लोकतंत्र की शक्ति राज्य नहीं, जागरूक नागरिक होते हैं
लोकतंत्र में किसी नागरिक को अपनी बात मनवाने के लिए अपने शरीर को दाँव पर नहीं लगाना चाहिए। संसद, न्यायालय, जनप्रतिनिधि, आयोग, मीडिया और नागरिक संस्थाएँ इसलिए होती हैं कि कोई व्यक्ति अपने जीवन को अंतिम तर्क बनाने के लिए विवश न हो। यदि किसी नागरिक को यह महसूस होने लगे कि उसकी आवाज़ इन सभी रास्तों से लौट आई है, तभी वह अपने शरीर को प्रतिरोध का माध्यम बनाता है। इस अर्थ में भूख हड़ताल लोकतंत्र की सामान्य भाषा नहीं, उसकी असफलता है। सोनम वांगचुक को केवल एक आंदोलनकारी के रूप में पढ़ना उनके महत्व को सीमित कर देना...