समय का ही फेर है जो सब कुछ बेतुका है! जैसे ट्रंप क्यों चीन गए? क्या पाया? नरेंद्र मोदी नीदरलैंड गए तो वहां से भारत को क्या प्रवासी भारतीयों का नाच-गाना मात्र देखना था? ताकि भक्तों को लगे नीदरलैंड में भी अपनी संस्कृति के सुनहरे दिन हैं! ऐसे ही यूएई में शेख के साथ तेल-गैस सप्लाई के करार की वीडियो झांकियां ऐसी थीं कि बस आया वहां से ईंधन और गैस। सो, लोकतंत्र अमेरिका का हो या भारत का या ब्रिटेन, सभी तरफ लोकभावनाओं से ऐसा खेला जा रहा है जैसे मनुष्य प्रजाति अब सिर्फ उल्लू बनने के लिए है!
पर उल्लू मात्र क्यों? लोकतंत्र सर्वत्र “एनिमल फार्म” में कनवर्ट है। भेड़, बकरी, सुअर, लोमड़ी, भेड़िए, केकड़े, बिच्छू, मच्छर, सांप-सपेरों की पहचान लोकतांत्रिक देशों में अलग-अलग तरह से प्रकट होती हुई है। पिछले सप्ताह भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने मनुष्य की एक नई किस्म का ज्ञान दिया। बताया कि भारत में ‘कॉकरोच’ की तरह बहुत से युवा हैं, जिन्हें इस पेशे (वकालत) में रोजगार नहीं मिल रहा है। वे सोशल मीडिया और आरटीआई एक्टिविज्म में लगे, काले चोगे पहनकर घूम रहे हैं!
सोचें, दुनिया दो-तीन सौ साल पहले हिंदुस्तान को सांप-सपेरों, ठगों का देश कहती थी। आज अमेरिका से परिभाषित ‘नरककुंड’ भारत में अजैविक भगवान भी हैं तो मनुष्य कॉकरोच-सा जीवन जीते हुए भी। उनके बीच प्रतिस्पर्धी केकड़े हैं। भेड़-बकरियां हैं। ‘परजीवी’ कीड़े-मकोड़े हैं। सत्ता के भूखे सुअर हैं, लालच-लूट के लिए जीभ लपलपाते भेड़िए हैं।
सोचें, ऐसा होना कैसे हुआ? दोष अंग्रेजों का, गांधी-नेहरू का कतई नहीं है। अंग्रेज हिंदुस्तानियों को स्वाधीन बना गए थे। साफ-सुथरे चुनावों के साथ लोकतंत्र, नए जमाने की हवा-पानी दे गए थे। जिन्होंने पढ़ा-लिखा है वे जानते कि 1947 से पहले वकालत, जज, मुवक्किल का मान-सम्मान और हैसियत क्या थी और अब क्या है? तब नरेंद्र मोदी, अमित शाह जैसे शासकों की बीन पर नाचते चीफ जस्टिस नहीं होते थे। न ही जज भय से, पदोन्नति के लिए, राज्यसभा की सांसदी के लिए, रिटायर होने के बाद पद की भूख में नेताओं के घरों में कॉकरोच की तरह प्रकट होते थे।
तब न आज जैसी शिक्षा, राजनीति, अफसरी, अदालत, चिकित्सा, खानपान की मिलावटी व्यवस्थाएं थी। अब वह आबोहवा है, जिसमें कॉकरोची सर्वज्ञानी, सर्वज्ञ हैं वही बेचारे लोग शासन की फाइलों, न्याय की आंकाक्षाओं, कृपा के इंतजार में सालों से फंसे कीड़े-मकोड़े! समझ न आने वाली बात है कि बेचारे काले चोगे वाले ही क्यों कॉकरोच! चीफ जस्टिस को यह क्यों भान नहीं हुआ कि फाइलों में न्याय का इंतजार कर रहे करोड़ों-करोड़ लोग क्या हैं? उन्हें भी क्यों नहीं वैसे ही निपटा दिया जाता जैसे माननीय सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के 27 लाख 4,283 कॉकरोचों (दस्तावेज लिए कथित नागरिकों-मतदाताओं) को यह कहकर निपटाया कि इनका वोट डालना कोई ज़रूरी नहीं है!
