यों कांग्रेस ही नहीं स्वतंत्र भारत ही एक श्राप का मारा है। इस श्राप का नाम है लेफ्ट, खासकर कम्युनिस्ट। इसने भारत की मूल सनातनी धर्म-पद्धति, सभ्यता और उसकी सहज सामाजिक चेतना को दीमक की तरह गलाया है। कैसे? याद करें तिलक-गोखले-गांधी की कांग्रेस को। स्वतंत्रता के समय वह “राम” का नाम लेती थी। कांग्रेस रामराज्य, गीता, प्रार्थना, सत्य, अहिंसा, सर्वधर्म समभाव जैसे सभ्यतागत प्रतीकों की प्रतीक थी। यानी गांधी और कांग्रेसजन भारतीय समाज की जीवित वास्तविकता—धर्म—में जीते थे। उसी के नैतिक बल से देश बनना था। गांधी की शब्दावली का अर्थ था—मैं अपनी हिंदू सभ्यता और आस्था में खड़ा होकर दूसरे धर्म का बराबर सम्मान करता हूं।
ठिक ऐसे ही दूसरे छोर पर सावरकर और मदनमोहन मालवीय थे। इन दोनों के आईडिया में हल्का अंतर था। सावरकर ने राजनीतिक हिंदुत्व का विचार दिया। इसका कोर था-धर्मशास्त्रों की प्रामाणिकता की जगह बुद्धिवाद और विज्ञान पर जोर। छुआछूत और जातिभेद मिटाने की दृढ़ता। उनके हिंदुत्व में पितृभूमि-पुण्यभूमि (जैसे की योरोपीय देशों में भी fatherland) से राष्ट्रीयता की परिभाषा थी। वही मालवीय नैतिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान और आधुनिकता के संतुलन का सुधारवादी सनातनी विचार लिए हुए थे। सावरकर के लिए गाय उपयोगी पशु थी, मालवीय के लिए पूज्य।
जाहिर है गांधी, सावरकर और मालवीय—तीनों के भारत में वह था जो आज के मोदी-शाह और संघ परिवार के राम-नाम वाले कथित हिंदू राष्ट्र में कतई नहीं है। सवाल है ऐसा कैसे हुआ? कैसे यह नौबत की हिंदुओं के मूल सनातन सत्य, धर्म, बुद्धिवाद-विज्ञान, सर्वधर्म समभाव की जगह झूठ, अंधविश्वास, अनैतिक राजनीति, जातिय-धर्म कलह के जाहिल कथित हिंदू राष्ट्र में आमजन सांस ले रहा है? मेरा दो टूक जवाब है—लेफ्ट ने पहले भारत की सभ्यतागत राजनीति को असहज और संदिग्ध बनाया। फिर उसी से, अंततः प्रतिक्रिया में संघ-भाजपा का हिंदू, राम पर एकाधिकार बना।
मतलब कम्युनिस्ट- वामपंथी के प्रभाव में कांग्रेस (नेहरू से शुरू) की सेकुलर अतिशयता बनी। धर्मनिरपेक्षता का वह बेसुरा राग बना जिसने लोकमानस में जहर घोला। हिंदू बनाम मुस्लिम, पहचान की राजनीति, जातिवाद वोट की आवश्यकता बनी और बनाई। इसकी अतिशयता ने हिंदुओं को लाठीधारी संघ की ओर धकेला। और फिर संघ तथा नरेंद्र मोदी-अमित शाह-योगी की अतिशयता ने हिंदूओं को ऐसा अचेतन, कुंभकर्णी बनाया जो यह भी सुध नहीं कि मनुष्य धर्म की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता-संस्कृति में सत्यमेव जयते क्या था? सर्वधर्म समभाव क्या था और वह क्या था जिसके अजूबे में इकबाल ने भी लिखा था सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा…
मेरा मानना है कि इस सबके लिए जिम्मेवार देशी कम्युनिस्ट और वामपंथ है। भारत में वामपंथियों ने न केवल गांधी, उनके राम, और रामराज्य को नकारा बल्कि हर बात के लिए उस सनातनी जनमानस की बखिया उघेड़ी जो एक तरह से उसकी सभ्यता- संस्कृति-आस्था पर जूता मारना था। सोचे, जब सभ्यता-देश विशेष के मूलवासियों, बहुसंख्यको को ही यदि सांप्रदायिक करार दिया जाए, सरकार उसकी माईबाप बने और प्रधानमंत्री राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) में ‘संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों’ जैसे वाक्य बोले तो इन सबकी अतिशयता का कुल जमा प्रभाव लोकमानस में क्या बनेगा? तब यह सोचना ही बेवकूफी है कि हिंदुस्तां के हिंदु अपने आपको असुरक्षित न माने। घर-घर मुसलमानों की चिंता न बैठ जाए। तभी कोई न माने इस बात को लेकिन मेरा मानना है कि 1947 के पहले हजार साला गुलामी के इतिहास में भी सनातनी मानस इतना डरा हुआ, असुरक्षित अपने को नहीं समझता रहा होगा जितना आज है, स्वतंत्र भारत में हो गया है!
