सन् 2029 के लोकसभा चुनाव तक भारत की जनरेशन-जेड यानी 35 वर्ष से कम उम्र की नौजवान पीढ़ी पर तलवार तय है। हां, हर घर-परिवार में 18–19, 20–24, 25–29 और 35 वर्ष से कम उम्र की नौजवान पीढ़ियों के असंख्य यूथ बिना वोट अधिकार के हो सकते हैं। कैसे, क्यों? इन लड़के-लड़कियों को न केवल Form-6 के बेहूदा, अनावश्यक सवालों के जवाब देने होंगे, बल्कि एसडीएम दफ्तरों, कैंपों, कर्मचारियों को बार-बार जवाब देना होगा। फॉर्म और चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर की कसौटियों में इन्हें मताधिकार के लिए लड़ना होगा। कर्मचारियों से बहस करनी होगी। नहीं तो चुनाव के समय घर बैठे रहना होगा।
आज किसी के पास उम्रवार राष्ट्रीय हिसाब नहीं है। चुनाव आयोग ने ऐसा डेटा सार्वजनिक नहीं किया है, जिससे पता चले कि देश भर के SIR में 18–19, 20–24, 25–29 या 30–35 वर्ष के कितने मतदाता draft rolls से बाहर हुए। मगर तथ्य है कि भारत की आबादी असाधारण रूप से युवा है। 2029 में 18–35 वर्ष की आबादी का मोटा demographic pool करीब 35–40 करोड़ हो सकता है। यह मतदाताओं की संख्या नहीं, आबादी का अनुमान है। मगर इसी से पैमाना समझिए। और यह मानना गलत नहीं होगा कि ये 35–40 करोड़ यूथ मोटामोटी फोन भी लिए हुए है। सोशल मीडिया से जुड़े हैं, अपनी राय रखते हैं। इसलिए 2029 की चुनावी राजनीति में जनरेशन-जेड केवल वोटर नहीं, सत्ता और विपक्ष दोनों की खुर्दबीन में रहने वाला विराट राजनीतिक वर्ग होगा।
इस वर्ग की पहली मुश्किल उम्र में ही लिखी हुई है। ध्यान रहे, 2029 के लोकसभा चुनाव का 35 वर्षीय व्यक्ति 1994 में पैदा हुआ होगा। वह 2002 में सिर्फ आठ साल का था। तीस साल वाला 1999 में पैदा हुआ था। पच्चीस साल वाला 2004 में और अठारह साल वाला 2011 में। मतलब 2029 की पूरी 18–35 वर्षीय चुनावी पीढ़ी का अपना नाम उस SIR voter list में हो ही नहीं सकता, जिसमें सन् 2002 का वोटर कार्ड कसौटी है। यही verification architecture का महत्वपूर्ण reference है।
चुनाव आयोग का SIR portal नागरिक को 2002/03 की last-SIR electoral roll में अपना अथवा अपने relative का नाम खोजने को कहता है। यहां तक निर्देश है कि एक spelling में नाम न मिले तो दूसरी spelling आजमाइए। दिल्ली में वर्तमान मतदाता का अपना नाम 2002 की सूची में न हो लेकिन माता-पिता का हो तो Enumeration Form में माता-पिता अथवा relative की पुरानी entry का विवरण दिया जाए। सोचें, डिजिटल इंडिया में 2029 का नौजवान अपने वोट की genealogy सन् 2002 के मां-बाप के voter record में तलाशे!
और यदि draft roll में नाम नहीं आया? तब eligible elector Form-6, declaration और supporting documents के साथ inclusion claim करे। यानी जिस शासन के पास नौजवान का Birth record है, Aadhaar है, स्कूल-कॉलेज का रिकॉर्ड है, PAN है, बैंक KYC है, मोबाइल है, ड्राइविंग लाइसेंस है और जिसे सरकार DBT देने, टैक्स लेने या बैंक खाता authenticate करने में पहचानती है, उसी लोकतंत्र के सबसे बुनियादी अधिकार के वक्त नौजवान नागरिक पुराने voter roll में अपने मां-बाप को तलाशे और Form-6 भरकर फिर अपना क्लेम करे! तो यह लोकतंत्र है या यूथ पर तलवार लटका कर उससे खानदान का वैध बेटा-बेटी, बहू या नई पीढ़ी होने के प्रमाण मांगकर उसका मताधिकार तय करने वाला मनमाना तंत्र?
