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पर भौकाल मशीनरी ठंडी!

भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने पहले राउंड के 92.38 प्रतिशत मतदान के बाद ढलते हुए सूरज का फोटो दिखाया है! सवाल है ममता बनर्जी का या बंगाल का या अपनी खुद की केंद्र सरकार का? सवाल इसलिए वजनदार है क्योंकि मतदान के बाद ममता का ऐलान है कि बंगाल जीतकर वे आगे दिल्ली जीतेंगी। राष्ट्रीय राजनीति में खेला होबे! पूरा देश घूमेंगी, पूरा देश हिलाएंगी! (Khela Hobe.. shake the entire nation)। सबसे बड़ी बात, अमित शाह का फोटो सोशल मीडिया में वायरल नहीं हुआ! यों मैं सोशल मीडिया से कोसों दूर हूं। बावजूद इसके भक्तों या विरोधियों के सोशल मीडिया पर जिनकी लगातार निगाह है, उनका यह बताना गंभीर है कि जिन दक्षिणपंथियों, मोदीभक्तों का एक्स से लेकर यूट्यूब आदि पर भक्ति का भौकाल हुआ करता था, वे या तो गायब हैं या मौन हैं। अब सरकार को डिफेंड भी नहीं किया जा रहा है!

सवाल है भाजपा-संघ की आईटी टीमें क्या कर रही हैं? मोटामोटी ये हेडलाइन मैनेजमेंट तथा निगेटिव खबरों, मतलब असली चिंताओं, खबरों को टीवी चैनलों, अखबारों से गायब रखने तक के रोल में हैं। एक मायने में मोदी-शाह, सरकार ने बंगाल में जीत-हार, वोटर लिस्ट, संसद, महिला आरक्षण का जो नैरेटिव बनाया है, उसके पीछे मोदी सरकार की यह मंशा भी होगी कि गैस-ईंधन, खाड़ी, आर्थिक संकट, बेरोजगारी जैसे असल मुद्दों पर भारत में चर्चा न बने। तभी यदि वोटर लिस्ट की धांधली से बंगाल जीत लिया, तो उसके जश्न में तीस अप्रैल के बाद की डीजल-गैस-पेट्रोल की कीमतों की मार दबी रहेगी।

पर त्रासदी या बुरे समय की बानगी देखें कि वोटर लिस्ट की करामात पर मोदी-शाह जो गणित बैठाए हुए थे, चुनाव आयोग-सुप्रीम कोर्ट से जैसी अनिश्चितताएं बनीं, उससे बंगाल के घर-घर में एसआईआर या वोटर लिस्ट का हल्ला बना। तभी हिंदू हो या मुसलमान, सभी वोट डालने के लिए मतदान केंद्रों पर टूट पड़े! मेरा मानना है कि किसी भी घर में (हिंदू हो या मुसलमान) यदि एक भी वोटर का नाम कटा, तो उस घर के बाकी सभी सदस्यों ने पूरी शिद्दत से केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, भाजपा के खिलाफ वोट दिया होगा। आखिर लोगों ने प्रत्यक्ष देखा है कि ममता तो वोट अधिकार के लिए लड़ती हुई थीं, सुप्रीम कोर्ट में बहस करती हुई थीं, जबकि मोदी-शाह चुनाव आयोग से मतदाता सूचियों में काट-छांट करवाते हुए थे।

मैं न चुनाव में घूमा हूं और न मेरी दिलचस्पी रही। पर ‘द टेलिग्राफ’ में मतदान बाद की ग्राउंड रिपोर्ट को देखा, तो अपने लिए तस्वीर साफ है। उत्तरी मिदनापुर जिले के गरबेता क्षेत्र के बूथ 238 पर 536 में से 533 मतदाताओं ने वोट डाले। यानी लगभग 99.6 प्रतिशत मतदान! बूथ पर 121 हिंदू और 415 मुस्लिम मतदाता थे। केवल दो लोग बीमारी के कारण वोट नहीं डाल सके। सो, पहली बात, मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद के रघुनाथगंज, भगबांगोला और लालगोला में 96 प्रतिशत से अधिक मतदान है, तो हिंदू इलाकों में भी भरपूर मतदान। क्यों? वजह वोटर लिस्ट, एसआईआर (Special Intensive Revision) का डर। गांव, देहात, प्रवासी मजदूरों, यानी सभी वर्गों में चिंता बनी है कि यदि वोट नहीं डाला, रिकॉर्ड नहीं रहा, तो भविष्य में उनका नाम मतदाता सूची से कट जाएगा। तब राशन मिलना बंद हो सकता है, घुसपैठिए, बांग्लादेशी करार दिए जाएंगे। मतलब पहचान, अधिकार या अस्तित्व- सभी पर खतरा। मतदान से ही नागरिकता का प्रमाण बनेगा। इसलिए ‘द टेलिग्राफ’ की रिपोर्ट को मानें, तो कई प्रवासी मतदाताओं ने वोट डालने के बाद अपनी उंगली पर लगी स्याही दिखाते हुए फोटो खिंचवाई, ताकि भविष्य में अगर उनकी नागरिकता पर सवाल उठे, तो वे यह साबित कर सकें कि वे भारतीय मतदाता हैं!

जबकि मोदी, शाह, भाजपा ने क्या सोचा था? घर-घर लोग मानेंगे कि पूरी कवायद घुसपैठियों-बांग्लादेशियों को निकालने के लिए है, लेकिन घरों में उलटा माना गया। राशन, अधिकार, पहचान- सबके लिए आफत! तो कौन है जिम्मेदार? मोदी सरकार, चुनाव आयोग! तो वोट किसके खिलाफ? पता नहीं अमित शाह ने किस भाव सूर्यास्त का फोटो डाला!

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