पांच मई 2026 के दिन अखबारों में एक और शीर्षक था, ‘बंगाल में कमल खिला’! ‘नया इंडिया’ में भी था। पल भर के लिए मन में प्रतिक्रिया थी, कमल खिला या दलदल खिला? क्यों? इसलिए क्योंकि मैंने कमल फूल को सनातन धर्म के चश्मे से जाना है। वह चश्मा मोदी-शाह-भाजपा के चश्मे से एकदम विपरीत है। कैसे? नोट करें कि कमल केवल फूल नहीं है, सनातन धर्म की दार्शनिकता है। मूल का “पद्म” शब्द सनातन धर्म में दिव्यता, चेतना, अलिप्तता का पर्याय है। गीता में एक शब्द है, “पद्मपत्रमिवाम्भसा”। सोचें, इस दर्शन पर कि संसार कीचड़ है, जबकि जीवन जल है और आत्मा वह कमल, जो कीचड़, जल से बिना चिपके हुए उससे ऊपर है। संसार व जल में जीना है, लेकिन संसार से चिपके नहीं रहना है। संसार में रहकर भी उससे ऊपर उठी वह चेतना, जिससे मनुष्य आत्मिक पवित्रता में रहे।
और जान लें, सनातन धर्म के वेद, उपनिषद, गीता, पुराण सभी में कमल की यही महिमा है। अब तुलना करें भाजपा नाम की पार्टी के कमल से। भाजपा का कमल क्या “ब्लैक लोटस” की तरह नहीं खिला? एक तरफ लक्ष्मी कमल पर बैठती हैं। ब्रह्मा कमल से प्रकट होते हैं। तभी वह मनुष्य चेतना की सात्विकता, सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् का वह सहस्रार कमल है, जिसका अर्थ अलिप्तता है। शक्ति, लेकिन बिना लिप्सा के। सौंदर्य, लेकिन बिना अहंकार। और कीचड़ के बीच पवित्रता से ऊपर खिला हुआ।
और नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने इस पवित्र कमल का बारह वर्षों में कैसा कचूमर निकाला? इसे मात्र हेडलाइन बना दिया। भाषणों, भीड़ के नारों, आईटी सेल से झूठ का वह फूल बनाया है, मानो नकली “ब्लैक लोटस”।
सो ‘भगवा’ शब्द की ही तरह कमल भी उलटाव से कीचड़ में धंसा हुआ है। सनातन धर्म का कमल दलदल में खिलता था, पर दलदल नहीं बनता था। कमल अब चुनाव के दलदल की परत पर, उसी में लिपटा, काला मगर अंहकारी जीत की तरह प्रकट होता है। भक्त इसलिए उस पर झूमते हैं कि भले काला हो, पर कमल तो है। और तो कोई विकल्प ही नहीं है! दलदल के तमाम तरह के कीड़े-मकोड़े इधर-उधर से आकर काले कमल को चाट रहे हैं! जीवन का हर व्यवहार उस काले रंग, काले धागे में बांधे हुए है, जोकि शनि का रंग है, न कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश यानी सनातन त्रिदेव का!
सोचें, और सोचने की क्षमता न हो तो चैटजीपीटी से ही सवाल करके जानें कि सनातन सत्य में क्या गेरुआ का अर्थ था और कमल का अर्थ क्या? क्यों राजकुमार बुद्ध ने भी सूत्र (बौधायन धर्मसूत्र) दिया कि “अरुण-वस्त्र-धरः भिक्षाटनं चरेत्।” अर्थात “संन्यासी अरुण (भगवा/उषाकाल जैसे लाल-पीले) वस्त्र धारण करे।” आखिरकार यह तो सभी का अनुभव होका कि उगते सूर्य की गेरुआ लाली तपस्वी के उजियारे जीवन जैसी है। अंधकार हटाने वाली तो साथ ही चेतना भी जगाने वाली।
सनातन धर्म के अध्यात्म, दर्शन, धर्म में गेरुआ रंग और कमल के फूल की पवित्रता, पावनता का कभी भी, किसी ने भी भीड़ जुटाने, भीड़ को भड़काने, झूठ बोलने, अहंकार दिखलाने, लूट मचाने या भय, भूख, भक्ति को फैलाने में इस्तेमाल नहीं किया। ये दो शब्द हिंदुओं की नैतिकता, चाल-चेहरे-चरित्र के संस्कारों के प्रतीक थे।
अब किसके प्रतीक हैं?
सोचें, दिमाग है तो अवश्य कुछ क्षण ठिठक कर सोचें? …
मेरा मानना है, जैसे गेरुआ की जगह ‘भगवा’ जुमले से या सत्ता की भ्रष्टता से कमल की पवित्रता का प्रतीक अर्थ खत्म हुआ है, वैसे इक्कीसवीं सदी के 2026 के भारत और उसकी सनातन कौम के शब्द, संस्थाए अपने अर्थ, अपनी साख लगभग गंवा चुके हैं। अस्सी साल पार के एक सुधी बुजुर्ग से हाल में बात-बात में उनकी एक पीड़ा जाहिर हुई। उन्होंने स्वतंत्रता से पहले के समय को याद करते हुए कहा- मेरे बचपन में रेडियो आया था। उसकी तब साख थी कि रेडियो ने कहा है तो सत्य है। कस्बे में कलेक्टर कभी आता था, बोलता था तो सब विश्वास करते थे, उसके अंग्रेज कारिंदा होने के बावजूद। फिर छपा हुआ अखबार आया। लोगों के लिए उसका एक-एक शब्द मानो ब्रह्मवाक्य! ऐसे ही अदालत की साख थी। कोर्ट का फैसला होता था तो सवाल नहीं उठता था कि जज की नीयत क्या है। फिर नेता आए। नेहरू आते थे तो लोग अपने-आप सुनने जाते थे। विरोधी भी सभा में जाकर सुनता था। उनके कहे का मान था। नेहरू के चेहरे की साख थी, बात की साख थी। फिर प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, शंकराचार्य, साधु-संत थे। वे जो कहते थे, उसकी भी साख और आस्था भरपूर थी। पहला आम चुनाव बैलगाड़ी के साधन से भी लड़ा गया। उसके बाद के कई चुनावों तक चुनाव आयोग की साख पर कभी सवाल नहीं उठा। विपक्ष लगातार हारता हुआ भी उसका आदर करता था। ऐसे ही स्पीकर, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री- जितने चेहरे थे, वे सब विश्वसनीयता का चेहरा थे।
और देखते-सुनते वह समय आया, जो दलदल में धंसना शुरू हुआ, और आज का आलम यह है कि सभी साखविहीन हैं। किसी की भी क्रेडिबिलिटी नहीं बची। आप लोगों (पत्रकारों) की क्या साख है? सरकार, प्रधानमंत्री, कार्यपालिका, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, चौथा खंभा, राजनीतिक दल, आरएसएस सहित तमाम एनजीओ, विश्वविद्यालयों से लेकर अस्पतालों, डॉक्टरों आदि सभी पर विश्वास-साख पैंदे पर हैं। न चेहरों की, न पद की साख है और न लोकतंत्र के उन शब्दों का अर्थ बचा है, जो संविधान में लिखे हुए हैं।
सोचें, यह कितना सही है? और इस स्थिति में पहुंचाने वाले दलदल का क्या नाम है?