बहरहाल, ऐसा संकट अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस यानी लोकतंत्र के प्रतिमान देशों में नहीं है। बावजूद इसके इन्हीं से दुनिया में लोकतंत्र की साख घटती हुई है। गुजरे सप्ताह चीन में ट्रंप और ब्रिटेन में प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की दशा-दिशा पर वैश्विक मीडिया में हुई टीका-टिप्पणी से जाहिर था कि ब्रिटेन शासन समर्थ (governable) नहीं रहा तो चीन से ट्रंप मायूस, हताश लौटे। शी जिनपिंग ने अपना जलवा दिखाया।
कोई आश्चर्य नहीं दो मानव चेतना, मानवाधिकारों, मनुष्य स्वतंत्रता की ललक रखने वाले सुधीजन भी चीन, रूस, उत्तर कोरिया यानी तानाशाही के तंत्र को प्रभावशाली व सही समझने लगे हैं। मतलब चीन को देखो, उसके नेता शी जिनपिंग को देखो। वहां स्थिरता है। विकास है! व्यवस्था, नेतृत्व, रिश्तों आदि हर कसौटी में चीन बेहतर है जबकि लोकतांत्रिक देशों में कहीं शासन मुश्किल हो गया है, कहीं जंगलराज है और कोई देश एनिमल फार्म जैसा!
हां, चीन लोगों के दिमाग में पैठ रहा है। उसकी तस्वीर से लोकतंत्र साख गंवा रहा है। इसका आगे अर्थ होगा पृथ्वी के आठ अरब लोगों की भेड़चाल में होमो सेपियन की नियति का बंधना। चीन, ईरान, रूस, उत्तर कोरिया जैसी नियति। निरंकुशता तथा धार्मिक-सभ्यतागत अहंकारों में मनुष्यों का बंधना।
कल्पना करें, चीन वैश्विक धुरी बना। तो वर्चस्व, एकछत्रता की इस धुरी से भारत सहित दक्षिण एशिया, आसियान देश, अफ्रीका, मध्य एशिया, यूरेशिया, लातिनी अमेरिकी देशों तक में वही रक्षक, पालक, मददगार, विकास मॉडल में आदर्श बना हुआ होगा। तब बीस-तीस साल बाद दुनिया कैसी होगी?
यह बड़ा विषय है। जवाब एक कॉलम में देना संभव नहीं है। लेकिन ट्रंप की चीन यात्रा और ब्रिटेन में सरकार की स्थिरता के संकट की हकीकत में इतना भर जानना चाहिए कि चीन मनुष्य को मशीन में परिवर्तित करने का वह पुराना बाड़ा है, जिसकी सफलता मनुष्य प्रजाति के मशीन बन जाने से है।
पत्रकारिता के मेरे पचास वर्षों का अनुभव है कि कम्युनिस्ट सरकारों, निरंकुश-फासीवादी सरकारों (स्पेन के फ्रांको से लेकर पोल पॉट के कंपूचिया, ब्रेजनेव के सोवियत संघ से माओ के चीन के अनुभवों के तमाम रंगों को बाकायदा समझते हुए) का अर्थ केवल एक है और वह नेता-अहंकार विशेष की सनक से मनुष्य का मशीन में कनवर्जन।
सोचें, चीन नाम की अस्सी साला आधुनिक मशीन पर! माओ के समय आबादी बेइंतहां बढ़ रही थी, तो माओ और कम्युनिस्ट पार्टी ने मनुष्यों से कहा- बच्चे कम पैदा करो। सत्ता ने बटन दबाया और बच्चे कम पैदा होने लगे। अब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और शी जिनपिंग की सनक है कि बच्चे ज्यादा पैदा हों। बटन दबा और खबरे मिलने लगी है कि जनसंख्या दर में उठाव है!
