सन् 2026 की 20 जुलाई से 25 जुलाई के बीच भारत में वह हुआ, जिसकी दुनिया के किसी लोकतांत्रिक देश ने कल्पना नहीं की। दुनिया के अखबारों, टीवी चैनलों और डिजिटल मंचों पर भारत बतौर ‘कॉकरोच’ की पहचान के साथ उभरा। कभी ‘सांप-संपेरों के हिंदुस्तान’ की इमेज थी। पर 1947 में स्वतंत्रता के बाद के दशकों में लोकतंत्र, भारत-निर्माण, आईटी, उभरती आर्थिकी, परमाणु ताकत, आईआईटी-आईआईएम सहित शिक्षा की बेहतरी तथा विशाल जनसंख्या के बाजार के नाते भारत प्रतिष्ठित हुआ। वह सब अब हाशिए में है और अब भारत ‘कॉकरोच’ है। भारत में मनुष्य, नवजात पीढ़ी ‘कॉकरोच’ है, जिस पर लाठियां, पैलेट गन की गोलियां बरसी। यह वैश्विक अजूबा है और तभी दुनिया के हर कोने में अखबारों के पहले पेज पर, बैनर हेडलाइंस, ब्रेकिंग न्यूज की तरह छपा। सवाल है, कौन दोषी, किसने कॉकरोच भारत बनाया है? क्या संघ परिवार और उसके प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह नहीं? इसलिए ‘कॉकरोच’ फर्जी हिंदू राष्ट्र, फर्जी अमृतकाल का वह कलंक है, जिससे भले मोदी सरकार और भक्त हिंदू शर्मिंदा न हों, लेकिन विश्व मानव समाज अवश्य 145 करोड़ लोगों के भारत को जुगुप्सा, वितृष्णा से देख, समझ रहा है।
सोचें, इक्कीसवीं सदी में दुनिया में आगे भारत अब क्या इमेज लिए है? एक ऐसा देश, जो स्वयं को ‘विश्वगुरु’, ‘लोकतंत्र की जननी’, ‘विकसित भारत’ और ‘विश्वबंधु’ बताता है, वहां ‘कॉकरोच’ है, ‘कॉकरोच राजनीति’ है, ‘कॉकरोच आर्थिकी’ है, आदि-आदि। मोदी ने, अमित शाह ने पहले भारत के नागरिकों के आगे अनागरिक होने की तलवार लटकाई। पश्चिम बंगाल के लाखों दस्तावेज़युक्त वैध मतदाताओं को अनागरिक बनाकर उन्हें मताधिकार से बाहर किया। इसे चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट ने अपराध नहीं माना। फिर पूरे भारत के नागरिकों में ही मनुष्य को सर्वोच्च अदालत से ‘कॉकरोच’ परजीवी होने की तख्ती मिली!
बावजूद इसके हिंदू राष्ट्र के भक्त हिंदुओं को शर्म नहीं आई, न ग्लानि हुई। इन हिंदुओं के हिंदू होने के डीएनए की सचमुच जांच होनी चाहिए। ये कौन से, क्या हिंदू हैं, इसका जवाब सनातन धर्म का शायद ही कोई ग्रंथ दे पाए। मैं हिंदू हूं, राष्ट्रवादी हूं और मुझे इतना सामान्य ज्ञान है कि सनातन धर्म में मानव जन्म को परम प्राप्ति कहा गया है। जन्म-जन्मांतर के विश्वासी हम सनातनियों का मूल सूत्र है कि मनुष्य, ईश्वर की सबसे बड़ी कृति है। भगवान ने (श्रीमद्भागवत पुराण 11.9.29) अपनी मायाशक्ति से वृक्ष, सरीसृप (सांप आदि), पशु, पक्षी, मच्छर, मछलियां आदि अनेक योनियां बनाईं। परंतु उन्हें तब तक संतोष नहीं हुआ, जब तक उन्होंने मनुष्य शरीर की रचना नहीं की। और ईश्वर स्वयं मनुष्य शरीर में ब्रह्म (ईश्वर) को जानने और देखने की बुद्धि देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। ऐसा ही आदि शंकराचार्य का दिया सूत्र (विवेकचूड़ामणि, श्लोक 2) है कि समस्त प्राणियों में मनुष्य जन्म सबसे दुर्लभ है। मनुष्य होने के बाद पुरुषत्व, फिर वैदिक धर्म का मार्ग जानना, फिर विद्वान होना, और उसके बाद आत्मा-अनात्मा का विवेक प्राप्त करके ब्रह्म में स्थित होना, यह सब सौ करोड़ जन्मों के पुण्यों के बिना संभव नहीं है।
