ढेरों प्रमाण हैं। तारीखों और घटनाओं का वह अंतहीन सिलसिला है जिससे मेरा निष्कर्ष है कि भारत के कम्युनिस्टों ने न केवल देश का समय बिगाड़ा। खुद के अवसर भी गंवाए। लेफ्ट के खाते में राजनीतिक बरबादियां लगातार दर्ज कराईं। बावजूद इसके मेरे मन में कम्युनिस्ट नेताओं के चाल, चेहरे और चरित्र की कसौटी में सम्मान है। खासकर आज सत्ता में संघ-भाजपाइयों के चाल, चेहरे और चरित्र को देखते हुए तो और भी अधिक। उस नाते ई. एम. एस. नंबूदरीपाद, ज्योति बसु, इंद्रजीत गुप्त से माणिक सरकार, पिनराई विजयन और वाम संगठनों के प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, दीपांकर भट्टाचार्य तक—इन लोगों की निजी सादगी, सहजता और वैचारिक प्रतिबद्धता का जितना सम्मान किया जाए, कम है।
कांग्रेस (राहुल) की दीमक है लेफ्ट-2
मगर व्यक्ति की ईमानदारी से विचार और उसके परिणाम सही साबित नहीं होते।
भारतीय कम्युनिस्टों का विरोधाभास यही है। निजी जीवन में जितने सादे और प्रतिबद्ध, भारत को पढ़ने में उतनी ही बार गड़बड़। स्वतंत्रता के बाद कम्युनिस्टों ने आजादी को अधूरा माना। कांग्रेस को बुर्जुआ सत्ता कहा। नेहरू को कभी वर्ग-शत्रु की राजनीति में पढ़ा और कभी उन्हीं के आसपास घेरेबंदी से उन पर वैचारिक प्रभाव बनाया। नेहरू के आखिरी सालों में कृष्ण मेनन और चीन से भारत की हार का ठीकरा भी फूटा। चीन के सवाल पर ही कम्युनिस्ट विभाजित हुए। दो पार्टियां बनीं। इंदिरा गांधी के दौर में सीपीआई उनके साथ थी। उसका आपातकाल को समर्थन रहा। फिर जनता पार्टी, वी. पी. सिंह, संयुक्त मोर्चा और यूपीए—दिल्ली में सत्ता के गठजोड़ बने तब भी वामपंथी चेहरों, पार्टियों का सरकारों, राष्ट्रीय नैरेटिव और मीडिया में हल्ला रहा।
लेकिन एक बात, एक वास्तविकता हमेशा कायम रही। केंद्र सरकार की सत्ता के आसपास विचार, बौद्धिकता और विमर्श की दुनिया में वाम की हैसियत उसकी असल जन हैसियत, पाए गए लेफ्ट वोटों से अक्सर कई गुना बड़ी रही।
सोचें, कृष्ण मेनन के प्रभाव और 1962 के अनुभव यानी लेफ्ट से नेहरू ने क्या पाया? कांग्रेस के 1969 के विभाजन के बाद वाम समर्थन और वाम-प्रगतिशील बौद्धिक प्रभाव की ओर बढ़ीं इंदिरा गांधी अंततः कहां पहुंचीं? बैंक राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स, गरीबी हटाओ, सरकारी उद्योगों-उद्यमों, लाइसेंस-कोटा से कांग्रेस और भारत ने क्या पाया?
