भारत में कई चुनाव परिणाम सरकारें बदलते हैं, लेकिन कुछ परिणाम राजनीतिक समझ बदलते हैं। बांकीपुर और दतिया के उपचुनाव उसी दूसरी श्रेणी के हैं। उन्होंने भाजपा की चुनावी ताकत को नहीं डिगाया, न ही मोदी-शाह की राजनीति का अंत घोषित किया। लेकिन इतना जरूर बता दिया कि मतदाता उस राजनीतिक खेल से बाहर निकलने लगा है, जिसमें उसे जाति, धर्म, लाभार्थी, राष्ट्रवाद या संगठन की तयशुदा श्रेणियों में बंधा हुआ समझा जाता था। अब भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि वही मतदाता है जिसकी नस पकड़ लेने का उसका दावा रहा है। और लोकतंत्र में सबसे निर्णायक क्षण वही होता है, जब मतदाता अनुमानित रहना छोड़ देता है।
बांकीपुर और दतिया ने भाजपा की अजेयता की आभा में पहली स्पष्ट दरार दिखाई है। उन्होंने उसकी सबसे सुरक्षित सीटों को भी सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। ये दोनों सीटें इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे ऐसे राजनीतिक भूगोल का हिस्सा हैं, जहाँ भाजपा को स्वयं पर भरोसा करने के पर्याप्त कारण थे—मजबूत संगठन, अनुकूल जातीय समीकरण, वर्षों की राजनीतिक निष्ठाएँ और सबसे बढ़कर जीत की आदत। समय के साथ सुरक्षित सीटों का अपना एक मनोविज्ञान बन जाता है। चुनाव होते रहते हैं, उम्मीदवार बदलते रहते हैं, प्रचार चलता रहता है, मतगणना भी होती है। लेकिन धीरे-धीरे जीत किसी संघर्ष का परिणाम नहीं, बल्कि एक तयशुदा उत्तराधिकार जैसी लगने लगती है।
बांकीपुर ऐसी ही सीट थी। लगभग तीन दशक तक भाजपा का कब्ज़ा रहा। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव नितिन नवीन पाँच बार विधायक रहे और पीछे ऐसी सीट छोड़ गए, जिसे राजनीतिक दल धीरे-धीरे चुनाव नहीं, अपनी विरासत मानने लगते हैं। दूसरी ओर प्रशांत किशोर कुछ ही महीने पहले सक्रिय चुनावी राजनीति में उतरे थे। माहौल भी उनके पक्ष में नहीं था। फिर भी वे लगभग उन्नीस हजार वोटों की बढ़त के साथ विजयी होकर निकले।
दतिया की कहानी अलग थी, लेकिन उसका राजनीतिक संदेश उतना ही गहरा था। यहाँ भाजपा के पास लगभग वे सभी चुनावी हथियार मौजूद थे, जिन पर उसकी चुनावी मशीन सबसे अधिक भरोसा करती है—मजबूत संगठन, प्रभावशाली सवर्ण मतदाता, ब्राह्मण उम्मीदवार, व्यापक ग्वालियर-चंबल का राजनीतिक प्रभाव और नरोत्तम मिश्रा की विरासत। इसके बावजूद कांग्रेस सीट जीत गई।
यहाँ तक कि गुजरात की मंजलपुर, जहाँ भाजपा अपनी सीट बचाने में सफल रही, वहाँ भी एक महत्वपूर्ण संकेत छिपा था। सीट तो पार्टी के पास रही, लेकिन 2022 में एक लाख से अधिक वोटों के अंतर से मिली जीत का विशाल अंतर इस उपचुनाव में स्पष्ट रूप से सिमट गया।
यानी तीनों सीटों की असली कहानी यह है कि मतदाता अचानक भाजपा के लिए कम अनुमानित होता दिख रहा है। परिवर्तन भले छोटा हो, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के लिए उसका महत्व असाधारण है।
कहा जा सकता है कि बांकीपुर में मुश्किल से एक-तिहाई मतदाता मतदान के लिए निकले। दतिया में भी मतदान बहुत अधिक नहीं हुआ। यह सही है कि उपचुनावों में मतदान सामान्य चुनावों की तुलना में कम रहता है। लेकिन संभव है कि यही कम मतदान इस कहानी की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हो।
भाजपा की सबसे बड़ी चुनावी ताकत केवल समर्थक बनाना नहीं रही है, बल्कि समर्थकों को मतदान केंद्र तक ले जाने की भी रही है। यदि समर्थक विरोधी खेमे में चले जाएँ तो वह एक चुनौती है। लेकिन यदि वे मतदान के लिए निकलना ही आवश्यक न समझें, तो चुनौती कहीं अधिक गहरी हो जाती है।
बड़ी पार्टियाँ अक्सर तब हारना शुरू नहीं करतीं, जब उनके मतदाता किसी दूसरे दल से प्रभावित होने लगते हैं। वे तब कमजोर पड़ती हैं, जब उनके अपने मतदाता यह महसूस करना छोड़ देते हैं कि हर चुनाव में पार्टी को जिताना उनका दायित्व है। इस नाते उदासीनता कई बार विरोध से भी अधिक गंभीर संकेत होती है।
यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। क्या वह मतदाता, जिसे भाजपा पिछले एक दशक से सबसे बेहतर ढंग से समझती रही, अब स्वयं बदलने लगा है?
