बिहार के चुनाव में नीतीश-मोदी का तुरूप इक्का ‘जंगल राज’ का जुमला है1 प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ तीनों के भाषण सुनें तो लगेगा चुनाव 2005 में है। इसलिए क्योंकि बीस साल बाद भी लालू यादव और उनका राज ही एनडीए का चुनावी राग है। मतलब “लालू आए तो जंगल राज लौट आएगा।” जिन लोगों ने इस नारे पर 2005 में तालियां बजाई थीं वे अब दिल्ली, सूरत, मुंबई, में मज़दूर हैं और रील में चुनाव देख रहे हैं। इन्होंने नीतीश कुमार के 20 साला और मोदी के 11 साला शासन की डबल इंजन सरकार देखी। इस छठ में भी रेल की धकमपेल से बिहार पहुंचे लेकिन बिहार पहुंच कर सुना – जंगल राज।
मतलब बिहार की जनता के लिए मोदी, शाह, योगी के पास जंगल राज. वंश राज, तुष्टिकरण और डबल इंजन के पुराने कैसेट का एकमेव सहारा। ऐसा एक भी नया जुमला नहीं है जिससे मोदी राज में लोगों की भलाई, उपलब्धि याकि अच्छे दिन आने का कोई प्रतिनिधि वाक्य हो। जबकि बिहार में लोगों की प्रति व्यक्ति आय का आंक़डा पैंदे का है, बेरोज़गारी राष्ट्रीय औसत से ऊपर है और स्कूल, अस्पताल अव्यवस्थाओं के मारे तथा गंगा गंदगी के रिकार्ड बनाए हुए है। बावजूद इस सबके इस चुनाव में भी छठ के त्योहार का हल्ला बना कर एनडीए को बिहारियों के वोटों की उम्मीद है।
सो, बिहार चुनाव का लब्बोलुआब जंगल राज के बुरे सपने देखिए, डरिए और वोट दीजिए। लोगों को भयाकुल बनाने याकि डर में डुबाना ही डबल इंजन का तेल है। अपना मानना है कि लोगों को सरकारी नकदी बंटवाने के बाद डर पैदा करने की कोशिश जिस अनुपात में है उससे भाजपा कुछ परेशान समझ आती है। मामूली बात नहीं है कि मोदी, शाह के साथ योगी आदित्यनाथ भी हिंदू-मुस्लिम राजनीति के इलाकों में भाषण दे रहे हैं। खुद अमित शाह ने घुसपैठियों के जुमले को तुल दिया हुआ है।
इसलिए बिहार के चुनाव नतीजों में भाजपा को यदि हल्का भी झटका लगा तो आगे के उत्तर प्रदेश और बंगाल के चुनाव में घुसपैठियां तथा हिंदू बनाम मुस्लिम धुव्रीकरण का हल्ला कानफोडू होगा। उस नाते बिहार में जंगल राज, सरकार के जरिए नकदी और रेवडियों के वितरण याकि भय और रेवड़ी के नुस्खे की परीक्षा है। प्रधानमंत्री मोदी का करिश्मा वोट खिंचाऊ नहीं रहा। मोदी अपने चेहरे की बजाय लालू यादव के चेहरे को उभार जंगल राज के भय से वोट बटोरने की रणनीति में है। साथ ही योगी आदित्यनाथ का भरपूर उपयोग भी है। मतलब योगी अब अपरिहार्य हैं। वे उत्तर प्रदेश में बने रहेंगे और उनकी ही हिंदू-मुस्लिम बुलडोजर राजनीति आगे के चुनावों में काम आएगी।