यह संघ प्रोपेगेंडा की वजह से नहीं है बल्कि उस कांग्रेस की वजह से है जिसने 1947 से पहले निडरता, सर्व-धर्म समभाव का आत्मविश्वास दिखाया था। एओ ह्यूम की बनाई कांग्रेस में ढेरों कमियां थी लेकिन तिलक, जिन्ना, गोखले, मोतीलाल नेहरू, गांधी, सुभाष बोस, सरदार पटेल, नेहरू, डा राजेंद्रप्रसाद, मौलाना आजाद मोटामोटी आत्मविश्वासी, निर्भयी, सर्वधर्मं समभाव के सनातनी भाव में लोगों को जोडने वाले थे। कांग्रेस ने ज्यादा ही आत्मविश्वास दिखाया था इसलिए 1937 के बाद विभाजन की और जिन्ना व मुसलमान बढ़े। उसका आधार क्या था? उस साझा आत्मविश्वास का आधार धर्मों-जातियों का वह अनुभव था जिसमें जिसमें लाटसाहब जैसे अंग्रेज समाज में अब्दुला की शादी में बेगाने थे।
पूरा विषय विशाल है। कई पुस्तके लिखी जा सकती है। बुनियादी बात 1947 के बाद भारत की अपनी सीमा में आम हिंदू मनोभावों का सफर है। 1947 से 2026 की हिंदुओं की मोटामोटी पांच-छह पीढियों का अनुभव है। वह बहुत खराब रहा। तभी चौदह प्रधानमंत्री, चौदह सरकारों के निचोड़ में सनातनी, धर्म-जीवन पद्धति अब उस हिंदू में कनवर्ट में है जिसकी मुख्य चिंता मुसलमान है। उसी से भय, असुरक्षा तथा पराश्रय है। और यह नरेंद्र मोदी-अमित शाह-योगी आदित्यनाथ, संघ की वह राजनैतिक ताकत है जिससे आगे कांग्रेस हो या वामपंथी या क्षेत्रिय दल सभी हर मायने में लगातार लाचार है।
कैसे इतनी लाचारगी? सोचे, कॉकरोच, जंतरमंतर आंदोलन, जनरेशन जेड की इस्टाग्राम-सोशल मीडिया पर प्रभुता के आम मायने क्या है? मोटामोटी नरेंद्र मोदी-अमित शाह, योगी, भाजपा- संघ की हवा बिगड़ने की वास्तविकताएं। मगर पहली बात, क्या ये राहुल गांधी, अखिलेश या प्रशांत किशोर, तेजस्वी यादव आदि की बदौलत है? कतई नहीं। जो हुआ है हवा जो बदलती लगती है उसकी वजह मोदी सरकार, भाजपा, संघ परिवार के अंहकार, उसकी बुद्धीहीनता है। मोदी सरकार ने प्रमाणित किया है लाठीधारी लोग विवेकी नहीं होते है। सत्ता का अंहकार यदि बुद्धीमान रावण को भी पतित, ठस, आत्मघाती बना देता है तो कुलियुगी अवतार और उसके अंधविश्वासी भक्त क्या बन जाते है यह 2026 के कथित हिंदू भारत, उसकी संस्थाओं के चेहरों की कथनी-करनी से लगातार जाहिर होता हुआ है।
सनातनी मानस राम और रावण की कथा में सांस लेता रहा है और वह मर्यादा बनाम अंहकार का फर्क बूझने की समझ लिए रहा है। बावजूद इसके यदि आज हिंदू भक्त रावणों के अंहकार को अपनी सुरक्षा, अपने भय (मुसलमानों, सेकुलरों, बुद्धी-विवेकी अर्थात बकौल मोदी दिमागी नक्सल) का निदान मानते है तो अनुमान लगाए कि कृष्ण मेनन,केडी मालवीय, पीएन हक्सर, नरूल हसन, राजेश्वरराव, गोपी अरोड़ा, मणिशंकर अय्यर, हरकिशनसिंह सुरजीत, सोनिया गांधी के एनएसी सलाहकारों, प्रकाश करात, और पिछले बारह वर्षों से कभी (दिवंगत) सीताराम यचूरी, कन्हैया, जयराम रमेश राहुल गांधी के दिल-दिमाग को जैसे लेफ्ट, प्रोग्रेसिव, कम्युनिस्टी जुमलों में भटका रहे है तो अस्सी साला इतिहास का सत्य क्या बनता है?