लगातार फैलते सरकारी दायरे में उलटे कांग्रेस अपनी पुरानी मध्यमार्गी अर्थनीति से लेफ्ट की ओर खिसकती गई। तात्कालिक फायदे की राजनीति में भले इंदिरा को गरीबों की मसीहा की इमेज मिली। कांग्रेस का नया सामाजिक आधार बना। मगर उसी के साथ सरकार अर्थव्यवस्था और नागरिक जीवन की सर्वशक्तिमान माई-बाप बनती गई।
ऐसे ही इंदिरा गांधी के समय विश्वविद्यालयों, इतिहास, संस्कृति, अकादमिक संस्थानों, मीडिया और दिल्ली के नीति-विमर्श में लेफ्ट का नया प्रगतिशील प्रतिष्ठान बना। सही है, उसमें बैठे सभी लोग कम्युनिस्ट नहीं थे। लेकिन आधुनिक, वैज्ञानिक और प्रगतिशील कहलाने की खास भाषा जरूर सभी चेहरों-मठाधीशों—शिक्षा मंत्री, उपकुलपतियों, कला-साहित्य-संस्कृति आदि क्षेत्रों में—की थी।
उस भाषा, उस सोच में धर्म को सार्वजनिक जीवन में लेकर चलने वाला हिंदू आसानी से रूढ़िवादी करार दिया जाता। जबकि धार्मिक अल्पसंख्यक की सामुदायिक पहचान की रक्षा सेकुलर राज्य का दायित्व। जाति पर बात करना प्रगतिशीलता, वहीं सनातनी धर्म और सभ्यता पर बात करते हुए सफाई देती हुई झिझक।
इसलिए ‘लेफ्ट’ का अर्थ, उसके जुगालीबाजों का दायरा बहुत विस्तृत रहा है।
बात केवल सीपीआई, सीपीएम या सीपीआई-एमएल का पार्टी कार्ड रखने वालों की ही नहीं है। समाजवादी कम्युनिस्ट नहीं थे। लोहियावादी और मार्क्सवादी एक नहीं थे। आंबेडकरवादी भी कम्युनिस्ट नहीं। एनजीओ एक्टिविस्ट और अधिकारवादी नागरिक समाज को भी कम्युनिस्ट कहना गलत होगा। इन सबके आपसी झगड़े और वैचारिक फर्क गहरे हैं।
लेकिन समय के साथ लुटियंस दिल्ली में इन धाराओं के मेल से एक व्यापक वाम-प्रगतिशील सत्ता-बौद्धिक मानस की दबंगी बनी। समाज को वर्ग, जाति, लिंग, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक और उत्पीड़क-उत्पीड़ित के खांचों से देखने की प्रवृत्ति पूरे देश में पसरती गई। यही मेरे ‘लेफ्ट’ के आशय का व्यापक वैचारिक खमीर है।
मगर कमाल या त्रासदी देखिए। लेफ्ट का रौब, हल्ला जैसे-जैसे बढ़ा, वैसे-वैसे कम्युनिस्टों, वामपंथियों, समाजवादियों की चुनावी और वैचारिक हैसियत जीरो होती गई। वोट में सिकुड़ते गए, लेकिन उनकी बनाई भाषा, जुमलों के फतवे बढ़ते गए।
एक वक्त था जब संसद में दर्जनों सांसद थे। संसद में कांग्रेस के बाद सीपीआई नंबर दो की पार्टी! बंगाल, केरल, त्रिपुरा में सरकारें। ट्रेड यूनियनों में दबदबा। विश्वविद्यालयों में प्रभाव। संगठित कम्युनिस्ट आंदोलन कभी राष्ट्रीय राजनीति की बड़ी शक्ति था। पश्चिम बंगाल में चौंतीस साल सरकार थी। पर आज वहां नामलेवा नहीं है। ऐसी ही त्रिपुरा की दशा हुई। लोकसभा में सीटें और वोट सिकुड़ते गए। आज राजनीति में वाम हाशिये से भी बाहर है!
मगर उससे निकली व्यापक प्रगतिशील शब्दावली, विमर्श के शब्द गैर-भाजपाई राजनीति की मुख्य धारा हुए। जैसे सामाजिक न्याय, हिस्सेदारी, प्रतिनिधित्व, अल्पसंख्यक अधिकार, बहुसंख्यकवाद, पितृसत्ता, उत्पीड़क-उत्पीड़ित।
यानी वोट में हार, शब्दों की जुगाली से राष्ट्रीय मीडिया की पहचान!