भारतीय राजनीति में मोदी-शाह की भाजपा ने मतदाता की अनेक पहचानों को एक साथ पढ़ा और उनसे अलग-अलग भाषा में संवाद स्थापित किया—हिंदू मतदाता, महिला मतदाता, लाभार्थी, आकांक्षी मध्यवर्ग, गरीब, पहली बार मतदान करने वाला युवा और राष्ट्रवादी नागरिक। सबकी चिंताएँ अलग थीं, आकांक्षाएँ अलग थीं, लेकिन उनकी राजनीतिक मंज़िल एक ही बनती गई।
लगभग एक दशक तक यह रणनीति असाधारण रूप से सफल रही। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। राजनीतिक श्रेणियाँ अभी भी वही हैं, पर उनके भीतर रहने वाले लोग बदलने लगे हैं।
यही कारण है कि नितिन नवीन का वह बयान, जिसमें उन्होंने भारत के “असल” जेन-ज़ेड की परिभाषा गढ़ने की कोशिश की, अब साधारण राजनीतिक टिप्पणी नहीं रह जाता। छात्र जब सड़कों पर उतरे तो उन्होंने आंदोलन कर रहे युवाओं और उन युवाओं में फर्क किया, जिन्हें वे देश का वास्तविक प्रतिनिधि मानते थे—करियर बनाने वाले, स्टार्टअप खड़े करने वाले और राष्ट्र निर्माण में लगे युवा।
यह केवल एक आंदोलन से असहमति नहीं थी। यह तय करने की कोशिश थी कि असली युवा कौन है और कौन नहीं।
लेकिन आज का युवा किसी राजनीतिक दल को यह अधिकार नहीं देता। वह स्टार्टअप भी बनाना चाहता है और प्रश्नपत्र लीक होने पर जवाबदेही भी मांगना चाहता है। वह राष्ट्रवादी भी हो सकता है और अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रदर्शन भी कर सकता है। एक मध्यवर्गीय परिवार मोदी की लोकप्रियता को स्वीकार कर सकता है, लेकिन उसी परीक्षा व्यवस्था पर नाराज़ भी हो सकता है, जिसके लिए उसके बच्चे ने वर्षों तैयारी की हो। कोई सवर्ण मतदाता सांस्कृतिक रूप से भाजपा के साथ बना रह सकता है, लेकिन आर्थिक अवसरों और रोजगार को लेकर अधीर भी हो सकता है। लाभार्थी सरकारी योजनाओं का लाभ ले सकता है, लेकिन उसे स्थायी राजनीतिक वफादारी में बदलने से इनकार भी कर सकता है।
मतलब जिस व्यक्ति को राजनीति अलग-अलग खानों में रखकर देखती रही, वही व्यक्ति अब कई पहचानें एक साथ जी रहा है।
और यदि प्रदर्शनकारी और राष्ट्र-निर्माता वास्तव में एक ही व्यक्ति हों, तो?