उपरोक्त एक पैराग्राफ स्वतंत्र भारत के अस्सी साला इतिहास का वह सार-संक्षेप है जिसकी गहराई, घटनाक्रम और तथ्यों को जितना जानेंगे, उतना समझ आएगा कि भारत राष्ट्र-राज्य का सनातनी हिंदू कितना और कैसे राम (मर्याद) रामराज्य, गांधी, सावरकर, मदनमोहन मालवीय के विचारों से भटका तो आत्मविवेक, सामान्य धर्म, नैमेत्तिक धर्म, कर्म, पुरषार्थ, स्वाभिमानी और निर्भयी, स्वालंबी जीवन की पूंजी को भी गंवा बैठा!
सवाल केवल यह नहीं है कि हिंदू कहां से कहां पहुंचा। बड़ा सवाल है कि उसे वहां पहुंचाने में स्वतंत्र भारत की सत्ता और उसके वैचारिक सलाहकारों ने क्या-क्या किया? किसने नागरिक को पहले सरकार का आश्रित बनाया, फिर अधिकारों का याचक और अंततः जाति-धर्म की पहचान में अपना हिस्सा खोजता टुक़डखोड लाभार्थी बना दिया? तभी कम्युनिस्ट-वामपंथ का प्रभाव केवल धर्मनिरपेक्षता का सवाल नहीं है। वह राज्य, समाज, अर्थव्यवस्था और नागरिक—चारों के रिश्ते का सवाल बनता है।
सोचे क्या और कैसा है आज का सनातनी? कोई सौ करोड लोग पांच सौ-हजार रू के लाभार्थी हो गए है। खैरात, रेवडियों और आरक्षण के लिए बिलबिलाते हुए। इसके दोषी नरेंद्र मोदी से ज्यादा सोनिया गांधी- एक्टिविस्टों से भरी एनएसी की बनवाई राजनैतिक शब्दावली है। अर्थात मेहनत, पुरुषार्थ, परिश्रम और स्वावलंबन के साथ नागरिक की जिम्मेदारी की जगह राजनीति के केंद्र में केवल ‘अधिकार’ और ‘हकदारी’ का आग्रह बनाया। अधिकार-आधारित (rights-based) हकदारी, सामाजिक न्याय, रोजगार गारंटी, भोजन का अधिकार, सूचना का अधिकार, वन अधिकार आदि-आदि। इनमें कई अधिकार अपने आप में जरूरी और न्यायसंगत हो सकते है; पर सवाल उनका होना नहीं, बल्कि, राजनीति, सिस्टम का पूरा व्याकरण अधिकार पाने और सरकार से पाने में सिमटने का है। नेहरू ने समाजवादी मॉडल में लोगों को राशन बांटना शुरू किया और सरकार को उद्यमी, पूंजी-धन अर्जन, टैक्स वसूली का माईबाप बनाया। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाने का नारा दे कर पीएन हक्सर, डी. पी. धर, जी. पार्थसारथी और सीपीआई के समर्थन-वाले सत्ता-विचार संसार में इंडिया को ही इंदिरा बना दिया। अधिकृत अवतार की पहला विमर्श इंदिरा गांधी के ही समय का है।
फिर राजीव गांधी आए। कंप्यूटर-इक्कीसवीं सदी की लोगों को झांकी दिखाई। सोनिया गांधी के साथ झोपडियों में जाकर भारत की गरीबी देखी। दलालों को मिटाने का भाषण दिया। किसलिए? ताकि गरीब तक सरकार के सौ रूपएं में पंद्रह नहीं बल्कि पचास या सौ रूपए पूरे पहुंचे। मणिशंकर अय्यर, गोपी अरोडा जैसे प्रगतिशील तब भी गांधी की बचीखुची कांग्रेस से पुराने नेताओं को बाहर करवाते हुए थे। राजीव गांधी के आसपास आधुनिकतावादी, नौकरशाही और सेकुलर-प्रगतिशील सलाह का नया घेरा बना था। सो शाहबानू से मुस्लिम समाज की रियलिटी प्रकट हुई तो मुसलमानों की चिंता में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी सरकार ने दरकिनार किया। नतीजतन संघ-भाजपा को तुष्टीकरण का वह ब्रहास्त्र मिला जो आज तक जिंदा है और बारूद लिए हुए है।