मेरा मानना है कि सीपीआईएम, कम्युनिस्टों की सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता पश्चिम बंगाल पर चौंतीस साल राज या केरल में सरकारें बनाने की नहीं है। उससे बड़ी सफलता अपने वोट से कई गुना बड़ा दिल्ली में वैचारिक प्रभाव पैदा करना था। विश्वविद्यालय से मीडिया तक। संस्कृति से इतिहास तक। सरकार की सलाहकारी दुनिया से कांग्रेस की राजनीतिक भाषा तक। चुनाव वे हारते गए, लेकिन भारत को देखने का उनका चश्मा अलग-अलग रूपों में कांग्रेस और गैर-भाजपाई दलों में पुख्ता होता गया।
मेरा खांटी कांग्रेसियों—वसंतदादा पाटिल, ए. आर. अंतुले, माखनलाल फोतेदार, आर. के. धवन, कमलापति त्रिपाठी से अहमद पटेल, अंबिका सोनी, सतीश शर्मा तक के जरिए कांग्रेस में विचार, सत्ता और संगठन चलाने वाले घेरे से गहरा जानने-समझने का रिश्ता रहा है। उसी तरह राष्ट्रीय राजनीति के सतरंगी विचारों और चेहरों की असलियत मैंने शरद यादव, लालू यादव, गोपी अरोड़ा, मणिशंकर अय्यर, सीताराम येचुरी जैसे लोगों से हुई गपशप में भी जानी है।
इसलिए मेरे लिए दिल्ली केवल सरकारों और फाइलों का इतिहास नहीं है। वह उन लोगों, बैठकों, सलाहों और विचारों का भी इतिहास है जिनसे सत्ता का मन बनता था, बना होता था, बिगड़ता था।
उसी अनुभव से मेरा निष्कर्ष है—मोरारजी देसाई आए, चरण सिंह आए, चंद्रशेखर आए, देवगौड़ा और गुजराल आए, नरसिंह राव आए, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह आए। सरकारें बदलती रहीं। गठबंधन बदलते रहे। चेहरे, पार्टियां और नारे बदले। लेकिन दिल्ली के सत्ता-बौद्धिक संसार में कम्युनिस्ट-समाजवादी विचार, प्रगतिशील जमात और राष्ट्रीय मीडिया में उसकी गूंज स्थायी खमीर की तरह बनी रही।
आटा किसी का रहा हो, खमीर लेफ्ट ही रहा।
जनता पार्टी आई तो आटा-परात बदली। वी. पी. सिंह आए तो फिर बदला। संयुक्त मोर्चा आया तो प्रधानमंत्री तक बदलते रहे। नरसिंह राव ने अर्थव्यवस्था की दिशा बदल दी। 1991 के बाद बाजार खुला, निजी पूंजी का दायरा बढ़ा, लाइसेंस-परमिट राज टूटना शुरू हुआ। बावजूद इसके आर्थिक नीति बदलने का अर्थ यह नहीं था कि दिल्ली का सामाजिक-सांस्कृतिक शब्दकोश भी उसी गति से बदला हो।
फिर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आई। पहली बार दिल्ली में दूसरा वैचारिक परिवार पूरी तरह सत्ता में बैठा। मगर सरकार बदलने से विश्वविद्यालय, मीडिया, संस्कृति और बौद्धिक प्रतिष्ठान रातोंरात नहीं बदलते हैं! सत्ता भाजपा की थी, लेकिन दिल्ली की स्थापित बौद्धिक भाषा का बड़ा हिस्सा पुराना बना रहा।
फिर मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार आई और कहानी ने लगभग पूरा चक्र पूरा किया। वामपंथ स्वयं सरकार में शामिल हुए बिना सरकार के अस्तित्व का महत्वपूर्ण खंभा था। दूसरी तरफ सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद—एनएसी—ने अधिकार-आधारित राजनीति को नया संस्थागत रूप दिया।
नतीजा था—रोजगार का अधिकार। सूचना का अधिकार। भोजन का अधिकार। वन अधिकार आदि, आदि।
