Democracy

  • मातृभाषा का हक और लोकतंत्र की कसौटी

    राजस्थानी के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा, वही बात भोजपुरी पर और भी अधिक तीव्रता से लागू होती है। अगर बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा का अधिकार है, तो भोजपुरी बोलने वाले करोड़ों बच्चों को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्या वे कम भारतीय हैं? क्या उनकी भाषा कम समृद्ध है?... सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक अवसर है, नीति-निर्माताओं के लिए, शिक्षाविदों के लिए ... सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय (राजस्थान के स्कूलों में राजस्थानी भाषा को पढ़ाने और उसे आगे चल कर शिक्षा का माध्यम बनाने का निर्देश) सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं है। यह...

  • लोकतंत्र में कॉकरोच, चीन में रोबोट

    समय का ही फेर है जो सब कुछ बेतुका है! जैसे ट्रंप क्यों चीन गए? क्या पाया? नरेंद्र मोदी नीदरलैंड गए तो वहां से भारत को क्या प्रवासी भारतीयों का नाच-गाना मात्र देखना था? ताकि भक्तों को लगे नीदरलैंड में भी अपनी संस्कृति के सुनहरे दिन हैं! ऐसे ही यूएई में शेख के साथ तेल-गैस सप्लाई के करार की वीडियो झांकियां ऐसी थीं कि बस आया वहां से ईंधन और गैस। सो, लोकतंत्र अमेरिका का हो या भारत का या ब्रिटेन, सभी तरफ लोकभावनाओं से ऐसा खेला जा रहा है जैसे मनुष्य प्रजाति अब सिर्फ उल्लू बनने के लिए है!...

  • जनतंत्र को पलीता लगाने में क्या केजरीवाल पीछे थे?

    लप्पड़ खाने के बाद रुआंसे घूम रहे केजरीवाल से भी तो यह पूछा जाना चाहिए कि पिछले साढ़े तेरह बरस से वे भारत के लोकतंत्र का नमक अदा करने के लिए काम कर रहे थे या जनतंत्र की तेरहवीं के आयोजन में एक निष्ठावान गुपचुप सहयोगी बने बैठे हैं?... छद्म संघर्ष से आगे आए केजरीवाल द्वारा अपने कर्मठ सहयोगियों को परे कर धनपशुओं को तरज़ीह देने के उन के इस मूल चरित्र पर आप क्या कहेंगे? आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्य अरविंद केजरीवाल का पल्लू झटक कर भारतीय जनता पार्टी में चले गए तो अपने दफ़्तर से महात्मा...

  • सभ्यता ध्वंस की भाषा, लोकतंत्र की परीक्षा

    भाषा ही यह तय करती है कि क्या सोचा जा सकता है और क्या किया जा सकता है, और जब भाषा से संकोच हटता है तो कल्पना भी सीमाएँ तोड़ देती है, और किसी देश या सभ्यता को मिटा देने की बात केवल बयान नहीं रहती, वह एक तरह की अनुमति बन जाती है।।। आज अमेरिका अपने ही दो रूपों के बीच खड़ा है, एक जो सीमाओं को पहचानता है, और दूसरा जो खुलकर शक्ति की भाषा बोलता है। एक समय था जब किसी देश को “पाषाण युग में भेज देने” जैसी धमकियाँ युद्ध कक्षों की सीमित भाषा में रहती...

  • सत्ता न हो तो कैसे लड़ेंगी पार्टियां?

    यह लाख टके का सवाल है कि अगर किसी पार्टी के पास सत्ता नहीं है तो वह कैसे राजनीति करेगी और कैसे चुनाव लड़ेगी? सोचें, एक समय सत्ता में होना चुनाव में असफल होने का आधार बनता था लेकिन अब सत्ता में होना चुनाव जीतने की गारंटी बनता जा रहा है। एंटी इन्कम्बैंसी से प्रो इन्कम्बैंसी का यह सफर एक अलग व्यापक विश्लेषण की मांग करता है। लेकिन अभी तात्कालिक विचार का मसला पार्टियों के लिए राजनीति और चुनाव मैदान के लगातार असमान होते जाने का है। हाल में कई मीडिया समूहों ने पार्टियों को मिलने वाले चंदे का ब्योरा...

  • सबकी खुशहाली के बिना कैसा लोकतंत्र?