दिल्ली के अनुभव से पैमाना समझें। लगभग 1.45 करोड़ pre-SIR electorate में करीब 47.56 लाख नाम draft roll में नहीं थे। इन्हें Absentee, Shifted, Duplicate और Deceased जैसी श्रेणियों में रखा गया। इसका अर्थ यह नहीं कि 47.56 लाख नागरिक स्थायी रूप से मताधिकार गंवा चुके हैं। eligible voter inclusion claim कर सकता है। मगर असली सवाल है, इन 47.56 लाख में 18–19 साल वाले कितने हैं? 20–24 कितने? 25–29 और 30–35 कितने? चुनाव आयोग इसका उम्रवार हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं करता?
नौजवान की vulnerability बूढ़े मतदाता से अलग है। वह पढ़ाई के लिए घर छोड़ता है। नौकरी के लिए दिल्ली से गुरुग्राम, पुणे, बेंगलुरु जाता है। किराये का मकान बदलता है। शादी होती है। लड़की का घर-पता बदलता है। Aadhaar एक पते का, नौकरी दूसरे शहर में और voter registration तीसरी जगह का हो सकता है। यानी भारत की सर्वाधिक mobile आबादी वही है, जिसकी अपनी entry 2002 की सूची में हो ही नहीं सकती।
इसलिए यदि 2029 के 35–40 करोड़ के 18–35 demographic pool में सिर्फ एक प्रतिशत भी verification, mapping, shifting अथवा re-enrolment की समस्या में पड़े तो संख्या 35–40 लाख होती है। पांच प्रतिशत हुआ तो करीब दो करोड़। दस प्रतिशत हुआ तो साढ़े तीन-चार करोड़। यह भविष्य में काटे जाने वाले वोटों की भविष्यवाणी नहीं है। यह सिर्फ उस खतरे का गणित है, जिसमें मामूली error अथवा friction rate भी भारत जैसे देश में करोड़ों नागरिकों का सवाल बन जाता है।
और फिर सोचें, इस साजिशी software की कसौटी कितनी फूलप्रूफ है? दिल्ली SIR में स्वयं Election Commissioner सुखबीर सिंह संधू को centralized software ने “self name mismatch” में flag कर दिया। वे उन 31.63 लाख दिल्ली मतदाताओं में थे, जिन्हें discrepancy अथवा दूसरे कारणों से notice मिला। बाद में ERO ने उनकी entry verify करके valid की। मतलब सॉफ्टवेयर ने जब चुनाव आयुक्त को भी संदिग्ध बना दिया तो आम नौजवान की क्या बिसात!
लेकिन कहानी यहां और अधिक गंभीर है। चुनाव आयोग के भीतर से स्वयं दो Election Commissioners- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने electoral-roll database और IT architecture के केंद्रीकरण पर लगातार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। यह किसी एक फाइल की मामूली टिप्पणी नहीं थी। दस महीनों में दोनों आयुक्तों ने कम-से-कम चौदह बार आपत्तियां दर्ज कीं और मामला Cabinet Secretary तक पहुंचा।
चार नवंबर को Deputy Election Commissioner ने DG-IT सीमा खन्ना और दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों को लिखा कि ERO, DEO और CEO के जो statutory functions हैं, वे उन्हीं को करने हैं और IT system कानून के अनुरूप होना चाहिए, “without any exception”। दो जनवरी को फिर कहा गया कि software ऐसा हो, जिससे ERO को कानून से मिली discretion restricted न हो। 16 अप्रैल को संधू ने फाइल पर लिखा कि IT division ने कई नए modules और portals बनाए, लेकिन Commissioners को जानकारी नहीं दी गई और कई developments का पता उन्हें मीडिया से चला।
फिर 29 मई को विवेक जोशी ने खतरे का नाम ही दर्ज कर दिया—“gradual centralisation of the electoral roll database.” उन्होंने independent audit का सुझाव दिया ताकि यह प्रमाणित हो कि statutory authorities के अलावा किसी दूसरे व्यक्ति के पास voter database में बदलाव करने के credentials नहीं हैं। अगस्त में संधू ने दर्ज किया कि राज्यों के CEO, DEO और ERO शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें ERONet का “proper and complete access” नहीं है। उन्होंने लिखा कि DG-IT को statutory authorities की कानून से मिली access और operational freedom रोकने का कोई legal authority नहीं है।
यहां सवाल किसी सीमा खन्ना नाम की अफसर का नहीं है। सवाल एक अरब मतदाताओं की डिजिटल तिजोरी का है। उसकी कौन-सी digital key किसके पास है? कौन entry बदल सकता है? कौन permission रोक सकता है? हर बदलाव का audit trail है या नहीं? यदि Election Commissioners को स्वयं independent audit मांगना पड़ा कि statutory authorities के अलावा किसी के पास database बदलने के credentials तो नहीं हैं, तब भारत के मतदाता को इसका जवाब क्यों नहीं मिलना चाहिए?