इनमें कई अधिकार अपने आप में जरूरी, न्यायसंगत और ऐतिहासिक बनते हैं। भला गरीब को रोजगार की सुरक्षा क्यों न मिले? नागरिक को सूचना क्यों न मिले? भूखे को भोजन क्यों न मिले? आदिवासी के वन अधिकार क्यों न हों? मेरा प्रश्न इन अधिकारों की जरूरत से नहीं है।
बल्कि सवाल उस राजनीति का है जिसमें धीरे-धीरे नागरिक और सरकार का पूरा रिश्ता ‘मुझे राज्य से क्या मिलेगा’ में सिमटता है और नागरिक भीड़ में कनवर्ट हो कतार में लगा भिखारी होता है। वोट और राजनीति लेने-देने का सौदा, मंडी बनती है।
नेहरू के समाजवादी राज्य ने सरकार को उत्पादक और माई-बाप बनाया था। इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ में गरीब को सीधे सत्ता की वोट राजनीति से जोड़ा। मंडल के बाद राज्य अवसर और हिस्सेदारी बांटने वाला हुआ। वही सोनिया गांधी के एनएसी के दौर में अधिकार राजनीति की केंद्रीय नैतिक भाषा बना।
फिर नरेंद्र मोदी आए।
और यहीं इतिहास का सबसे मजेदार उलटफेर है।
जिस भाजपा ने दशकों कांग्रेस के समाजवाद, सेकुलरवाद और वोट बैंक की राजनीति को कोसा, उसने सत्ता में आकर माई-बाप राज्य को खत्म नहीं किया। उसने उसे तकनीक, आधार, बैंक खाते, मोबाइल और सीधे हस्तांतरण की क्षमता देकर कहीं अधिक शक्तिशाली बना दिया।
कांग्रेस ने अधिकार दिया, मोदी ने खाते में पैसा पहुंचाया।
कांग्रेस ने कल्याणकारी राज्य बनाया, मोदी ने उसे लाभार्थी राज्य बनाया।
राशन, गैस, मकान, शौचालय, किसान सम्मान निधि और सीधे लाभ हस्तांतरण के साथ सरकार और नागरिक के बीच नेता का एक नया निजी रिश्ता बना। पहले आदमी सरकार से अधिकार मांगता था। अब उसके मोबाइल पर संदेश आता है कि पैसा पहुंच गया। लाभ योजना का है, लेकिन राजनीतिक स्मृति में देने वाला दानदाता नेता है।
यानी नरेंद्र मोदी ने इस परंपरा को तोड़ा नहीं। उसे उसकी चरम परिणति तक पहुंचाया।
मैंने संघ के एक पदाधिकारी, दत्तात्रेय होसबाले, को यह भाषण करते सुना है कि आरएसएस के कई आइडिया लेफ्टिस्ट हैं। हिंदुत्व न लेफ्ट है, न दक्षिणपंथी।
इसीलिए मैंने इस सीरीज को शुरू करते हुए पहले पैरा में लिखा था कि संघ ऐसा लुढ़कता लोटा है जिसका न गांधी के राम से नाता है, न दूसरे छोर के सावरकर और मदनमोहन मालवीय के हिंदुत्व और हिंदू समझ से।
कुल मिलाकर वैचारिक रूप से एक-दूसरे की दुश्मन दिखाई देने वाली कांग्रेस और भाजपा इस मामले में स्वतंत्र भारत के उसी माई-बाप राज्य की अलग-अलग मंजिलें हैं।
सो सनातनी भारतीय की कांग्रेस की यात्रा के दौरान की दशा-दिशा पर गौर करें।
गांधी के समय वह स्वराज मांगने वाला व्यक्ति था। नेहरू के समय योजना और राशन का कतारबद्ध नागरिक हुआ। इंदिरा के समय ‘गरीबी हटाओ’ का गरीब।
वही मंडल के बाद वी. पी. सिंह के समय से जाति और हिस्सेदारी का दावेदार। यूपीए में अधिकार की भाषा-झुनझुनों वाला नागरिक। और नरेंद्र मोदी के समय सीधे लाभ पाने वाला लाभार्थी।
79 वर्षों की यात्रा में पुरुषार्थ, स्वावलंबन और राज्य से दूरी का स्वतंत्र-स्वावलंबी-रामराजी गांधीवादी विचार कहां गया? गांधी के रामराज्य, गीता, प्रार्थना, सत्य, अहिंसा, सर्वधर्म समभाव जैसे सभ्यतागत सनातनी प्रतीकों का कांग्रेस में क्या हुआ?
