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घुसपैठ के बहाने ध्रुवीकरण का प्रयास

बिहार में भाजपा ने गैर यादव पिछड़ा नेता के रूप में सम्राट चौधरी को आगे किया है और सवर्ण चेहरे के तौर पर विजय सिन्हा को बढ़ाया है। दो बड़े सवर्ण चेहरे केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं और दो दलित भी केंद्र में कैबिनेट मंत्री हैं। सो, बिहार में अति पिछड़ा, सवर्ण और दलित का मजबूत समीकरण एनडीए के पास है। मगर बावजूद इस सबके भाजपा  ध्रुवीकरण के प्रयासों से बाज नहीं आ रही है।

भाजपा नेताओं को पता है कि ध्रुवीकरण की राजनीति बिहार में काम नहीं करती है। अगर काम करती तो भाजपा 2015 में ही चुनाव जीत जाती। उस समय हिंदू, मुस्लिम और भारत, पाकिस्तान करने के बावजूद भाजपा का गठबंधन हार गया था क्योंकि नीतीश उसके साथ नहीं थे। इस बार नीतीश साथ हैं फिर भी भाजपा मंदिर, घुसपैठ, छठ, मोदी किसी भी बहाने ध्रुवीकरण के प्रयास कर रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी प्रचार में उतारा गया। हैरानी नहीं हुई, जो उनको सीवान भेजा गया, जहां आतंक का पर्याय रहे शहाबुद्दीन का बेटा ओसामा शहाब राजद की टिकट से लड़ रहा है। वहां योगी ने ओसामा के नाम को लेकर तंज किया और कहा कि जैसा नाम है वैसा ही काम है।

खुद नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी का नाम लिए बगैर सवाल उठाया कि उनको विदेश जाने की फुरसत मिलती है लेकिन पांच सौ साल की प्रतीक्षा के बाद बने मंदिर में जाने की फुरसत नहीं होती है। ध्यान रहे राहुल गांधी अभी तक अयोध्या के राम मंदिर में नहीं गए हैं। अमित शाह तो दो कदम आगे बढ़ कर हिंदू, मुस्लिम करने में लगे हैं। उन्होंने सीवान में कहा कि सौ शहाबुद्दीन भी आ जाएं तो वे लोगों को नहीं डरा सकते हैं। इसी तरह उन्होंने एक दूसरी जगह कहा कि सौ खिलजी भी आ जाएं तो नालंदा को नुकसान नहीं पहुंचा सकते हैं। मोदी और शाह दोनों अपनी सभाओं में बार बार घुसपैठ का मुद्दा उठा रहे हैं और वादा कर रहे हैं कि एक एक घुसपैठिए को बाहर निकालेंगे।

हकीकत यह है कि बिहार में घुसपैठिए वाला गुब्बारा फूट चुका है। विपक्ष पूछ रहा है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से कितने घुसपैठियों की पहचान हुई और कितनों को बाहर निकाला गया तो भाजपा उसका जवाब नहीं दे पा रही है। फिर भी घुसपैठियों को निकालने का दावा किया जा रहा है। इसका असल मकसद पश्चिम बंगाल और असम में घुसपैठ के मुद्दे को भुनाना है। बंगाल में तो एसआईआर की प्रक्रिया शुरू हो गई है। वहां अगर घुसपैठिए मिलते हैं तो यह चुनावी मुद्दा बनेगा। असम में एनआरसी के बहाने एसआईआर रोक दी गई है। इसलिए वहां बिना आंकड़े के ही घुसपैठ का मुद्दा बनाया जाएगा। ध्यान रहे असम में विपक्ष का आरोप है कि पिछले 10 साल में 30 से भी कम घुसपैठियों को निकाला गया है। फिर भी इन राज्यों घुसपैठ बड़ा मुद्दा होगा। क्योंकि कम से कम धारणा के स्तर पर यह माना जाता है कि बांग्लादेश से घुसपैठ लगातार हारी है। हालांकि उसमें भी सवाल केंद्र सरकार पर ही उठता है कि जब सीमा सुरक्षा उसके जिम्मे है तो घुसपैठ क्यों नहीं रूक रही है? अमित शाह का गृह मंत्रालय ही सीमा सुरक्षा संभालता है। लेकिन चुनाव राजनीति में तार्किक बातों की गुंजाइश कम ही रहती है।

सो, भाजपा के नेता बिहार में ध्रुवीकरण के लिए घुसपैठ के मुद्दे का जिक्र कर रहे हैं। अगर बिहार में कामयाबी मिलती है तो पश्चिम बंगाल में दावा किया जाएगा कि बिहार के लोगों ने घुसपैठियों को निकालने का जनादेश दिया है। इसलिए पश्चिम बंगाल और असम को भी ऐसा ही जनादेश देना चाहिए। घुसपैठियों को देश के संसाधनों का लाभ नहीं देने का नैरेटिव बिहार के बाद इन दो राज्यों में पहुंचाया जाएगा।

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