Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

यह भगवा सनातन का नहीं, मोदी-संघ-सत्ता का है!

1925 का दशहरा और स्थान नागपुर। तब लोगों की निगाहों में मोहिते बाड़ा का खंडहर भूतहा था। पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के पास और कोई जगह नहीं थी। सो, वहीं भगवा झंडा खड़ा कर उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नामक संगठन की पहली शाखा लगाई। वह अभिशप्त जगह थी। लेकिन न वहां के भाऊजी कावरे को भूतों का भय था और न उजड़े आंगन के श्राप पर विश्वास। तभी 20-25 लड़कों की उस पहली शाखा ने सनातन धर्म के गेरूआ ध्वज  के मायने समझने की शायद जरूरत न समझी।  संघ मुखपत्र ‘ऑर्गेनाइजर’ ने संघ के सौ सालों के बखान में लिखा है कि बाद में संघ की नियमित शाखा की खबर अंग्रेजों को हुई तो उन्होंने हेडगेवार के दोस्त और शाखा में आने वाले बच्चों का ख्याल करने वाले राजसाहेब लक्ष्मणराव भोसले को तलब किया। उनका जवाब था कि मेरे यहां अपने पूर्वज शिवाजी का झंडा फहराता है। वही झंडा ये भी शाखा में लगाते हैं और शिवाजी व समर्थ रामदास की वंदना करते हैं। मैं इसे गलत नहीं मानता। ऐसा ही मैं भी करता हूं और ये भी करते हैं।

पर न अंग्रेज ने पूछा, न भोसले ने बताया, न पशु चिकित्सा के डॉ. हेडगेवार ने अपने स्वयंसेवकों के लिए लिखा कि जिस झ़डे के आगे वंदना कर रहे हैं, उसमें मातृभूमि से पहले सनातन धर्म, हिंदवी स्वराज है। हालांकि मैंने अंग्रेज-स्थापित कांग्रेस के शताब्दी वर्ष का भी अनुभव किया है, उसे पढ़ा-समझा है तो संघ को भी जाना समझा है पर कभी संघ के  भगवा की परिभाषा नहीं पढ़ी। संघ के किसी विचारक या पुस्तक में भगवा रंग, भगवा झंडे की व्याख्या नहीं देखी। जैसे कि नेहरू के प्रिय राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने संविधान सभा में बताई और कांग्रेस ने उसे माना कि, “भगवा त्याग और निःस्वार्थता का प्रतीक है (“The saffron colour denotes renunciation and disinterestedness.”)। राजनेताओं को निजी लाभ से ऊपर उठना चाहिए।

संभव है हेडगेवार, गोलवलकर ने मोटामोटी त्याग और निःस्वार्थता की सनातन जीवन पद्धति से जीवन जिया, लेकिन उन्होंने अपने स्वयंसेवकों के दिल-दिमाग में सनातन का अर्थ पैठाने के बजाय मात्र इतना ज्ञान दिया- लाठी और गणवेश धारण करो, गीत गाओ, कबड्डी खेलो और बस करते रहो इस गान के साथ पथ संचलन, “क़दम-क़दम बढ़ाए जा, तू क़ौम को मूर्ख-डफर (बकौल सीताराम गोयल) बनाए जा!”

क्या यह सौ वर्षों के क्षण का सारतत्व नहीं है?

जो हो, 1925 के उस अभिशप्त-भूतहा मोहिते बाड़े के भूतों का ही शायद कोई श्राप है, जो संघ के बने स्यवंसेवक नरेंद्र मोदी-अमित शाह का बनाया आज वह अभिशप्त भारत है, जो न शिवाजी का हिंदवी स्वराज लिए हुए है और न सनातन धर्म की पावनता लिए हुए!

क्या होती है पावनता, पवित्रता? और क्यों यह सवाल?