ऐसे ही सावरकर के धर्मशास्त्रों की प्रामाणिकता की जगह बुद्धिवाद और विज्ञान से पके, छुआछूत और जातिभेद मिटाने की दृढ़ता वाले हिंदुत्व का क्या हुआ? तो हिंदू महासभा के मदनमोहन मालवीय के नैतिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान और आधुनिकता के संतुलन वाले सुधारवादी सनातनी नागरिक कल्पना की कैसी ऐसी-तैसी हुई?
तीनों धाराएं अलग थीं। लेकिन तीनों में एक बात साझा थी—भारतीय समाज को भीतर से सुधारना था, अपनी सभ्यता से काटकर नया मनुष्य गढ़ना नहीं।
यहीं लेफ्ट की छाया, उसके वायरस की असली गंभीरता है। उसने राष्ट्र, समाज, संस्कृति और सभ्यता ही नहीं, राज्य, अर्थव्यवस्था और नागरिक—चारों के आपसी रिश्ते का बाजा बजाया। राजनीति में विकृतियां पैदा कीं।
इसी के समानांतर दूसरी प्रक्रिया पहचान की राजनीति की है।
मार्क्सवाद की मूल इकाई वर्ग थी। मजदूर और पूंजीपति। श्रम और पूंजी। शोषित और शोषक। लेकिन भारत वर्ग भर का समाज नहीं था। यहां जाति थी, धर्म था, जनजाति थी, क्षेत्र था और असंख्य सामाजिक श्रेणियां थीं। इसलिए वर्ग का चश्मा धीरे-धीरे जाति, धर्म, लिंग और समुदाय पर चढ़ा।
दलित उत्पीड़न झूठ नहीं है। पिछड़ों का कम प्रतिनिधित्व वास्तविकता है। स्त्री की गैरबराबरी, आदिवासी विस्थापन, अल्पसंख्यकों का विश्वास भी वास्तविक चिंता है।
मगर इस सबको उत्पीड़क और उत्पीड़ित में बांधने और देश, नस्ल, सभ्यता, संस्कृति, बहुसंख्यकों के जीवन को चक्की में पीस देना क्या किसी और देश-सभ्यता में हुआ है? किसके पास कितना है और किसे कितना हिस्सा मिलना चाहिए—क्या ऐसे ही जुमले में बाकी देशों, यहां तक कि वामपंथी-कम्युनिस्ट देशों ने अपना सफर बनाया?
लेफ्ट-प्रगतिशीलों की जुमलेबाजी में असलियत में आम व्यक्ति पीछे छूटा। वह बेगाना बना। नागरिक पीछे छूटा। जस का तस मालिक की और ताकता हुआ।
गरीब को कनवर्ट किया गया—दलित गरीब, ओबीसी गरीब, मुस्लिम गरीब, सवर्ण गरीब। नौजवान बेरोजगार भर नहीं रहा; उसकी बेरोजगारी में भी उसकी सामाजिक श्रेणी खोजी जाने लगी। महिला नागरिक भर नहीं, पितृसत्ता की पीड़ित इकाई बन गई।
मुसलमान नागरिक से अधिक स्थायी ‘अल्पसंख्यक’ बना। हिंदू नागरिक से अधिक सांप्रदायिक ‘बहुसंख्यक’।
संघ ने इसी विभाजन को उलटकर अपना राजनीतिक अवसर बनाया। मुसलमान को संदिग्ध, कभी पाकिस्तानी मानसिकता वाला तक बताया और हिंदू पर मंदिर-मस्जिद, धर्म-संकट और असुरक्षा का भूत सवार किया। वह अपने ही देश में भय और असुरक्षा में नरेंद्र मोदी को महाबली मानने लगा।
सो कांग्रेस ने पूछा—तुम्हारी जाति क्या है? तुम्हारा हिस्सा कितना है? तुम्हारा अधिकार क्या है?
संघ ने पूछा—तुम्हारा धर्म क्या है? तुम्हारी सभ्यता क्या है? तुम्हारी सुरक्षा का क्या?