    हकीकत यह है कि जो राजनीतिक अधिकार मिले होते हैं, समाज की बहुसंख्यक आबादी उनके उपभोग के लिए भी सक्षम नहीं होती। उन्हें सक्षम बनाने का दायित्व राज्य नहीं लेता। ऐसे में सारे अधिकार वास्तव में प्रभु वर्ग के लिए सीमित रह जाते हैं। इसीलिए ऐसे चुनावी लोकतंत्र में बनने वाली सरकारें प्रभु वर्ग के हित में काम करती हैं। अक्सर सरकार बदलने के बाद आर्थिक नीतियां नहीं बदलतीं, तो उसकी यही वजह है। 2025 को ऐसे साल के रूप में याद रखा जाएगा, जिसने दुनिया के (आर्थिक एवं सैनिक) शक्ति संतुलन में हो रहे आमूल परिवर्तन पर से परदा...

  • यह जनवाद कब भरोसा गंवाएंगा?

    भारत इन दिनों अलग ही तरह के नए जनवाद की लहर पर सवार है। हर चुनाव इस ज्वार को और ऊँचा कर देता है। लहर अब इतनी प्रबल है कि न क्षितिज दिख रहा है, न नीचे की धारा। सवाल है क्या यह लहर कभी टूटेगी? क्या एक ऐसा देश, जिसने लोकप्रिय राष्ट्रवाद को इतना कसकर थाम लिया है, कभी इसे ढीला छोड़ पाएगा? क्या वह फिर याद कर पाएगा कि लोकतांत्रिक गरिमा आखिर कैसी होती है? या फिर जो क्षितिज चमकता दिख रहा है, वह केवल अनिश्चितता का धुँधलका है? भविष्यवाणी करना आसान होता, अगर विपक्ष ने अपना दमखम...

  • जाति आधारित पार्टियां लोकतंत्र का भविष्य हैं!

    क्या इसे भारत में अपनाई गई बहुदलीय लोकतंत्र के मजबूत होने का संकेत मानें या कुछ और कि भारत में लगातार राजनीतिक दलों की संख्या बढ़ रही है? हर चुनाव से पहले राज्यों में कई नई पार्टियां बनती हैं। हर पार्टी को कोई न कोई गठबंधन मिल जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर दो बड़े गठबंधन पहले से मौजूद हैं, एनडीए और ‘इंडिया’ ब्लॉक। नई पार्टियों को इनमें भी जगह मिल जाती है तभी इन गठबंधनों का आकार लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव के समय पता चला कि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में 38 पार्टियां हैं तो...

  • लोकतंत्र के अलौकिक नेता

    लोकतंत्र भी एक अल्पतंत्रीय शासन है जो लोगों को चार या पाँच साल में एक बार, केवल यह तय करने देता है कि वह किस के हाथों बेवकूफ बनना चाहता है? इस के अलावा सारी बातें, गिनती के लोग तय करते हैं, जो स्वयं तरह-तरह की लफ्फाजी और चुनावी तिकड़मों के सिवा शायद ही अन्य योग्यताएं रखते मिलते हैं। इसीलिए जिन्हें लोक हित की सच्ची चिन्ता हो, उन्हें लोकतंत्र का नारा लगाने के बजाए, उस की कमियाँ घटाने, शासकों को उत्तरदायी बनाने, तथा योग्यता को प्रेरित करने के उपायों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अभी भाजपा के एक राष्ट्रीय नेता...

  • लोकतंत्र में वंशवादी मानसिकता ठिक नहीं

    लोकतांत्रिक प्रक्रिया और वंशवादी मानसिकता परस्पर विरोधी है। जनतंत्र में ‘जन’ की राय ही सर्वोच्च होती है। किसी ने सही कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा के अन्य शीर्ष नेता जनता को अपनी पार्टी के पक्ष में मतदान करने के लिए केवल प्रेरित करते हैं, जबकि राहुल गांधी और उनके छुटभैये नेता जनता को प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को वोट देने पर मजबूर कर देते हैं। गत दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘मृत’ करार दिया। इसपर लोकसभा में नेता-विपक्ष और कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी ‘गदगद’ दिखे और अब देशभर में...