यही वह संभावना है, जिसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली राजनीति सबसे कठिन पाती है। नितिन नवीन ने देश को बताने की कोशिश की कि “असल” युवा कौन है। लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसी बांकीपुर के मतदाताओं ने, जिसने उनके परिवार को दशकों तक राजनीतिक ताकत दी थी, मतदान के जरिए अपना जवाब दे दिया।
शायद लगातार जीतते रहने का सबसे बड़ा खतरा यही होता है। एक समय बाद सफल राजनीतिक दलील राजनीतिक धारणा में बदल जाती है। भाजपा की पुरानी चुनावी रणनीति पूरी तरह विफल नहीं हुई है। लेकिन मतदाता के प्रश्न भी बदल रहे हैं और उसकी चिंताएँ भी।
बिहार में जंगलराज की स्मृति आज भी जीवित हो सकती है, लेकिन बाईस वर्ष का युवा अगले महीने होने वाली परीक्षा को लेकर अधिक चिंतित है। राम मंदिर आज भी करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा विषय है, लेकिन नौकरी की तलाश कई परिवारों के लिए उससे भी अधिक तात्कालिक चिंता बन चुकी है। कोई युवा भारत की वैश्विक महत्वाकांक्षा पर गर्व कर सकता है और उसी समय यह भी पूछ सकता है कि अपनी ही सरकार से सवाल पूछने के रास्ते में पुलिस की बैरिकेडिंग क्यों खड़ी है।
इसलिए पुरानी राजनीतिक पहचानें समाप्त नहीं हुई हैं। धर्म, जाति, राष्ट्रवाद और कल्याणकारी योजनाएँ—इन सबकी प्रासंगिकता बनी हुई है। लेकिन अब इनके समानांतर रोजमर्रा का अनुभव भी राजनीति को प्रभावित करने लगा है। वर्तमान जीवन की परेशानियाँ पुरानी पहचानों से प्रतिस्पर्धा कर रही हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव ने इसी परिवर्तन की पहली गंभीर झलक दिखाई थी। मतदाता ने नरेंद्र मोदी को सत्ता से बाहर नहीं किया। लेकिन उन्हें वह जनादेश भी नहीं दिया, जिसकी भाजपा अपेक्षा कर रही थी। उसने उससे कहीं अधिक जटिल संदेश दिया—मोदी फिर प्रधानमंत्री बनें, लेकिन भाजपा अपने दम पर बहुमत तक न पहुँचे।
इसीलिए बांकीपुर और दतिया महत्वपूर्ण हैं। इसलिए नहीं कि उन्होंने 2024 के बाद भाजपा की वापसी की कहानी पलट दी है। ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। उनका महत्व इसलिए है कि उन्होंने वही प्रश्न फिर से जीवित कर दिया है, जो 2024 में सामने था—क्या वोटर उस पार्टी से पूरी तरह बंध गया है जितनी पार्टियां मान रही है? या बदलती हकीकत अब राजनीतिक मिजाज बदलने लगी हैं?
सच यह है कि मतदाता की कोई भी पहचान समाप्त नहीं हुई है। धर्म अभी भी मायने रखता है। जाति भी। लिंग भी। कल्याणकारी योजनाएँ भी। लेकिन अब जीवन इन सभी सीमाओं को एक साथ पार कर रहा है। प्रश्नपत्र लीक होता है तो उसका असर सवर्ण परिवार पर पड़ता है तो ओबीसी परिवार पर भी। बेरोज़गारी लाभार्थी को भी उतनी ही बेचैन करती है, जितना मध्यवर्ग को। महँगाई और अवसरों की कमी किसी एक जाति या वर्ग की समस्या नहीं रह हई।
राजनीतिक दल चुनावों को भले सामाजिक समीकरणों में गुथे लेकिन जनाक्रोश हमेशा उन्हीं से गुथा नहीं रहता। इसका अर्थ यह नहीं कि मतदाता भाजपा विरोधी हो गया है। अर्थ केवल इतना है कि वह पहले की तुलना में कम बंधा हुआ, कम पूर्वानुमेय और अधिक स्वतंत्र है। यही बात विपक्ष के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। कांग्रेस यह मानकर नहीं चल सकती कि भाजपा से निराश मतदाता स्वतः उसके साथ आ जाएगा। प्रशांत किशोर यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि बांकीपुर ने जन सुराज को बिहार का स्वाभाविक विकल्प बना दिया है। कोई भी राजनीतिक दल केवल जेन-ज़ेड की भाषा या उसके मीम अपनाकर यह दावा नहीं कर सकता कि नई पीढ़ी उसी के साथ खड़ी हो गई है।
ऐसी हर जल्दबाज़ी केवल एक राजनीतिक भ्रम की जगह दूसरा भ्रम खड़ा करेगी। यही संभवतः इन छोटे दिखने वाले उपचुनावों का सबसे बड़ा यही है।
मतदाता एक राजनीतिक डिब्बे से निकलकर दूसरे डिब्बे की और नहीं जा रहा है। वह शायद किसी भी डिब्बे में स्थायी रूप से बंद रहने से इनकार कर रहा है। वह सोचता हुआ है। मतदाता फिर से अप्रत्याशित होता जा रहा है। और लोकतंत्र में नागरिक की सबसे बड़ी शक्ति भी यही होती है कि उसे कोई स्थायी रूप से पढ़ न सके, बाँध न सके और अपना मानकर न चले।
