जंतर-मंतर से देश में बिगड़ी हवा से ध्यान बंटाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश घूम रहे है। जुलाई के आखिर से वे या तो विदेश घूम रहे है या दिल्ली में वैसा ही विश्व तमाशा बना रहे है जैसे 2024 के आम चुनाव से पहले जी-20 सम्मेलन का तमाशा था। इस बार का तमाशा भारत के हितों के लिए घातक होता लग रहा है। ब्रिक्स अध्यक्ष के नाते दिल्ली में ब्रिक्स देशों के नेताओं का आना होगा। इसे सफल बनाने के लिए विदेश मंत्री एस जयशंकर मॉस्को गए। राष्ट्रपति पुतिन से मिले। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल सीमा विवाद पर प्रतिनिधि स्तर की 25वीं वार्ता के लिए बीजिंग गए तो उन्होने वहां विदेश मंत्री वांग यी के साथ वार्ता की। उस वार्ता के आठ आउटकम का खूब हल्ला हुआ है। फिर प्रधानमंत्री मोदी उज्बेकिस्तान के दौरे पर गए, जहां उन्होंने ताशकंद में दोपक्षीय वार्ता की। उसके बाद किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक गए, जहां शंघाई शिखर सम्मेलन यानी एससीओ की बैठक में हिस्सा लिया। वहां प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति पुतिन के साथ बात की और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी मुलाकात की। इन्हे दिल्ली बैठक के लिए राजी किया। यही नहीं प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से भी बात की। वे भी शायद आ रहे है।
मतलब 12 और 13 सितंबर के दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीन, रूस और ईरान के राष्ट्रपति के जमावड़े का तमाशा है। इसका कूटनैतिक धमाका बनाने के लिए विदेश मंत्री जयशंकर यूक्रेन भी गए थे। सो, देखने में लग रहा है कि भारत की कूटनीति के जलवे वैश्विक है। पर इस सबसे, इसके बदले भारत को असल में क्या हासिल होगा? कुछ नहीं। उलटे अमेरिया, पश्चिमी- योरोप देशों, भू राजनीति में चीन, रूस, व ईरान तीनों दिल्ली यात्रा से अपनी धमक दिखलाएंगे। कैसे? सोचे, विदेश मंत्री जयशंकर ने यूक्रेन में अमेरिका को आंख दिखाने के अंदाज में कहा कि रूस से तेल खरीदना बंद कर देने से रूस और यूक्रेन युद्ध खत्म कराने में कोई लाभ नहीं होगा। यानी अमेरिका को मैसेज दिया कि भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा।
तभी अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री मोदी और ईरान के राष्ट्रपति की मुलाकात के बारे में पूछा गया तो रूबियो ने कहा कि उनको नहीं लग रहा है कि ईरान के साथ भारत कोई व्यापार संधि कर रहा है या उसके साथ कोई व्यापार करेगा। साथ ही उन्होंने भारत को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर उसने ईरान के साथ व्यापार किया तो अमेरिका पाबंदी लगाएगा। जबकि दिखावे के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने पेजेशकियान के साथ दोपक्षीय वार्ता की तो उसके बाद कहा गया कि भारत और ईरान अपने व्यापार संबंधों को मजबूत करेंगे। गौरतलब है कि भारत 2019 में ईरान पर पाबंदी से पहले उससे तेल खरीदता था और रुपए में भुगतान करता था। फिर उसी रुपए से ईरान भारत से चीनी, चावल, दवाइयां वगैरह खरीदता था। दुबई के रास्ते यह कारोबार होता था। पाबंदी के बाद भारत ने तेल खरीदना पूरी तरह से बंद कर दिया है और दूसरे, व्यापार भी काफी कम हो गया है।