तभी, जब मैंने चीफ जस्टिस का ‘कॉकरोच’ वाला वाक्य और बाद में उनकी सफाई सुनी, तो बतौर ब्राह्मण मुझे ग्लानि हुई कि हम आज के ब्राह्मण कैसे हैं! कितने अविवेकी, बुद्धिहीन हो गए हैं! देश की सर्वोच्च अदालत का चीफ जस्टिस मनुष्य पर ‘कॉकरोच’ का लेबल चस्पां कर रहा है! जाहिर है, चीफ जस्टिस का विवेक भी नरेंद्र मोदी नाम के कथित कल्कि अवतार के समय में ब्राह्मणों के विवेक, पुरुषत्व, ज्ञान और बुद्धि, सभी के पतन की बानगी है। सोचें, गंभीरता से सोचें कि चीफ जस्टिस के साथी जजों से लेकर सर्वज्ञ, अजैविक भगवान नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार के मंत्रियों, संघ और हिंदू साधु-संतों में किसी के भीतर भी इस शब्द को बदलवाने, शब्द-वापसी, पछतावा, शर्म या खेद प्रकट कराने की बुद्धि या हिम्मत नहीं आई। जबकि आदि शंकराचार्य ने मनुष्य के पुरुषत्व (सत्यनिष्ठ निर्भयता), विद्वत्ता तथा आत्मा-अनात्मा के विवेक के माध्यम से ब्रह्म में स्थित होने तक की क्षमता में हर मनुष्य से मानवीय व्यवहार और संवेदना की अपेक्षा की है।
जार्ज ऑरवेल का एक महान उपन्यास है, ‘एनिमल फार्म’। इसमें मनुष्य की प्रवृत्तियों की वास्तविकताओं पर पशुओं के जंगल राज की कहानी है। उन्होंने दिखाया है कि कैसे सुअर सत्ता हथिया लेते हैं और समानता के नाम पर नया अत्याचार खड़ा कर देते हैं। लेकिन ऑरवेल भी यह नहीं सोच सकते थे कि किसी लोकतंत्र में, मानव समाज में मनुष्यों की तुलना कीड़े-मकोड़ों, कॉकरोचों से होगी और शासन फिर इन कॉकरोचों को आंसू गैस के गोलों से खत्म करने के आदेश देगा।
इसलिए मसला गहरा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक नागरिक को (भले वह परजीवी हो) ‘कॉकरोच’ करार देना नए भारत के वर्तमान और भविष्य की दशा-दिशा है। पिछले बारह वर्षों से सरकार ने नौजवानों (बहुसंख्य आबादी को ही) अवसरों से वंचित किया है। किसानों को उनकी फसल का वाजिब दाम नहीं मिल रहा। लोगों को सही शिक्षा, सही चिकित्सा और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के बजाय उन्हे पैसा बांटकर, झांसा देकर परजीवी और आश्रित बनाया है। बेमतलब की डिग्रियां बांटी जा रही हैं। परीक्षाओं के नाम पर लूट है, झांसा है। स्वाभाविक है कि सामान्य छात्र हो या वकीलों तथा स्नातक-स्नातकोत्तर डिग्रियां लिए नौजवान, बेगारी का जीवन जीते हुए है। यूथ (जैसे सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे वकील थे) भटकते-भटकते अन्याय और अवसरों की गुहार लगाता है, तो उसे क्या तमगा मिलता है? ‘कॉकरोच’ (परजीवी)! और फिर दुनिया के आगे ‘कॉकरोच भारत’!
याद करें पिछले बारह वर्षों के अनुभवों पर। मोदी सरकार ने लोगों को (उनकी देखा-देखी बाकी सरकारों और पूरी राजनीति ने भी) लाभार्थी, खैराती और परजीवी बनाने का मिशन चला रखा है, और फिर उनकी नागरिकता पर भी सवाल खड़ा किया। अंत में अब ‘कॉकरोच’ (क्योंकि परजीवी) का लेबल! बारह वर्षों में न नागरिकों को पुरुषार्थी और स्वाभिमानी बनाया, न ही उन्हें समान अवसर दिए, मगर उन्हें कॉकरोच बना दिया!
