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वोटर यूपी और बिहार से ज्यादा जागरूक!

रायपुर। छत्तीसगढ़ में सात नवंबर को मतदान का पहला चरण ख़त्म होते ही भाजपा के राज्य कार्यालय में आतिशबाजी हुई।तब से भाजपा के स्थानीय नेता, राज्यस्तरीय टीवी चैनलों पर दावा कर रहे हैं कि जिन 20 सीटों पर मतदान हुआ है, उन पर भाजपा का प्रदर्शन ‘बहुत शानदार’ रहा है।वे अपनी जीत कि जो संख्या बता रहे हैं, उससे उनकी रणनीति जाहिर है। कांग्रेस को मनोविज्ञान तौर पर रक्षात्मक, कमजोर बनाने के मकसद में भाजपा का यह बडबोलापन है। इतना ही नहीं अमित शाह ने भी प्रदेशपहुंचते ही दावा किया कि कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाएगा। जाहिर है भाजपा जंग की पुरानी चाल मतलबदुश्मन पर मनोवैज्ञानिक हल्ला बोल की रणनीति अपन कर नतीजे आते-आते अनिश्चिता, कंफ्यूजन बनाएगी ताकि संभावना बने तो तोडफोड की भूमिका पहले से बनी हो।

वैसे एक कारण सात तारीख की शाम को मतदान कम याकि 71 प्रतिशत वोटिंग के आकड़े का भी रहा होगा।  लेकिन उसका अपडेट हुआ आंकड़ा अब 78प्रतिशत है। इसमें बस्तर में 84.67 प्रतिशत वोटरों ने वोट डाला है। यह सन् 2018 के विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण में 18 सीटों पर हुए मतदान के प्रतिशत 76.47 से कुछ अधिक है।हिसाब से अधिक मतदान दोनों पार्टियों के लिए अच्छा या बुरा हो सकता है।

छतीसगढ़ के चुनावी माहौल की असल बात मतदाताओं का या तो भूपेश बघेल के पक्ष में होना है या मौन रहना है। 2018के चुनाव में उत्तर से लेकर दक्षिण तक छत्तीसगढ़ियों में बदलाव का जुनून था।भाजपा और डॉ. रमन सिंह के खिलाफ तब मुखर सत्ता विरोधी लहर थी। जनता का मूड एक ऐसे मुख्यमंत्री से छुटकारा पाने का था जो पन्द्रह साल से लगातार राज कर रहा था। इसमें जुड़ गया था मुफ्त की रेवड़ियों का भूपेश बघेल का वायदा, जो सभी को पसंद आया। इसका नतीजा यह हुआ कि चुनावी गणित और केमिस्ट्री दोनों बघेल के पक्ष में हो गए।तभी कांग्रेस के पक्ष में वोट भाजपा से कोई दस प्रतिशत ज्यादा पड़े।

वैसा माहौल 2023 में कहीं नहीं हैं। भूपेश बघेल अभी भी मुख्यमंत्री पद की पहली पसंद हैं और बघेल के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर कहीं नज़र नहीं आती है और ना ही जनता उन पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों से तनिक भी नाराज या गुस्से में है।इस बारे में पूछने पर 80 साल के गणेश गीतलहरी ने छूटते ही कहा-, ‘‘सारे के सारे  राजनीतिज्ञ भ्रष्ट होते हैं, रमन सिंह के भी वक्त क्या-क्या सुनते थे…और जब भी नेता सत्ता हासिल कर लेते हैं तो और अधिक भ्रष्ट हो जाते हैं। भूपेश बघेल ने कम से कम जो वादे किये थे उन्हें पूरा तो किया”।

लोगमौटे तौर पर अपने फायदे का हिसाब लगा कर वोट देने के मूड में है। यही वजह है कि दोनों पार्टियों ने बहुत सारी चीजें फ्री देने का वायदा किया है। किसानों, आदिवासियों, महिलाओं और युवाओं सबके लिए बड़े-बड़े वायदे हैं।

भाजपा के पक्ष में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता है। उनको ले कर कोई विरोधी या नाराजगी वाली बात नहीं है। वे मानों सबके पसंदीदा मसीहा हैं। लेकिन एक धारणा, जो जाति, समुदाय और लिंग की सीमाओं से ऊपर लगभग सभी की सोच में झलकती है वह यह है कि राज्य के लिए बघेल बढ़िया हैं और देश के लिए मोदी। हमेशा की तरह, भाजपा के उम्मीदवार मोदी के चेहरे के भरोसे है।भाजपा  इसे ‘भ्रष्ट’ बघेल और ‘मसीहा’ मोदी के बीच चुनाव बनाना चाहता हैं लेकिन बात नहीं बन रही। लोग अपनी जरूरत की कसौटी में जानते हैं कि उनके लिए कौन बेहतर है। और यही छतीसगढ चुनाव का सबसे अहम पहलू है।

बाहरी लोगों की धारणा के विपरीत छत्तीसगढ़ की जनता काफी जागरूक है और राजनैतिक-सामाजिक जानकारी का उनकास्तर उत्तरप्रदेश और बिहार की जनता से ज्यादा लगता है। मैं जितने भी गांवों में गई वहां मुझे लोग अखबार पढ़ते और पार्टियों द्वारा निःशुल्क चीजें दिए जाने के हर वायदे के गुण-दोष पर चर्चा करते नजर आए। मोरा में 70 साल के उदयचन्द बघेल दोनों पार्टियों द्वारा किए जा रहे वायदों पर इस हद तक नजर रख रहे हैं कि वे अखबारों की कतरनें लेकर मेरे पास आए और कांग्रेस व भाजपा के घोषणापत्रों की खबरें दिखाते हुए इस ओर ध्यान दिलाया कि दोनों पार्टियों के घोषणापत्र करीब-करीब एक जैसे हैं। लेकिन ये तो बुजुर्ग मतदाताओं की बात है।जबकि यूथ मतदाताओं की गुरु तो वाट्एसप यूनिवर्सिटी ही है।

बावजूद इस सबके चुनाव अब पहले जैसे नहीं रहे। पोस्टर, बैनर, कटआउट और भौंपू और महौल जैसा कुछ खास नहीं है। माहौल नीरस है। गांव उंघते से लगते हैं, महिलाएं अभी भी अपनी स्वतंत्र राय व्यक्त करने में हिचकिचाती हैं और युवा पुरूषों और महिलाओें का आकर्षण इलेक्ट्रानिक मीडिया की ओर है।

पिछले कुछ चुनावों से, चाहे वह झारखंड हो या उत्तरप्रदेश, यही प्रवृत्ति, रूखा-सूखा माहौल लगातार बढ़ता दिख रहा है। चुनाव और त्यौहार दोनों नजदीक होने के बावजूद त्यौहारों के प्रति उत्साह और चुनावी मूड दोनों ख़ास नज़र नहीं आ रहे हैं – केवल भाजपा को छोड़कर जिसने समय से पहले ही पटाखे फोड उत्सव मनाना शुरू किया है। (कॉपी: अमरीश हरदेनिया)

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