और यहीं स्वतंत्र भारत की सेकुलर राजनीति का वह अंतर्विरोध है जिसने कांग्रेस को खत्म किया, लेफ्ट-मध्यमार्गी नेताऔ के तीसरे मोर्चे की सरकारों के खत्म किया। लेफ्ट के प्रभाव में रही हर सरकार में समाज-सुधार का साहस केवल हिंदू समाज के लिए था वहीं अल्पसंख्यक धार्मिक नेतृत्व के सामने सावधानी या समर्पण! शाहबानो केवल एक मुस्लिम महिला के गुजारे-भत्ते का मामला नहीं था। उसने हिंदू मानस में यह सवाल बना—कानून और सुधार की कसौटी सबके लिए एक क्यों नहीं? कांग्रेस ने उत्तर देने के बजाय संतुलन साधा। और संतुलन साधते-साधते उसने संघ-भाजपा के हाथ वह राजनीतिक हथियार दे दिया जिसस उसने अगले चार दशकों में लगातार धार पाई।
तथ्य है सोनिया गांधी ने राजीव गांधी के समय के सबक गांठ में नहीं बांधे। तभी 2004 में कांग्रेस की सरकार बनने का समय आया तो अंबिका सोनी की जगह अहमद पटेल को उन्होने राजनैतिक सलाहकार बनाया। कांग्रेस-एनएसी- सरकार के बीच में सेतु, समन्वयक का दारोमदार अहमद पटेल पर था। उधर सरकार के समानांतर एनएसी में अधिकार-आधारित कल्याण, नागरिक समाज और एक्टिविस्ट राजनीति का दबदबा था। इसी के तौरतरीकों के कंट्रास्ट में गुजरात में नरेंद्र मोदी हिंदू अस्मिता तथा कांग्रेस की कथित तुष्टीकरण राजनीति के प्रतिवाद के रूप में उभरते हुए थे। त्रसादी है कि दोनों नैरेटिव एक-दूसरे को खाद-पानी देते गए।
नरेंद्र मोदी? गुजरात 2002 के बाद कांग्रेस, वामपंथ और दिल्ली के सेकुलर-प्रगतिशील विमर्श ने उन्हें जितना कटघरे में खड़ा किया, उतना ही संघ-भाजपा ने उस घेरेबंदी को हिंदू अपमान और हिंदू असुरक्षा की कथा में बदला। गोधरा और उसके बाद के दंगों की भयावहता पर कानून, जांच और न्यायालय का अपना लंबा क्रम चला; लेकिन राजनीति में उससे अलग एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया भी चली। मोदी विरोधियों के लिए जहां सांप्रदायिक राजनीति का चेहरा बने और समर्थकों के लिए उसी विरोध के कारण हिंदू प्रतिरोध का दबंग चेहरा।
यही वह उलटा परिणाम था जिसे कांग्रेस कभी समझ नहीं पाई। जिस नरेंद्र मोदी को दिल्ली का सेकुलर-प्रगतिशील संसार हिंदू मतदाता से काटना चाहता था, वही लगातार उसी हिंदू मानस में गहरे उतरता गया। भाजपा, संघ, नरेंद्र मोदी के अयोध्या से लेकर मोदी के प्रधानमंत्री बनने तक के इस फिनोमिना को मैंने अपने गपशप कॉलम, लेखन में बतौर विश्लेषण निरंतर लिखा है।
