बनर्जी और उनकी पार्टी फिर से वापसी कर सकते हैं? इसकी संभावना नगण्य है। ऐसा इसलिए है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस का गठन किसी विचारधारा के आधार पर नहीं हुआ था और 2011 में हुई उसकी जीत कोई वैचारिक बदलाव वाली जीत नहीं थी। ममता बनर्जी ने कांग्रेस के लोगों को ही तोड़ कर अपनी पार्टी बनाई थी और वाम मोर्चा के साढ़े तीन दशक के शासन के खिलाफ लोगों ने उनकी पार्टी को वोट दे दिया था। चुनाव जीतने के बाद ममता बनर्जी ने शासन का कोई वैकल्पिक विचार प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि लेफ्ट शासन के ढांचे को हूबहू अपना लिया। शासन का तरीका भी वहीं था और राजनीतिक संस्कृति भी वही थी। भाजपा इन दोनों से अलग एक वैकल्पिक व्यवस्था के साथ आई है।
उसने सुनिश्चित किया है कि राज्य का बहुसंख्यक दोयम दर्जे का नागरिक नहीं होगा। उसने पहले महीने में ही अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण समाप्त कर दिया है और कानून का राज बहाल किया है। दूसरी ओर ममता बनर्जी अब भी पुराने ढर्रे पर चलने की कोशिश कर रही हैं। इसलिए वापसी मुश्किल है। ज्यादा संभावना इस बात की है कि जैसे उनके 58 विधायकों ने अलग गुट बनाया है वैसे उनके 41 सांसदों में से 30 से ज्यादा सांसद अलग गुट बनाएं या सीधे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाएं। अगर ऐसा होता है तो भाजपा संसद के दोनों सदनों में अपने दम पर पूर्ण बहुमत के करीब तक पहुंच जाएगी। बहरहाल, अब ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के सामने अस्तित्व का संकट है। अस्तित्व का यह संकट पार्टी संगठन और लोकप्रिय वोट दोनों के मामलों में दिख रहा है। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
