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क्या कर देंगे घुसपैठियों से मुक्त बंगाल?

तो बंगाल भगवा की सुनामी में है इसलिए उम्मीद करनी चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह घुसपैठियों से पश्चिम बंगाल को मुक्त कर देंगे? ‘मलेच्छ’ राज्य से बाहर निकाल दिए जाएंगे, बांग्लादेश की तरफ से घुसपैठ बंद हो जाएगी। बंगाल में हिंदुओं का राजनीतिक व सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित होगा, मुसलमानों की गुंडागर्दी खत्म होगी! भाजपा नेताओं की मानें तो यह सब कुछ होगा।  इन्हीं मुद्दों पर भाजपा ने बंगाल का चुनाव लड़ा था। बंगाल में गरीबी है, औद्योगिक विकास ठप्प हो गया है, पलायन हो रहा है, प्रति व्यक्ति आय कम होती जा रही है, नौकरी कम है ये सब ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर चुनाव लड़ा जा सकता था।

लेकिन भाजपा ने चुनाव इस वायदे में ल़डा कि बंगाल का हिंदू गौरव बहाल करेंगे। यह प्रचारित किया गया कि बंगाल में हिंदू सुरक्षित नहीं हैं। उनकी महिलाएं तो बिल्कुल ही सुरक्षित नहीं हैं। यह प्रचारित किया गया कि मुसलमानों की गुंडागर्दी के आगे हिंदुओं की नहीं चलती है। कह सकते हैं कि यह प्रचार कई बरसों से चल रहा था, जिसका नतीजा अब जाकर निकला है।

ममता बनर्जी भी 1990 के दशक से लेफट् के खिलाफ ऐसे ही मुद्दों पर लड़ती थीं। उनके सामने भी लेफ्ट की गुंडागर्दी से मुकाबले की चुनौती थी। पार्टी बनाने के बाद ममता ने अपना दूसरा चुनाव 2006 में भाजपा के साथ मिल कर लड़ा था। तब उनका और भाजपा का एक ही एजेंडा था। बंगाल को लेफ्ट की गुंडागर्दी से मुक्ति दिलाना। उस समय तो कामयाबी नहीं मिली लेकिन पांच साल के बाद ममता कामयाब हो गईं। उन्होंने लेफ्ट की गुंडागर्दी समाप्त की लेकिन उसके बाद तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी शुरू हो गई। सब कुछ वैसे ही चलता रहा। य़हां तक कि कई जगह तो चेहरे भी नहीं बदले। जो चेहरे लेफ्ट के शासन में घुसपैठ और गुंडागर्दी का पर्याय थे वे ममता बनर्जी के शासन में भी बने रहे।

पिछले कुछ समय से ऐसे अनेक लोग अब भारतीय जनता पार्टी के चेहरे हैं। तभी अब जब ममता बनर्जी की पार्टी की गुंडागर्दी से परेशान होकर लोगों ने भाजपा को जिताया है तब भी यह आशंका है कि चेहरे बदलेंगे या पहले जैसा ही सब कुछ चलता रहेगा? यह भी सवाल है कि पश्चिम बंगाल को क्या भारतीय जनता पार्टी घुसपैठ से मुक्ति दिला देगी? क्या सीमा पार से होने वाली घुसपैठ पूरी तरह से बंद हो जाएगी? क्या सीमा के आरपार चलने वाली इंसानों व मवेशियों की तस्करी बंद हो जाएगी? क्या राज्य की 27 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी को भाजपा की सरकार इस तरह से पालतू बना देगी, जिससे हिंदुओं का वर्चस्व स्थापित हो जाए?

ध्यान रहे बंगाल का इतिहास विभाजन का रहा है और इतिहास से सबक नहीं लेने वाले इतिहास के कूड़ेदान में जाते हैं। अंग्रेजों ने धर्म के आधार पर 1905 में बंगाल का विभाजन किया था। उस विभाजन के खिलाफ बंगाल में बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ। ‘वंदे मातरम्’ उस आंदोलन का राष्ट्रीय नारा था। बंकिमचंद्र चटोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम’ को संन्यासी विद्रोह पर आधारित अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया था लेकिन उसके दो दशक बाद वह बंगाल विभाजन के विरोध का गीत बना। क्या भाजपा के नेता इसके महत्व को समझते हैं या ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्र गान जैसा महत्व देने का प्रशासनिक फैसला करके समझ लिया कि बहुत बड़ा काम हो गया!