अगर भारत स्वतंत्र कूटनीति कर रहा है तो उसे अमेरिका की पाबंदी से डरे बगैर ईरान से कारोबार बढ़ाते रहना चाहिए था। जैसे चीन लगातार कर रहा है? जहां तक रूस से तेल खरीदने का मसला है वह कोई साहस का काम नहीं है। इसे अमेरिका और यूरोप बरदास्त करते रहे है। नई हकीकत यह भी है कि रूस का तेल अब चीन ज्यादा खरीदने लगा है। वही भारत अपनी जरुरतों के लिए अमेरिका के ऊपर खुद निर्भर होता जा रहा है। भारत अपनी जरुरत का 90 फीसदी के करीब एलपीजी अब अमेरिका से खरीद रहा है और वेनेजुएला से भी भारत की खरीद काफी बढ़ी है। जाहिर है अमेरिका को खुश रखना नीति है वहीं ईरान और रूस के साथ ब्रिक्स के बहाने जबरदस्ती का दिखावा है।
इससे आगे मुश्किल है। चीन के बनवाए एससीओ की अगली मेजबानी पाकिस्तान की है। वह अध्यक्ष रहेगा। क्या उसके लीडरशिप समिट में मोदी पाकिस्तान जाएंगे? यह भी खबर है कि संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य का चुनाव होने वाला है, जिसमें भारत के साथ साथ ताजिकिस्तान भी दावेदार है। क्या भारत उसमें दावेदारी वापस लेगा? अगर नहीं कर पाया तो क्या चुनाव में भारत को एशिया ब्लॉक का वोट मिलेगा? ध्यान रहे पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा के अध्यक्ष का चुनाव बांग्लादेश के खलीलुर रहमान जीत गए थे क्योंकि चीन ने उसके लिए सुनिश्चित किया था कि उनको एशियाई ब्लॉक का वोट मिले। तभी अमेरिका, यूरोप और भारत के समर्थन के बावजूद साइप्रस को हरा कर बांग्लादेश अध्यक्ष हुआ।
सो भारत संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता का चुनाव जीतना चाहता है तो उसे ताजिकिस्तान की दावेदारी वापस करानी होगी या यह सुनिश्चित करना होगा कि एशियाई ब्लॉक का वोट भारत को मिले। यह मुश्किल इसलिए है क्योंकि इसमें सेंट्रल एशिया के पांचों देशों का वोट अहम है। प्रधानमंत्री को उज्बेकिस्तान में सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिला। भारत ने कारोबार बढ़ा दो अरब डॉलर करने का संकल्प भी जताया लेकिन चीन के साथ उज्बेकिस्तान का कारोबार एक सौ अरब डॉलर से ज्यादा का है। कहने की जरुरत नहीं है कि वह चीन के असर में होगा न कि भारत के।
तभी ब्रिक्स की बैठक के पहले विदेश मंत्री की बयानबाजी, प्रधानमंत्री की गले लगने की कूटनीति से शायद ही कुछ सधे। क्या चीन खुल कर भारत का साथ देगा? मुश्किल है। शी जिनपिंग की प्रस्तावित भारत यात्रा से पहले अरुणाचल प्रदेश के आसपास चीन की कई गतिविधियां देखने को मिलीं है। चीन सीमा पर विवाद बनाए हुए है और इस बीच वह ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपर दुनिया का सबसे बड़ा बांध बना रहा है। खुद चीन के जियोलॉजिकल सर्वे ने इसमें कई गड़बड़ियां बताई हैं। यह बांध चीन के थ्री गोर्जेस डैम से भी बड़ा है। अगर यह बन जाता है तो इसमें जमा पानी से भूकंप जैसी गतिविधियां हो सकती हैं। सामरिक विशेषज्ञ इसे ‘वाटर बम’ बता रहे हैं। एक तो चीन इसके जरिए पानी को हथियार बना रहा है तो दूसरा खतरा यह है कि जरा सी गड़बड़ी हुई तो असम सहित भारत के पूर्वोत्तर में बड़ी तबाही होगी। इससे बांग्लादेश भी नहीं बचेगा। क्या प्रधानमंत्री को ब्रिक्स, एससीओ आदि की हवाबाजी के मध्य राष्ट्रपति शी जिन पिंग से चीन के मंसूबों पर असल बात नहीं करनी चाहिए?