और गोवा ने दिखाया कि यह केवल theoretical सवाल नहीं है।
वहां 97 मतदाताओं का मामला सामने आया। स्थानीय ERO/AERO ने सुनवाई की, कागज देखे और उन्हें eligible पाया। सामान्य लोकतांत्रिक व्यवस्था में आगे क्या होना चाहिए था? ERO कानून से अधिकृत अधिकारी है। उसने फैसला किया कि नागरिक योग्य है। कंप्यूटर में नाम वापस डालो। बात खत्म।
मगर बात वहीं से शुरू हुई।
ECINet/IT workflow में स्थानीय अधिकारी अपना फैसला operationalise नहीं कर पा रहा था। गोवा के चुनाव अधिकारियों ने दिल्ली को लिखा। एक ईमेल, दूसरा, तीसरा, सात दिनों में आठ ईमेल। 17 फरवरी को final electoral roll निकलने में सिर्फ चार दिन बाकी थे तो Goa Chief Electoral Officer ने आठवीं बार चुनाव आयोग को लिखा। साथ में उन 97 मतदाताओं की सूची थी, जिन्हें स्थानीय अधिकारी योग्य मान चुके थे।
अगले दिन चुनाव आयोग के अपने Deputy Election Commissioner ने DG-IT सीमा खन्ना को लिखा। सार था- IT system सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार जरूरी कार्रवाई को block नहीं कर सकता; ERO/AERO के फैसले के अनुसार कार्रवाई करनी ही चाहिए थी। इससे अधिक और क्या चाहिए? सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया थी, वैधानिक अधिकारी का निर्णय था, राज्य के Chief Electoral Officer की लगातार चिट्ठियां थीं और चुनाव आयोग के Deputy Election Commissioner का निर्देश था। फिर भी 21 फरवरी को final voter list जब निकली तो 97 के 97 नाम गायब थे!
दो टूक सवाल है- सार्वभौम कौन? संसद के कानून से अधिकार पाया ERO या software architecture और उसकी गेटकीपर सीमा खन्ना?
तभी राजनीतिक साजिश, संदेह गहरा है। सवाल है जंतर-मंतर के नौजवान आंदोलनों और सोशल मीडिया पर नई पीढ़ी की मुखरता के बाद क्या मुस्लिम और दलित के साथ असंतुष्ट नौजवान, Gen-Z भी नरेंद्र मोदी-अमित शाह के लिए राजनीतिक चिंता-वर्ग नहीं बना है? सोशल मीडिया पर यही पीढ़ी प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाती है, सरकार का विरोध करती है वही नेताओं की भक्त यूथ भी कीर्तन करते है। सरकार और राजनीतिक दल दिनरात social-media analytics करते होते् हैं। भाजपा का बूथ और पन्ना-प्रमुख संगठन मतदाताओं पर राजनीतिक feedback जुटाता है। जाहिर है 2029 की चुनाव रणनीति में यूथ और उसका सोशल मीडिया व्यवहार भाजपा के लिए सर्वाधिक निर्णायक होगा।
तभी चुनाव डाटाबेस किसी बाहरी, गैरकानूनी डाटा-राजनैतिक प्रोफाइलिंग (external database or political profiling याकि कथित पन्ना प्रमुखों की नेटवर्किग व डाटा) से जोड़ने का खटका बनता है। “मोदी भक्त बनाम मोदी विरोधी”, मुस्लिम, दलित अथवा Gen-Z जैसी political profiling से electoral records को सीधे अपनी चौकीदारी में अपना हितकारी बनाया जा सकता है। आज किसी के पास जवाब नहीं है कि ECINet का क्या कभी audit हुआ है, किसने क्या है? उससे क्या सौ प्रतिशत फूलप्रूफ प्रमाणित है कि ऐसा नहीं हो सकता जैसा गोवा में हुआ? आगे ऐसा कतई नहीं होगा। चेक-बैलेंस है या नहीं? अलग-अलग लेवल पर जिम्मेदारी-जवाबदेही तय हुई है? क्या गोवा के सबूत के बाद सीमा खन्ना से जवाब तलब हुआ? क्या ज्ञानेश कुमार अपने दफ्तर में खुद या अपने सचिवों से ECINet डाटा जंचवा सकते है? आखिर किस स्तर पर साफ्टवेयर-सिस्टम की ऑडिट-निगरानी है? क्या इसे संसदीय कमेटियों में जंचवाया, चेक कराया जा सकता है? किसके पास read access है, किसके पास write access और किसके पास override permission?
