प्रधानमंत्री मोदी ने इस साल भी लाल किले से भाषण दिया आत्मनिर्भर भारत की सबसे ज्यादा बात कही। लेकिन दूसरे देशों पर भारत की निर्भरता पहले कभी भी इतनी नहीं रही है। इसी तरह मोदी जनधन खाते, आधार औऱ मोबाइल के हवाले दावा करते हैं कि भारत में बड़ी आबादी को अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा रहा है लेकिन असल में इतनी असमानता कभी नहीं रही। प्रधानमंत्री मोदी ने नारा दिया था कि न खाऊंगा और न खाने दूंगा लेकिन भ्रष्टाचार का ऐसा इकोसिस्टम देश में इससे पहले कभी नहीं बना था। इन्सॉलवेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी आईबीसी लूट का कानून है। इस कानून के आधार पर एनसीएलटी और एनसीएलएटी में जो हो रहा है वह दुनिया के सामने है। अभी देश के एक कारोबारी सुभाष चंद्रा की खबर आई है कि उनका 22 हजार करोड़ रुपए का कर्ज साढ़े छह करोड़ रुपए में सेटल हुआ है। याना 21 हजार नौ सौ 93 करोड़ से ज्यादा रुपए बट्टेखाते में गए हैं! लेकिन सरकार की उपलब्धि बताने वाले सुहेल सेठ जैसे लोग सोशल मीडिया में पोस्ट लिख रहे हैं कि पहले 2014 में बैंकों का एनपीए 11 फीसदी था और अब 0.4 फीसदी रह गया है। एनपीए कैसे कम नहीं रहेगा, जब हर साल बैंकों का बकाया बट्टेखाते में डाल दिया जाएगा या आईबीसी के जरिए उसे खत्म कर दिया जाएगा तो एनपीए कहां से होगा! सरकार ने पिछले 12 साल में 10 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा बट्टेखाते में डाले हैं और हर साल हजारों करोड़ रुपए आईबीसी के जरिए साफ किए जा रहे हैं।
अगर आत्मनिर्भरता की बात करें तो दुनिया के देशों खास कर चीन पर भारत की निर्भरता इतनी बढ़ती जा रही है कि भारत उसका आर्थिक गुलाम बनने की ओर बढ़ रहा है। पहली बार चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 10 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो गया। यानी चीन को हम जितना सामान बेचते हैं उससे 10 लाख करोड़ रुपए ज्यादा का सामान खरीदते हैं। भारत की फार्मा इंडस्ट्री से लेकर कृषि सेक्टर तक ज्यादातर सेक्टर ऐसे हैं, जिनका काम चीन के भरोसे चल रहा है। जिन सेक्टर में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की बात कही जा रही है उसमें भी चीन के बगैर काम नहीं चलेगा। और यह स्थिति इसके बावजूद है कि चीन लगातार भारत की जमीन हड़प रहा है और भारत को पेट्रोलिंग प्वाइंट से पीछे कर रहा है। 2020 में गलवान में चीनी सैनिकों के साथ हिंसक झड़प में भारत के 20 जवान शहीद हुए थे। उसके बाद चीन से कारोबार बंद होना चाहिए तो तो कारोबार बढ़ता जा रहा है।
नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे तब भारत अपनी जरुरत का 81 फीसदी तेल आय़ात करता था। उस समय मोदी ने कहा था कि भारत इस आयात को धीरे धीरे कम करेगा। उन्होंने कहा था कि भारत तेल की खोज और रिफाइनिंग क्षमता को बढ़ाएगा। लेकिन उलटा हुआ। तेल और प्राकृतिक गैस की खोज नहीं हुई उलटे ईंधन का आय़ात बढ़ कर लगभग 90 फीसदी पहुंच गया। तेल और गैस खोजने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी ओएनजीसी का सारा कैश गायब हो गया और एक्सप्लोरेशन का काम लगभग ठप्प हो गया। ऊर्जा से लेकर उपकऱण और एआई तक सबमें भारत दूसरे देशों पर निर्भर है।
अगर भारत में बढ़ती असमानता की बात करें तो पेरिस की वर्ल्ड इनइक्विलिटी लैब की विश्व असमानता रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में अमीर और गरीब की खाई बढ़ती जा रही है। देश की कुल संपत्ति का करीब 40 फीसदी हिस्सा ऊपर के एक फीसदी लोगों के पास हैं। देश के अमीर 10 फीसदी लोगों के पास कुल संपत्ति का 65 फीसदी हिस्सा है। अगर आय की बात करें तो देश की ऊपर की 10 फीसदी आबादी का आय में हिस्सा 58 फीसदी है, जबकि नीचे की 50 फीसदी आबादी का आय में हिस्सा सिर्फ 15 फीसदी है। दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले भारत में अरबपतियों की संख्या ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। चुनिंदा लोगों के हाथों में संपत्ति और आय का केंद्रीकरण ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है। नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना महामारी ने देश के असंगठित क्षेत्र और लघु व मझोले उद्यम को लगभग खत्म कर दिया। सरकार की नीतियों के कारण कोरोना महामारी के बाद भारत की अर्थव्यवस्था में ‘के शेप’ का विकास हुआ, जिसमें अमीर और अमीर होते गए, जबकि गरीब और नीचे जाते चले गए।