  • दलबदल लोकतंत्र के लिए खतरा: सुप्रीम कोर्ट

    नई दिल्ली। दलबदल को सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र के लिए खतरा बताया है। इसके साथ ही सर्वोच्च अदालत ने तेलंगाना की मुख्य विपक्षी पार्टी भारत राष्ट्र समिति यानी बीआरएस के विधायकों की अयोग्यता के मामले में विधानसभा स्पीकर को तीन महीने में फैसला करने को कहा है। आमतौर पर स्पीकर ऐसे मामलों में फैसला विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने तक लंबित रखते हैं। लेकिन अदालत ने बीआरएस से दलबदल करने वाले 10 विधायकों के मामले में स्पीकर को आदेश दिया कि वे संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत इन विधायकों को अयोग्य ठहराने की याचिकाओं पर तीन महीने में फैसला...

  • बेमुरव्वत निर्ममता को छू रही पक्षधरता

    क्या आप देश के तक़रीबन 400 समाचार चैनलों में से दो-चार भी ऐसे बता सकते हैं, जो आजकल सरकार के निर्णयों और नीतियों में ख़ामियों को उजागर करना तो दूर, उन की तरफ़ इशारा करने का काम भी करते हों? एक लाख के आसपास अख़बारों-पत्रिकाओं में से क्या सौ-पचास भी ऐेसे हैं, जो केंद्रीय, प्रादेशिक या ज़िला स्तरीय शासन-प्रशासन के कामकाज की समीक्षात्मक रपटें प्रकाशित करते हों? पत्रकारिता के दो अलग-अलग कंगूरे हैं। एक है, जिस ने अपनी दीवार पर ‘मुख्यधारा-मीडिया’ का बोर्ड  अपने आप टांग कर ख़ुद को हम पर थोप दिया है। दूसरा है बे-धारा मीडिया। इसे आप...

  • लोकतंत्र में लाठी का राज

    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लाठी भांज रहे हैं। उनको परवाह नहीं है कि लाठी अपने दोस्तों को लग रही है या दुश्मनों को। उनके हाथ में उस्तरा है तो वे उसे जैसे तैसे चला रहे हैं। यूरोप के देश हैरान परेशान हैं तो दक्षिण कोरिया और जापान जैसे दोस्त भी परेशान हैं। ट्रंप ने उनके ऊपर भी भारी भरकम टैक्स लगा दिया है। लेकिन यह सिर्फ अमेरिका की परिघटना नहीं है। व्लादिमीर पुतिन के पास भी लाठी है तभी तो उन्होंने एक दिन कहा कि यूक्रेन में रूसी भाषा बोलने वाले इलाकों पर उनका अधिकार है और यूक्रेन पर...

  • भारतीय चित्रकला में लोकतंत्र

    प्रसिद्ध चित्रकार एवम कला समीक्षक अशोक भौमिक ने अपने विचारोत्तेजक व्याख्यान में चित्रकला की दुनिया में एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने एक नई स्थापना दी कि महान चित्रकार राजा रवि वर्मा से भारतीय चित्रकला में आधुनिकता की शुरुआत नहीं हुई थी, बल्कि रविंद्रनाथ टैगोर और अमृता शेरगिल ने भारतीय चित्रकला में आधुनिकता और लोकतंत्र को स्थापित किया था। जबकि अब तक यही माना जाता रहा कि कला में आधुनिकता की शुरुआत राजा रवि वर्मा से होती है। राजा रवि वर्मा को भारत का पहला आधुनिक चित्रकार माना जाता रहा है। 1848 में जन्मे राजा रवि वर्मा का कद...

  • क्या भारतीय लोकतंत्र आईसीयू में है?

    गांधी शांति प्रतिष्ठान में जेपी की संस्था सिटीजंस फॉर डेमोक्रेसी अपनी स्वर्ण जयंती मना रही है। आज जेपी नहीं हैं। बस उनकी यादें और उनके दिखाए गए रास्ते हैं। जेपी की बनाई संस्था सिटीजंस फॉर डेमोक्रेसी के 50 साल पूरे होने पर एक आयोजन हुआ था। उसकी रिपोर्ट। करीब 50 साल पहले जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में नागरिक समाज की एक संस्था “सिटीजंस फॉर डेमोक्रेसी” की स्थापना की थी क्योंकि तब उन्हें लोकतंत्र को बचाना था और लोकतंत्र को बचाने के लिए ही उन्होंने आपातकाल का विरोध किया था। उसी गांधी शांति प्रतिष्ठान से वे गिरफ्तार...