जब तक यह नहीं होता, यह नहीं बताया जाता तब तक सभी को यह मानने का हक है कि ECINet/ सीमा खन्ना के “Super Admin” मोदी, अश्विनी वैष्णव, अमित शाह हैं। आखिर दो Election Commissioners की लिखित आपत्तियों के बाद तो इस सिस्टम की सार्वजनिक जवाबदेही होनी चाहिए कि ECINet का वास्तविक Super Admin कौन है? और देश के लगभग एक अरब मतदाताओं को उसका नाम, अधिकार और audit trail क्यों नहीं लोगों को, संसद को, सुप्रीम कोर्ट को मालूम होनी चाहिए?
मुझे अपने लड़कपन का समय याद है। चुनाव से पहले सरकारी कर्मचारी घर आता था। लिस्ट लेकर पूछता था- कौन जीवित है, कौन मर गया, कौन लड़का-लड़की अठारह (या 21) का हो गया? मतलब तब राष्ट्र नाम जोड़ने की जिम्मेदारी अपनी मानता था। उसी से कांग्रेस और जनसंघ के कार्यकर्ता मतदान से पहले voter slip घर पहुंचाते थे। लोकतंत्र का भाव था- नागरिक को खोजो और वोट डलवाओ। चुनाव के महायज्ञ में हर नागरिक की आहुत हो।
आज, सन् 2026 में सब उलटा है। सोचें, पहले नागरिक अपना नाम खोजे। 2002 का रिकॉर्ड खोजे। मां-बाप का नाम खोजे। notice देखे। जरूरत हो तो Form-6 भरे। दफ्तर जाए। चक्कर लगाए। अपना नाम वापस सूची में लाए।
वसंत कुंज का अनुभव इसी कारण मेरे लिए आंकड़ा नहीं, चेतावनी है। महीनों से परिवारों में लड़के-लड़कियां, बेटे-बेटियां, बहुएं और बूढ़े अपने records देख रहे हैं। मैंने ऐसी बूढ़ी महिला का किस्सा सुना, जिसने झल्लाकर पुराने कागज ERO/BLO के सामने फेंक दिए- ले तेरे कार्ड, मुझे नहीं डालना वोट!
यही 2029 और Gen-Z का भी असल मसला है, सवाल है।
देश भर में SIR की draft rolls से 13 करोड़ से अधिक पुराने नाम बाहर हुए हैं। इसका अर्थ 13 करोड़ लोगों का स्थायी disenfranchisement नहीं है। claims, objections और verification से नाम वापस आ सकते हैं। मगर चुनाव आयोग को अब उम्रवार हिसाब सार्वजनिक करना चाहिए। 18–19 कितने? 20–24 कितने? 25–29 कितने? 30–35 कितने? इनमें dead कितने, duplicate कितने, shifted कितने और unmapped कितने? कितनों को notice मिला? कितनों ने Form-6 भरा? कितने वापस आए और final roll में कितने बाहर रह गए?
तभी पता चलेगा कि Gen-Z के वोटों को कैसी बेरहमी से मारा जा रहा है या उनके नाम उनकी मोदी-योगी-शाह-संघ की वफादारी से जुड़ रहा, बढ़ रहा या घट रहा है?
इससे भी बड़ा सवाल बतौर राष्ट्र-राज्य संविधान-नागरिक के रिश्तों का है। सवाल है डिजिटल भारत में मताधिकार बचाए रखने का बोझ किसका है? क्यों भारत राष्ट्र-राज्य का नागरिक अपने को बार-बार राज्य के सामने प्रमाणित करे? जिस राज्य के पास नागरिक के जीवन के दर्जनों digital records हैं, क्या उसका पहला लोकतांत्रिक कर्तव्य, यह ड्यूटी नहीं कि वह सुनिश्चित करे कि एक भी योग्य नागरिक database, address, spelling, mapping या software की भूल, चूक, धांधली में वोट से बाहर न हो? (जैसे की 2014 से पहले ईमानदारी से कोशिश होती थी)