एक राजनीति ने आदमी को सामाजिक हिस्सों में पढ़ा। दूसरी ने उन्हीं हिस्सों को एक सामूहिक हिंदू पहचान में जोड़ना शुरू किया। राजनीति में खाली जगह कभी खाली नहीं रहती। जिस आदमी को कांग्रेस अलग-अलग खांचों में पहचान रही थी, संघ ने उसे एक नाम दिया—हिंदू।
यही वह जमीन थी जिस पर अयोध्या से नरेंद्र मोदी तक की राजनीति खड़ी हुई।
इसलिए वामपंथियों-कम्युनिस्टों की असफलता को केवल उनकी लोकसभा सीटों से नापना इतिहास को अधूरा पढ़ना है। वे अपने लिए भारत नहीं जीत पाए। लेकिन जिस कांग्रेस के पास भारत का सबसे व्यापक सामाजिक आधार था, सर्वधर्म समभाव का गांधी आधार था, उसकी सोच और भाषा बदलने में उनका और व्यापक प्रगतिशील मानस का असर बुनियादी तौर पर गांधी और उनके राम को हाशिए में डालने वाला हुआ है।
कांग्रेस धीरे-धीरे अपनी उस सभ्यतागत सहजता से दूर हुई जिसमें गांधी राम कहते हुए मुसलमान को गले लगा सकते थे। धर्म से दूरी सेकुलर होने की निशानी बनी। और जिस जमीन को कांग्रेस ने खाली किया, उस पर संघ ने राम, धर्म, मंदिर, सभ्यता और सुरक्षा—सब पर अपना झंडा गाड़ दिया।
मगर इतिहास की विडंबना इससे भी बड़ी है।
वामपंथ का प्रभाव केवल कांग्रेस को बदलने तक सीमित नहीं रहा। जिस भाजपा ने उसी के विरुद्ध हिंदू राजनीति खड़ी की, उसने सत्ता में आने के बाद राज्य के उस विशाल माई-बाप ढांचे को नष्ट नहीं किया जिसे नेहरू, इंदिरा और बाद की अधिकारवादी राजनीति ने बनाया था। उसने उसी राज्य को अधिक केंद्रीकृत, अधिक तकनीकी और अधिक प्रत्यक्ष बना दिया।
लेफ्ट का राज्य और संघ का राष्ट्रवाद अंततः एक विचित्र जगह आकर मिले—शक्तिशाली सरकार और आश्रित नागरिक में।
एक ने कहा, राज्य तुम्हें अधिकार देगा।
दूसरे ने कहा, नेता तुम्हारे खाते में सीधे पैसा जमा करा देगा।
सोचें, दोनों में भारत की कुल आबादी के कितने नागरिक अब अपने पैरों पर खड़े हैं?
पूरा देश, पूरी नस्ल आज मोहताज है सत्ता की, प्रधानमंत्री की, वादों की राजनीति की।
और कांग्रेस के लिए इस कहानी में सबसे निर्णायक मोड़ राजीव गांधी थे। क्योंकि राजीव पुराने समाजवादी भारत से निकलकर कंप्यूटर और इक्कीसवीं सदी का आधुनिक भारत बनाना चाहते थे। लेकिन तभी उनके सामने शाहबानो, अयोध्या, मुस्लिम पर्सनल लॉ और उठती हिंदू अस्मिता के वे सवाल आए जिनका उत्तर न पुराने कांग्रेसी सहज भाव में था, न उनके आसपास बनते नए सेकुलर-प्रगतिशील घेरे के पास।
वही राजीव गांधी बुरी तरह उलझे।
और लगभग चार दशक बाद, आज 2026 में राहुल गांधी फिर उसी प्रश्न के सामने हैं—कांग्रेस में क्या इतना भी अपना दिमाग बचा है कि वह भारत को अपनी आंख से पढ़े? या राजनीति बाहर के पिछलग्गू कथित वैचारिक सलाहकारों का चश्मा पहनकर ही करनी है?
यहीं से कहानी व्यक्ति-केंद्रित होती है।
इस नाते फिर राजीव से राहुल तक का सफर भी कम गौरतलब नहीं।(जारी)