पता है, दुनिया में ‘कॉकरोच’ शब्द नरसंहार का संदर्भ लिए हुए है। अफ्रीका के देश रवांडा में तुत्सी समुदाय को ‘कॉकरोच’ कहा गया था। फिर उन पर कहर बरपा और वह शब्द नरसंहार की राजनीति का भी प्रतीक बना। संयुक्त राष्ट्र तथा मानवाधिकार अध्ययनों में ऐसी भाषा को dehumanization (अर्थात मनुष्य को मनुष्य न मानने वाली भाषा) के रूप में चिन्हित किया गया है। ऐसे ही हिटलर ने यहूदियों को मारने के लिए उन्हें ‘चूहा’ कहा था। और गुजरे सप्ताह हिंदू लड़के-लड़कियों पर जब पैलेट गन से छर्रे मारे गए, तभी भक्त चेहरों के ये वाक्य भी छपे थे कि देश से ‘कॉकरोचों को खत्म करने का स्थायी इंतजाम’ हो। या ‘कॉकरोचों’ के पीछे ‘विदेशी ताकतें’, ‘खालिस्तानी संगठन’, ‘बांग्लादेश की इस्लामिक पार्टी की ताकतें’, ‘पाकिस्तान समर्थित ताकतें’ और ‘सोरोस फाउंडेशन’ हैं’!
क्या यह रवांडा के पागलों जैसी भाषा नहीं है? गंवार हिंदू राष्ट्रवादियों को इतनी भी समझ नहीं है कि राष्ट्रों की प्रतिष्ठा अर्थव्यवस्था, सेना या चुनावों से नहीं बनती; बल्कि प्राथमिक कसौटी यह है कि वहां की सरकार अपने सामान्य नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करती है? दक्षिण अफ्रीका वर्षों तक रंगभेद से कलंकित रहा। ऐसे ही सैन्य दमन से म्यांमार की पहचान मानवता का कलंक थी और है। चीन और रूस भले महाशक्ति हों, लेकिन ये मनुष्यों पर तानाशाही की स्थायी पहचान वाले देश हैं।
सोचें, नरेंद्र मोदी ने अपनी ब्रांडिंग के लिए विश्व की राजधानियों में जाकर क्या-क्या तमाशे नहीं किए? जी-20 सम्मेलन से लेकर ‘भारत मंडपम’, योग दिवस, प्रवासी भारतीय सम्मेलनों आदि पर बेहिसाब पैसा उड़ेला। बारह वर्षों से सरकार सिर्फ और सिर्फ प्रोपेगंडा मोड में है। लेकिन भारत की सरकार को, उसके नेता को यह पता नहीं है कि विज्ञापनों, भाषणों, मीडिया और प्रोपेगंडा से इमेज नहीं बनती। राष्ट्र स्तर पर वह उस सार्वजनिक व्यवहार से बनती है, जिसे दुनिया के अलग-अलग पैमाने और इंडेक्स समय-समय पर मानव समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं। पर जो सरकार, जो प्रधानमंत्री, जो सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग अपने नागरिकों को स्वयं ‘कॉकरोच’ का चरित्र प्रमाणपत्र दे, उस राष्ट्र का क्या चरित्र प्रमाणपत्र होगा? क्या ‘कॉकरोच’ नहीं? हिंदू हो या मुसलमान, दलित हो या आदिवासी, उच्च वर्ग हो या मध्यवर्ग, सभी को मोदी सरकार ने परजीवी बनाकर, उन्हें संदिग्ध नागरिक, अवैध मान कतार में खड़ा कर दिया है, तो उस देश को क्या कहेंगे? अब क्या है मां भारती? मोदी-शाह संसद में ‘वंदे मातरम्’ का गान अनिवार्य बना रहे हैं, जबकि मां भारती का क्या अर्थ बना दिया है? ‘कॉकरोचों’ की पालक, पोषक और जननी! और ‘कॉकरोच’ उर्फ मासूम लड़के-लड़कियां पैलेट गन से निशाना बनाने लायक!
कोई न माने, लेकिन भारत राष्ट्र का साधारण मनुष्य आज ‘कॉकरोच’ का चरित्र प्रमाणपत्र लिए हुए है और वही भारत राष्ट्र का भी चरित्र प्रमाणपत्र है। इसे न कल्कि अवतार नरेंद्र मोदी समझते हैं, न कलियुगी चाणक्य अमित शाह, न चीफ जस्टिस सूर्यकांत, न चुनाव आयोग में बैठे कथित ज्ञानी ज्ञानेश कुमार और न संघ परिवार के कथित परम पूजनीय मुखिया मोहन भागवत! क्या यही संघ के सौ वर्षों का प्रारब्ध नहीं है?