यह भी याद रखने की जरुरत है कि धर्म के आधार पर विभाजन को हिंदू और मुस्लिम दोनों ने खारिज किया था और दोनों तब मिल कर लड़े थे। समकालीन इतिहास में भी यह अनोखा मामला है कि आजादी के समय जब विभाजन हो गया और पूर्वी बंगाल को पाकिस्तान में मिला दिया गया तो ज्यादा बड़ी आबादी पूर्वी बंगाल के बांग्ला बोलने वालों की थी लेकिन शासन पंजाबी बोलने वाले मुसलमानों के हाथ में थे। यह मामला अनोखा इसलिए है क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ कि बहुसंख्यक आबादी ने अल्पसंख्यक आबादी से यानी बांग्ला भाषी हिंदू और मुसलमानों ने पंजाबी हिंदू और मुसलमानों से अलग होने की मांग की। उसकी लड़ाई लड़ी और अंत में बांग्लादेश का गठन हुआ। सो, धर्म से ऊपर नस्ल और भाषा, संस्कृति की पहचान भी बहुत मजबूत रही है।

बहरहाल, घुसपैठिया और मुसलमान दोनों भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनाव का मुद्दा रहे हैं। पूर्वी राज्यों और पूर्वोत्तर के सीमावर्ती राज्यों को छोड़िए, राजधानी दिल्ली और उससे सटे हरियाणा व उत्तर प्रदेश के एनसीआर के इलाकों में भी भाजपा घुसपैठियों को नाम पर वोट मांगती है। लेकिन सरकार में आने के बाद घुसपैठियों की पहचान करने और उन्हें देश से निकालने के मामले में उसका ट्रैक रिकॉर्ड बहुत खराब है। असम में पिछले 10 साल से डबल इंजन की सरकार है। यानी केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार है। इसके बावजूद न तो असम के घुसपैठियों की पहचान की गई है और न उनको निकाला गया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा हिंदुओं को प्रेरित कर रहे थे कि मियां मुसलमान को प्रताड़ित करो। उसके रिक्शे पर बैठो और अगर वह पांच रुपए मांगे तो उसे चार रुपए दो। सोचें, सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाने की बजाय हिंदुओं को क्रूरता करना सीखा रही है! एक तरफ वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वधर्म समभाव और दूसरी ओर यह क्रूरता कि रिक्शेवाला पांच रुपए मांगे तो चार रुपए दो। तभी असम और पश्चिम बंगाल को लेकर संदेह ही है।

दिखावे के लिए हो सकता है कि भाजपा की सरकार बनते ही सीमा पर बचे हुए इलाकों में बाड़ लगाने के लिए जमीन देने का फैसला हो जाए और बाड़ लग भी जाए। लेकिन बाड़ लगाना घुसपैठ रोकने का रामबाण तरीका नहीं है। आखिर बांग्लादेश से लगती चार हजार किलोमीटर की सीमा में पश्चिम बंगाल में 22 सौ किलोमीटर की सीमा है, जिसमें से डेढ़ हजार किलोमीटर में बाड़ लगा दी गई है। फिर भी घुसपैठ नहीं रूकी है। केंद्र में 12 साल से भाजपा की सरकार होने के बावजूद न घुसपैठ रूकी है और घुसपैठ का रोना बंद हुआ है। इसी तरह क्या भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल में सरकार बना कर घुसपैठ के मुद्दे को भूल जाएगी?

यह मुद्दा रहेगा तभी तो देश भर में इस मुद्दे पर चुनाव लड़ा जाएगा। घुसपैठ के अलावा प्रचार के अन्य मुद्दों में तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी, पाड़ा क्लब के जरिए समानांतर सरकार चलाने की व्यवस्था, टोलाबाजी और कटमनी वसूलना आदि शामिल है। भाजपा की सरकार इस पर भी रोक लगा देगी इसमें संदेह है। पश्चिम बंगाल में राजनीति का पूरी व्यवस्था इसी पर टिकी हुई है। जो सरकार में आता है वह इस व्यवस्था को अपना लेता है। बंगाल में चुनाव के दौरान मुस्लिम विरोध की भावना को भड़काने के लिए दो चार कहानियां एक समान रूप से सुनाई जाती थीं। दिल्ली में भी वह कहानी सुनाई गई।

इसमें एक कहानी तो यह है कि अगर पुलिस दो लोगों को ट्रैफिक रूल तोड़ने के मामले में रोकती है तो हिंदू को चालान करेगी और मुस्लिम को जाने देगी। इसी में यह भी कहा जाता था कि जाली वाली टोपी ही हेलमेट का काम करती है। दूसरी कहानी यह है कि कोलकाता के समृद्ध इलाकों में भी मुसलमानों ने फुटपाथ पर कब्जा कर लिया है अच्छी व बड़ी दुकानों के सामने अपना खोखा लगा लिया है। इस तरह का प्रचार दिल्ली में किया जाता था। लेकिन दिल्ली की पुलिस तो 12 साल से भाजपा की केंद्र सरकार के अधीन है फिर भी कुछ नहीं बदला।

न तो जाली वाली टोपी में कमी आई और न सड़क पर लगे खोखे कम हुए। सो, यह मानना बहुत मुश्किल है कि भाजपा ने बंगाल में जिन मुद्दों पर चुनाव लड़ कर बहुमत हासिल किया है उन मुद्दों का कोई समाधान उसके पास है। वह एक के बाद एक राज्य तो जीतती जा रही है लेकिन उसे पता ही नहीं है कि इसका क्या करना है। हर जगह सरकार बनाने को ही भाजपा ने अपनी उपलब्धि बना लिया है। ऐसा लग रह है कि भाजपा जब तक केंद्र के साथ साथ हर राज्य में सरकार नहीं बन जाती है तब तक भाजपा अपना कोई काम नहीं करेगी!

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