इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने डोनाल्ड ट्रंप को उल्लू बनाया, तो प्रधानमंत्री मोदी को भी! उन्होंने ट्रंप के जरिए अमेरिका को बुरी तरह फंसाया! वही भारत को भी फंसाया! अब भारत और नरेंद्र मोदी भले खाड़ी-अरब देशों से लेकर मलेशिया तक के नेताओं को चाहे जितने फोन करें, कोई आश्वस्त नहीं होगा। कौन भूलेगा इस सत्य को कि ईरान पर कहर की रात से ठीक पहले नेतन्याहू ने प्रधानमंत्री मोदी को न्योता दिया। उनको लालच दिया कि आओ मित्र, आपको इज़राइल की संसद सुनना चाहती है। इज़राइल आपको राष्ट्रीय सम्मान देना चाहता है! नरेंद्र मोदी दौड़े-दौड़े गए। दोनों बंधु गले लगे। मोदीजी के भाषण लेखकों ने जॉर्डन घाटी-सिंधु घाटी के सभ्यतागत रिश्तों का वह नैरेटिव बनाया, मानो नेतन्याहू के ग्रेटर इज़राइल (उसमें आज का जॉर्डन भी है) को हरी झंडी बताने के लिए नरेंद्र मोदी ही सर्वाधिक उपयुक्त हैं!
ऐसी कूटनीति, ऐसी चालाकी नेतन्याहू ने ट्रंप के साथ भी की। सो, तीन भाई, तीन मित्रों की तिकड़ी! नेतन्याहू, ट्रंप और नरेंद्र मोदी का वह एक त्रिकोण, जिसमें दो कोण (ट्रंप+मोदी) अपने को विश्व गुरु मानते हैं, लेकिन दोनों को फैलाने वाला यानी सूत्रधार, त्रिकोण रचने वाला कुशाग्र नेता नेतन्याहू!
सोचें, इन तीन के बेसिक इंस्टिंक्ट के फर्क पर। क्या फर्क है? नेतन्याहू जहां यहूदी बुद्धि के समुच्चय, वहीं ट्रंप और मोदी खांटी व्यापारी। यह मामूली बात नहीं है। ट्रंप कैसे जीते, मोदी कैसे जीते, दोनों जनता को, देश की राजनीति को, उसके विकास को कैसे हैंडल करते हैं? तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हें अच्छे दिन दूंगा। तुम मुझे वोट दो, मैं राशन दूंगा, नोट दूंगा। तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हें सुरक्षा दूंगा। पूरी नस्ल, पूरा देश, कौम सब सौदे में कन्वर्ट। तुम मेरे तो मैं तुम्हारा, और नहीं तो मेरे दुश्मन!
इसलिए मैं यहूदी बुद्धि का कायल हूँ। भले यहूदियों की गुजर सूद-पैसे से हुई, लेकिन उनका इतिहास में जीवित बचना बुद्धि-बल से था। इसलिए ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, सृजन, संग्रह, आविष्कार, शिक्षा, सबकी बुद्धि, धरोहर का प्रतीक है इज़राइल। यहूदी अमेरिका को चलाते-नचाते हुए तो यूरोप को, पृथ्वी के दिमाग को भी। जबकि इसके विरोधी, प्रतिद्वंदी देशों का पिछले अस्सी वर्षों का क्या रिकॉर्ड है? वैसे ही लोभी-भूखे व्यापारियों सा रिकॉर्ड, जैसे भारत के अंबानी-अडानी हैं!
अडानी-अंबानी की अमीरी, शान और खाड़ी के शेखों-अरब नवाबों में विशेष फर्क नहीं है। मतलब संसाधनों पर कब्जा करो, व्यापार बनाओ और खरबपति बनने की चमचमाहट बनाओ! सोचें, वह विकास आज धुएं से कैसा घिरा है। खाड़ी के अंबानियों-अडानियों की जान कैसी सूखी हुई है। खाड़ी के शेखों-बादशाहों को सिर्फ धंधा, अमीरी बचाने की चिंता है। और धर्म, अल अक्सा मस्जिद, कौम, सभ्यता, स्वाभिमान, सब ठेंगे में! कैसी भयावह तस्वीर है! पर ऐसा अंधविश्वासी बुर्कों में बंधे मनुष्यों का हस्र लगातार होता आया है। सोचें, मौजूदा संकट में कथित महाशक्ति चीन (व्यापारी) और रूस (निरंकुशताओं का डिब्बाबंद दिमाग) की भाव-भंगिमा और व्यवहार पर भी!