इसलिए कि पांच मई 2026 की सुबह मैंने भारत के इकोसिस्टम, अखबारों की ये बैनर हेडलाइंस देखी कि बंगाल हुआ भगवामय! या भगवा की आई सुनामी तो मन में सवाल उठा यह कौन सा भगवा? किसका भगवा? कैसा भगवा?

आगे बढ़ें, उससे पहले जानें कि वेद, उपनिषद, सनातन के शास्त्रीय ग्रंथों में और मंदिर के गेरुआ ध्वज, गेरुआ वस्त्र से क्या अर्थ है। भगवा नया शब्द है। उन लोगों द्वारा गढ़ा हुआ है, जो धर्म को बेचकर, धर्म के हवाले ठगी कर हिंदुओं को मूर्ख, भक्त, अंधविश्वासी बनाने की प्रक्रिया से जनित है। चाहे तो इसे संघ और भाजपा भले अपना ट्रेडमार्क कह सकते हैं।

जबकि सनातन धर्म के शास्त्रीय ग्रंथों का मूल शब्द हैं,  काषाय (काषायवस्त्र), अरुण, गेरुआ, अग्निवर्ण, त्यागवस्त्र। सवाल है सनातन धर्म के शब्दकोष के इन शब्दों का भला क्या अर्थ है? पवित्रता, त्याग, वैराग्य, तप और धर्ममय जीवन का स्वधर्म, आचरण, व्यवहार। केवल इसी अर्थ के संदर्भ में वैदिक, उपनिषदिक, गीता, स्मृति और संन्यास परंपरा का गेरुआ रंग है। बंगाल के गेरुआ वस्त्रधारी स्वामी विवेकानंद का यह वाक्य भगवा के वायरस से अलग रहने वाले हर सनातनधर्मी, असल हिंदू को कंठस्थ याद रखना चाहिए, “This gerua robe is the flag of renunciation.” “यह गेरुआ वस्त्र त्याग का ध्वज है।” … “त्याग और सेवा ही भारत का राष्ट्रीय आदर्श है।” जिसने गेरुआ धारण किया है, अपने घर पर गेरुआ झंडा लगाया है, वह व्यक्ति, संस्था या मंदिर शुभ, पावन और शांतिदायी होना चाहिए।

मतलब यह कि न वह छप्पन इंची छाती दिखाता हुआ अहंकारी हो, न बुलडोजर लिए हुए हो। न उसका शरीर झूठ की सांसों से धड़कता हुआ हो और न झूठ-छल-ठगी की क्रूरताओं से भरा हो। और यदि कोई ऐसा है तो सनातन धर्म के लोगों जान लो, छल-कपट, लालची-झांसे से भरे शासन के दोषियों के लिए सनातन धर्म में यमराज ने विशसन तथा लालाभक्ष नाम के खास मगर क्रूर नरक बनाए हुए हैं।

नरेंद्र मोदी, अमित शाह कह सकते हैं यह सनातन धर्म की फिजूल बकवास है। हम भारत की भूमि को, बंगाल को पापमुक्त, मुसलमान-मुक्त बना दे रहे हैं। और इसके लिए भगवा की आड़ में ठगी का चाणक्य दर्शन, रंगा सियार वाला आचरण और सत्ता में वर्चस्वता ही असल राष्ट्रधर्म है, कौम धर्म है। इसलिए हम तो ऐसे ही राज करेंगे।

करें। पर तब गेरूआ पर, सनातनधर्मी हिंदुओं पर कम से कम भगवा झांसा न चस्पाएं।

बहरहाल, पते की बात। 1925 के दशहरे के दिन नागपुर की उस अभिशप्त जगह में भगवा रोपण से सनातन शब्दावली (ध्यान रहे, शब्द ब्रह्म है!) के अर्थ का जैसा अनर्थ हुआ है, उससे क्या सनातन से अलग भगवा धर्म की एक नई डिक्शनरी नहीं लिख देनी चाहिए?

Exit mobile version