मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बचाव में जो तर्क दिए जा रहे हैं उनमें एक मुख्य तर्क है कि पहले भी चुनाव आयुक्तों के बीच विवाद होते थे। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में ज्ञानेश कुमार की मनमानियों की खबर छपने के तुरंत बाद भाजपा की जो पहली प्रतिक्रिया थी वह यही थी। भाजपा के प्रवक्ता ने कहा कि यह स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है कि तीन चुनाव आयुक्तों के बीच विवाद होते हैं और कई चीजों पर उनके बीच सहमति नहीं होती है। इसके बाद यह तर्क चल निकला और हर जगह बताया जाने लगा कि कैसे पहले के चुनाव आयुक्तों के भी मुख्य चुनाव आयुक्त से विवाद होते रहे हैं।
इसमें सबसे ताजा विवाद तो अशोक लवासा का है, जो चुनाव आयुक्त थे और पिछले लोकसभा चुनाव से पहले आचार संहिता के उल्लंघन पर कार्रवाई को लेकर तत्कालीन मुख्य चुनाव आय़ुक्त राजीव कुमार के साथ उनका विवाद हुआ था। असल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने और चुनाव आचार संहित के उल्लंघन की अनेक शिकायतें मिली थीं। अशोक लवासा चाहते थे कि इन शिकायतों पर संज्ञान लिया जाए और नोटिस जारी हो क्योंकि उनको लग रहा था कि शिकायतों में तथ्य है। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ने इसे नहीं माना। इसके बाद लवासा ने अपनी लिखित असहमति दर्ज कराई। लेकिन उसके बाद क्या हुआ वह कोई नहीं बताता है। उसके बाद लवासा के कई रिश्तेदारों के यहां केंद्रीय जांच एजेंसियों का छापा पड़ा। लवासा के ससुराल पक्ष के लोगों को केंद्रीय एजेंसियों ने परेशान किया तो उनकी आईएएस बेटी के ऊपर भी कार्रवाई हुई। अंत में लवासा समय से पहसे चुनाव आयोग से विदा हुए। मौजूदा मामले में असहमति दर्ज करने वाले दो चुनाव आयुक्तों एसएस संधू और विवेक जोशी के खिलाफ ऐसा कुछ नहीं हुआ है। पता नहीं आगे कुछ हो तो नहीं कहा जा सकता है।
अशोक लवासा वाले विवाद से पहले नवीन चावला का विवाद हुआ था। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने नवीन चावला की शिकायत तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से की थी। गोपालस्वामी ने कहा था कि चावला कांग्रेस पार्टी के लिए काम करते हैं। हालांकि राष्ट्रपति ने कोई कार्रवाई नहीं की और बाद में चावला मुख्य चुनाव आयुक्त बने। उससे पहले टीएन शेषन का विवाद हुआ था। गौरतलब है कि उनके समय तक एक ही चुनाव आयुक्त होता था। उनके पद पर रहते ही दो और चुनाव आयुक्त नियुक्त करने का नियम बना और एमएस गिल सहित दो लोगों की नियुक्ति हुई तो टीएन शेषन ने इसे पसंद नहीं किया। उनका मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया। लेकिन उन्होंने कई बार दोनों चुनाव आयुक्तों को फैसलों से अलग रखा।
टीएन शेषन और एन गोपालस्वामी या राजीव कुमार का मामला ज्ञानेश कुमार से अलग है। उन तीनों मुख्य चुनाव आयुक्तों के समय जो विवाद हुए वह मतदाता सूची या चुनाव की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले नहीं थे। ज्ञानेश कुमार का विवाद स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की बुनियादी अवधारणा से जुड़ा हुआ है। उन्होंने दो चुनाव आयुक्तों को अंधेरे में रख कर मतदाताओं के नाम काटने और नए मतदाताओं के नाम जोड़ने का काम किया है। उन्होंने एक डिजिटल और सेंट्रलाइज्ड नेटवर्क तैयार किया, जहां से मतदाताओं के नाम जोड़ने और काटने का फैसला हो सकता है। उन्होंने ईआरओ, डीईओ और सीईओ यानी मतदाताओं का पंजीयन करने से लेकर जिला और प्रदेश स्तर तक चुनाव का काम देखने वाले अधिकारियों को मिले वैधानिक अधिकार निलंबित करके सीधे दिल्ली से नाम जोड़े और हटाए जा सकते हैं के काम किए। इसलिए यह चुनाव आयोग में पहले हुए विवादों से बहुत अलग है। अब पूरी चुनाव प्रक्रिया संदेह के घेरे में है।