मेरा खांटी कांग्रेसियों( वसंतदादा पाटिल, ए. आर. अंतुले, माखनलाल फोतेदार, आर. के. धवन और कमलापति त्रिपाठी से लेकर अहमद पटेल, अंबिका सोनी, सतीश शर्मा आदि—यानी कांग्रेस में विचार और संगठन चलाने वाला घेरा ) के साथ गहरा जानने-समझने का रिश्ता रहा है। उसी तरह राष्ट्रीय राजनीति के सतरंगी विचारों और चेहरों की असलियत भी गोपी अरोड़ा, मणिशंकर अय्यर, सीताराम येचुरी, शरद यादव, लालू यादव जैसे लोगों से हुई गपशप में जानी है। इसलिए मेरे इस निष्कर्ष में किंतु-परंतु नहीं है कि मोरारजी देसाई और चरण सिंह से लेकर चंद्रशेखर, देवगौड़ा, गुजराल और मनमोहन सिंह तक सरकारें बदलती रहीं, गठबंधन बदलते रहे, चेहरे और नारे बदले; लेकिन दिल्ली की सत्ता में कम्युनिस्ट-समाजवादी विचार, कथित प्रगतिशील बौद्धिक जमात और राष्ट्रीय मीडिया में उसकी गूंज एक स्थायी वैचारिक खमीर की तरह हमेशा रही। आटा-परात किसी की भी रही हो, खमीर वही रहा। उसी ने धीरे-धीरे, बार-बार राष्ट्रीय राजनीति की सोच, शब्दावली और प्राथमिकताओं को अपने ढंग से फुलाया। और हिंदू भावनाओं के साथ वह खेला किया जिससे सनातन धर्म और देश की बहुसंख्यक आबादी का दिल-दिमाग बदला। बुद्धी, विवेक, तर्क की जगह वह भय, भूख, भक्ति में फंसा।
और यही इस अस्सी साला कहानी का पहला निष्कर्ष है। कम्युनिस्ट भारत की सत्ता पर कभी स्थायी कब्जा नहीं कर पाए। उनका जनाधार सिकुड़ता गया। मगर दिल्ली की सत्ता का वैचारिक शब्दकोश बनाने में उनका और उनसे निकले व्यापक प्रगतिशील मानस का प्रभाव उनके वोटों से कहीं अधिक रहा। चुनाव वे हारते गए, लेकिन कांग्रेस की सोच में उनका खमीर बना रहा। और कांग्रेस जितनी अपनी पुरानी सभ्यतागत सहजता से दूर हुई, उतनी ही वह जमीन संघ-भाजपा के लिए खाली होती गई।
कमाल देखिए, भारत में कम्युनिस्टों की चुनावी यात्रा और वैचारिक यात्रा उलटी दिशाओं में चली। वे वोट में सिकुड़ते गए लेकिन दिल्ली के सत्ता-बौद्धिक संसार में उनकी बनाई भाषा फैलती गई। कभी संसद में दर्जनों सांसद, बंगाल-केरल-त्रिपुरा में सरकारें और ट्रेड यूनियनों-विश्वविद्यालयों में दबदबा रखने वाला संगठित कम्युनिस्ट आंदोलन आज राष्ट्रीय चुनावी राजनीति में हाशिये की भी ताकत नहीं है। लेकिन वर्ग, सामाजिक न्याय, हिस्सेदारी, प्रतिनिधित्व, अल्पसंख्यक अधिकार, बहुसंख्यकवाद, पितृसत्ता, उत्पीड़क-उत्पीड़ित जैसे उसके और उससे निकले प्रगतिशील विमर्श के शब्द कांग्रेस की जुबान में पहले से ज्यादा हैं। यही भारतीय लेफ्ट का अजूबा है। वह चुनाव वह हारता गया, मगर गैर-भाजपाई राजनीति का शब्दकोश बनाने में जीतता गया।
यहां ‘लेफ्ट’ का अर्थ केवल सीपीआई, सीपीएम या सीपीआई-एमएल का पार्टी कार्ड रखने वाले लोग नहीं हैं। लोहियावादी, अंबेडकरवादी, एनजीओ एक्टिविस्ट और अधिकारवादी नागरिक समाज कम्युनिस्ट नहीं हैं; इनके आपसी मतभेद भी गहरे हैं। लेकिन दिल्ली में समय के साथ एक व्यापक वाम-प्रगतिशील सत्ता-बौद्धिक मानस बना जिसमें भारतीय समाज को मुख्यतः वर्ग, जाति, लिंग, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक और उत्पीड़क-उत्पीड़ित के खांचों से समझने की प्रवृत्ति साझा होती गई। मेरे ‘लेफ्ट’ कहने का आशय इसी व्यापक खमीर से है। सरकार किसी की हो, प्रधानमंत्री कोई हो, इस खमीर का असर सत्ता की भाषा और प्राथमिकताओं में हमेशा बना रहा। (जारी)