माओ, देंग से शी जिनपिंग ने कन्फ्यूशियस अनुशासन की सभ्यतागत विरासत में चीन के लोगों को हर तरह की कोशिश से उन्हें उत्पादकता की मशीन बनाया। जीने का मशीनी मिजाज बना। तभी सोचें, चीन में ही शोध करते हुए, वहीं रहते हुए तू यूयू नाम की महिला अकेली वह नोबेल पुरस्कार प्राप्त है, जिसे मलेरिया के खिलाफ नई चिकित्सा पद्धति की खोज के लिए 2015 में नोबेल पुरस्कार कमेटी ने सम्मान लायक माना। जबकि प्रगति के कथित विकास अनुसार तो नोबेल पुरस्कारों में भी उसे अमेरिका, यूरोप को पछाड़ देना था।
चीन इसलिए बना क्योंकि 1971-72 में राष्ट्रपति निक्सन, हेनरी किसिंजर, रिपब्लिकन पार्टी और पूंजीपतियों ने अमेरिका में ब्ल्यू कॉलर मजदूर संगठनों के आंदोलनों से तंग आ गए थे। तब चीन में फैक्ट्रियां लगाने का आइडिया पनपा। 1972 में माओ ने लाल कालीन बिछवाकर राष्ट्रपति निक्सन को आठ दिन चीन घुमाया। और अमेरिकी पूंजीपतियों का कारखाने लगाना शुरू हुआ। कम्युनिस्ट मशीनरी ने चीनियों को दिन-रात फैक्ट्रियों में झोंके रखा। चीन दुनिया की फैक्ट्री बना।
यही चीन नाम के ‘मशीनी देश’ की सफलता का बीज मंत्र है। कुल मिलाकर मनुष्य से उसकी “स्वतंत्र चेतना” को छीन कर उससे वैसे ही काम कराना जैसे इंसान मशीन से काम कराता है। और त्रासद है जो अब वह मशीनी लोगों से रोबोट बनवाकर उन्हें दुनिया के आगे नाचता, दौड़ता दिखला रहा है। इसका असर है कि लोकतांत्रिक देशों के अलग-अलग मिजाज के मनुष्य चीन पर सोचते हैं कि चीन सब कुछ बना रहा है, बेच रहा है, मुनाफा कमा रहा है। शंघाई, बीजिंग से ल्हासा सहित शहरी इलाका हो या देहाती, चौतरफा विकास ही विकास है। मतलब “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” के बिना भी जीना मनुष्य का असल जीवन है।
पर चीन का जो ‘असल’, कथित ‘विकास’ रोबोट है वह उस वैश्विक दिमाग, बुद्धि, बौद्धिक उर्वरता, स्वतंत्रता से अनंत उड़ान लिए उन हंसों की बदौलत है जो आज बुद्धि, दिमाग को ही कृत्रिम बना दे रहे हैं! यों उनकी नकल, जुगाड़ में चीन ने भी अपने एआई मॉडल बनाए हैं। मगर वह सब अमेरिका की सिलिकॉन वैली, तकनीक, आईटी के ज्ञान-विज्ञान-शोध-वेंचर से है। जिनकी छाया में चीनी कंपनियां, सरकार भी अपने स्तर पर जुगाड़ बनाती हैं। ट्रंप के आगे शी जिनपिंग का यह दबाव है कि उनके प्रशासन ने चीनी नौजवानों के अमेरिकी विश्वविद्यालय के दाखिलों, वीजा, उनके पढ़ने-सीखने की गरिमा का बाजा बजाया है ( कल्पना कर सकते है कि ट्रंप से मुलाकात में ऐसे नरेंद्र मोदी भारत के छात्रों का मुद्दा उठाएं।)
मतलब यह कि अमेरिका ने सत्तर-अस्सी के दशक में चीन को अपनी फैक्ट्री, चीनियों को अपनी मशीन बनाया तो वैसे अमेरिकी मेधा अब एआई से मनुष्य को ही “प्रोग्राम्ड नागरिक” के वैश्विक फ्रेम में ढाल दे रही है। देशों के लोगों को को धीरे-धीरे एल्गोरिद्म से रोबो या “डेटा-पशु” बना रही हैं। अमेरिकी-यूरोपीय एआई कंपनियां वह समय ले आ रही हैं, जिससे लोकशाही हो या तानाशाही, सभी उस अनाम “डिजिटल-प्रोग्राम्ड नागरिक यानी मशीनी सिस्टम” से संचालित होंगे, जिसमें गलत कुछ नहीं होगा। हर तरह के कॉकरोच और रोबोट दोनों उसके अधीन क्योंकि इस नकली बुद्धी में भरी हुई सत्य की कसौटी में है।
सवाल है क्या तब तक लोकतंत्र ढह नहीं चुके होंगे? मैं नहीं मानता। डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को चाहे जितना बिगाड़ दें या ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और यूरोपीय संघ में ट्रंप जैसे बेवकूफ बनाने वाले कितने ही दक्षिणपंथी नेता शासन में आ जाएं, इन देशों में मनुष्य गरिमा के साथ वह मखौल कभी नहीं बनेगा जैसा चीन ने लोगों को मशीन बनाकर बनाया है या भारत में जैसे कॉकरोच, फर्जी, संदिग्ध, परजीवी, भक्त, भयाकुल बनाकर मनुष्यता की मानव गरिमा के गटर बना दिए है।