  • लोकतंत्र के स्तंभों में टकराव…. कितने गहरे घाव….?

    भोपाल। भारतीय प्रजातंत्र का महल तीन स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर खड़ा है, चैथा स्वयं भू-स्तंभ खबर पालिका भी इसे सहारा देने का दावा करती रही है। किंतु आज जब हमारा प्रजातंत्र उम्रदराज हो चुका है और आठवें दशक के समापन की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में इसके स्तंभों में आपसी टकराव की स्थिति निर्मित हो रही है और इसे कमजोर कर इसे खंडहर में परिवर्तित करने के प्रयास किए जा रहे है, जबकि हमारे संविधान ने पहले से ही स्तंभों के कर्तव्य और अधिकार की सीमा रेखा तय कर रखी है। किंतु अब इन तीनों ही स्तंभों...

  • आपदा से बदहाल होता प्रजातंत्र

    एक अध्ययन में यह खुलासा किया गया है कि आपदा, विशेष तौर पर प्राकृतिक आपदा, के बाद सत्ता की निरंकुशता पहले से अधिक बढ़ जाती है| पहले प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति का समय लंबा था, पर अब जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से यह एक वार्षिक और लगातार घटना है| जाहिर है, जलवायु परिवर्तन सत्ता की निरंकुशता और जनता के दमन के लिए जिम्मेदार होती जा रही है|  जलवायु परिवर्तन और तापमान बृद्धि के प्रभाव से दुनिया बदल रही है और आपदाएं भी लगातार हमें जकड़ रही हैं| बाढ़, सूखा, भूस्खलन, हिमस्खलन, तूफान, चक्रवात, इत्यादि अब सामान्य हो चले हैं| हमारे...

  • वोटों की भीख मांगने वाले, वोटर को भिखारी बता रहे…?

    भोपाल। अब इसे हम प्रजातंत्र पद्धति का दोष कहे या हमारे ‘माननीयों’ की समझ की कमी, जो राजनेता हर पांच साल में मतदाताओं से घर-घर जाकर मतों की भीख मांगते है, वे ही कुर्सी पर आसीन हो जाने के बाद कह रहे है कि- ‘‘लोगों को सरकार से भीख मांगने की आदत पड़ गई है।’’ यह किस्सा मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले के सुठालिया ग्राम का है, जहां मध्यप्रदेश के एक वरिष्ठ मंत्री ने जनता के मांग पत्रों को ‘भीख’ की संज्ञा दी, वीरांगना अवंती बाई लोधी की प्रतिमा का अनावरण करने के बाद वहां उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुए...

  • सदन के सामने से कतराते हमारे जनप्रतिनिधि…!

    parliament session 2025 : आजादी की हीरक जयंति के दौरान देश के इस मसले पर गंभीर चिंतन करना चाहिए कि क्या आजादी के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले या जानलेवा संघर्ष करने वाले हमारे राष्ट्रभक्त पूर्वजों की मोहक कल्पनाओं पर हम खरे उतर रहे है? या उनके सपनों में रंग भरनेे का तनिक भी प्रयास कर रहे है? यह एक ऐसा मुद्दा है जो हमें निराश ही करने वाला है, क्योंकि देश व देशवासियों को उनकी पारिवारिक उलझनों में उलझा कर स्वार्थ सिद्ध करने वालों का आज बाहुल्य हो गया है, आज की राजनीति का जनसेवा से दूर का...

  • दो लोकतंत्र, एक चिंता !

    Democracy: भारत और हम हिंदुओं का क्या होगा, यह अपनी चिंता है! वही दुनिया इस चिंता में है कि अमेरिका और पश्चिमी सभ्यता का क्या होगा! डोनाल्ड ट्रंप आज शपथ ले रहे हैं और उनके इस मौके पर कनाडा के “हिंसक संघर्षो के अध्येता” होमर-डिक्सन का तीन साल पहले लिखा एक वाक्य मुझे ध्यान आ रहा है। उन्होंने कनाडा के लोगों को चेताया था। उन्होने अखबार ‘ग्लोब एंड मेल’ में लिखा था कि, ‘हमें वह सोचना चाहिए जो आज लग नहीं रहा, दिख नहीं रहा! हमें उन संभावनाओं, सिनेरियो को इसलिए खारिज नहीं करना चाहिए क्योंकि वे हास्यास्पद या कल्पनातीत...

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