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मोदी का मिशन बिहार पूरा हुआ

बिहार में नीतीश कुमार का शासन नरेंद्र मोदी के लिए दुखती रग की तरह था। आखिर नीतीश एनडीए के इकलौते नेता थे, जिन्होंने 2013 में मोदी को एनडीए की चुनाव समिति का प्रमुख और बाद में प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाए जाने का विरोध करते हुए एनडीए छोड़ा था। इसके बाद वे अकेले चुनाव लड़े और मोदी ने रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी से तालमेल करके चुनाव लड़ा। उस चुनाव में भाजपा ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। उसने अकेले 243 सीटें मिलीं और एनडीए ने 32 सीटें जीतीं। नीतीश कुमार की पार्टी दो सीटों पर सिमट गई। तो मोदी को लगा कि उन्होंने नीतीश को हैसियत दिखा दी। नीतीश को भी हकीकत का अहसास हुआ तो उन्होंने 2015 के विधानसभा चुनाव में अपने धुर विरोधी लालू प्रसाद और कांग्रेस से तालमेल कर लिया।

नवंबर 2015 से पहले होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले जुलाई के महीने में नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री बिहार के मुजफ्फरपुर में एक सभा करने पहुंचे थे, जहां उन्होंने नीतीश कुमार के डीएनए पर सवाल उठाया। प्रधानमंत्री ने कहा कि नीतीश के डीएनए में गड़बड़ी है। इसके चार महीने के बाद चुनाव में नीतीश और लालू की जोड़ी ने भाजपा और उसके सहयोगियों को बुरी तरह से हराया। मोदी प्रधानमंत्री थे और अमित शाह राष्ट्रीय अध्यक्ष और भाजपा गठबंधन को बिहार की 243 में से सिर्फ 59 सीटें मिलीं। इस हार ने मोदी और शाह को मजबूर किया कि वे नीतीश के साथ फिर से तालमेल करें। झक्ख मार कर उन्हें नीतीश को एनडीए में लाना पड़ा और मुख्यमंत्री बनाना पड़ा।

मोदी और शाह की नीतीश के प्रति कैसी कुंठा या खुन्नस थी यह 2020 के चुनाव में फिर दिखा। डीएनए पर सवाल उठाने के बाद वाले चुनाव में भाजपा ने नीतीश को निपटाने का पूरा प्लान बनाया और चिराग पासवान को गठबंधन से अलग चुनाव लड़वाया। चिराग को सारे संसाधन भाजपा ने दिए यहां तक कि ज्यादातर उम्मीदवार भी भाजपा ने ही दिए, जो बाद में फिर भाजपा में लौट आए। चिराग को चुनाव नहीं जीतना था, बल्कि नीतीश को हरवाना था। इसमें काफी हद तक कामयाबी मिली। लेकिन नतीजे भाजपा के मनमाफिक नहीं आए। नीतीश तो 43 ही सीट जीत पाए लेकिन दूसरे ओर राजद 75 सीट जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बन गई। महागठबंधन को 110 सीटें मिल गईं। सो, फिर मजबूरी हो गई कि नीतीश को सीएम बनाया जाए। हालांकि इसके बावजूद भाजपा को हैसियत दिखाने के लिए नीतीश एक बार फिर राजद के साथ जाकर सरकार बनाई। उन्होंने विपक्षी पार्टियों को एकजुट किया और ‘इंडिया’ ब्लॉक का गठन भी कराया। फिर मजबूरी में भाजपा को नीतीश कुमार की वापसी करानी पड़ी और बराबर सीटें देकर समझौता करना पड़ा।

भाजपा को नीतीश का शुक्रगुजार होना चाहिए था कि उनकी वजह से बिहार में एनडीए को लोकसभा में 30 सीटें मिलीं और विधानसभा में 202 सीटों का प्रचंड बहुमत मिला। लेकिन 2013 से ही नीतीश को खत्म करने की ग्रंथि पाले भाजपा नेताओं ने शुक्रगुजार होने की बजाय पहला मौका मिलते ही उनको निपटा दिया। इस बार विधानसभा चुनाव में नीतीश की पार्टी 85 सीटों पर जीती लेकिन विधानसभा का गणित ऐसा बन गया कि नीतीश के लिए दूसरे पाले में जाकर सरकार बनाना मुश्किल हो गया। दूसरे, भारत की राजनीति के सबसे अधिक कैलकुलेटिंग माइंड वाले नेता नीतीश कुमार की मानसिक अवस्था बिगड़ गई। वे भूलने की बीमारी से ग्रस्त हो गए। तभी भाजपा ने उन पर अंतिम वार किया और निपटा दिया। नीतीश को और उनकी राजनीति को समाप्त करने का प्रयास पिछले 13 साल से किया जा रहा था। कामयाबी तब मिली, जब उनकी मानसिक दशा बिगड़ी। भाजपा ने उनके लाचार होने का फायदा उठा कर बेहद अपमानजनक तरीके से उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाने का बंदोबस्त किया और अपना मुख्यमंत्री बनाने की व्यवस्था की।

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