हाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक महत्वपूर्ण बात कही। जिस दिन दोपहर में धर्मेद्र प्रधान को इस्तीफा हुआ उसकी सुबह हैदराबाद में ‘समकालीन मातृत्व’ के एक कार्यक्रम में कहा, “समाज में जो बदलाव देखना चाहते हैं, उसकी शुरुआत स्वयं से कीजिए। सोशल मीडिया पर कम समय बिताइए। मोबाइल अनुशासन अपनाइए।” फिर उन्होंने जेन-ज़ेड पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह पीढ़ी “स्वभाव से भावुक है और बहुत शांत मन से नहीं सोचती।”
पहली बात से असहमत होना कठिन है। मोबाइल अनुशासन आज सचमुच समय की आवश्यकता है। क्योंकि पिछले बारह वर्षों में भारत ने केवल इंटरनेट नहीं अपनाया, बल्कि उसके प्रति लगभग आसक्त हो गया है। आंकड़े इसकी कहानी कहते हैं। 2014 में भारत में लगभग 25 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता थे। सितंबर 2025 तक यह संख्या बढ़कर करीब 102 करोड़ हो गई। आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन बाजार है। देश में लगभग 75 करोड़ स्मार्टफोन हैं और करीब 50 करोड़ लोग सोशल मीडिया का सक्रिय उपयोग करते हैं। लेकिन सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा शायद यह है कि 2014 में प्रति व्यक्ति मासिक मोबाइल डेटा खपत जहां केवल 62 एमबी थी, वहीं 2025 तक वह बढ़कर लगभग 24 जीबी हो गई।
यह केवल वृद्धि नहीं है। यह पूरे देश के जीने के तरीके में आया एक बुनियादी बदलाव है। इसकी सबसे बड़ी वजह 2016 में मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो थी, जिसने सस्ता डेटा और सुलभ स्मार्टफोन करोड़ों लोगों तक पहुंचाया। राजनीतिक दृष्टि से भी इसका समय बेहद अनुकूल साबित हुआ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय तक एक बात समझ चुके थे, स्मार्टफोन नेता और मतदाता के बीच के लगभग सभी बिचौलियों को खत्म कर सकता है। इसे भारतीय राजनीति का बड़ा हिस्सा अभी भी सीख ही रहा था। 2014 के चुनाव में वे डिजिटल प्रचार की ताकत दिखा चुके थे। जैसे-जैसे इंटरनेट फैला, उसकी राजनीतिक संभावनाएं भी बढ़ती गईं। स्मार्टफोन ने उन्हें केवल व्यापक पहुंच नहीं दी, बल्कि उससे कहीं अधिक मूल्यवान चीज दी— लोगों से सीधा और निजी संबंध। प्रधानमंत्री बिना किसी शहर या गांव में पहुंचे लोगों के घरों तक पहुंच थे। संवाद लगातार, निजी, एक तरफा, मन की बात बोलने और उनका जेबी हो गया था। नेता और नागरिक के बीच की दूरी अचानक सिमट गई।
इसे डिजिटल इंडिया कहा गया—तकनीकी क्रांति, जिसे राष्ट्रीय प्रगति की भाषा में प्रस्तुत किया गया। भारतीयों ने इसे पूरे उत्साह से अपनाया। लेकिन धीरे-धीरे स्मार्टफोन केवल डिजिटल भागीदारी का साधन नहीं रहा। वह राजनीतिक संवाद का सबसे प्रभावशाली माध्यम बन गया—तत्काल, बिना किसी मध्यस्थ के, और इतना शक्तिशाली कि वही तय करने लगा कि विमर्श किस दिशा में जाएगा, किस कहानी पर विश्वास किया जाएगा और किस प्रचार को सबसे अधिक जगह मिलेगी।
दिलचस्प बात यह है कि बारह साल बाद सरकार भी अब इसी मॉडल को खुलकर स्वीकार करती दिखाई देती है।
इस महीने न्यूजीलैंड में विदेश मंत्रालय की एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान एक पत्रकार ने पूछा कि प्रधानमंत्री मोदी ने वहां के स्थानीय पत्रकारों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं की? इस पर विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) रुद्रेंद्र टंडन ने कहा कि मोदी “भारतीय राजनीति के आदर्श प्रतिनिधि” हैं, जो बिचौलियों के बजाय सीधे जनता से संवाद करना पसंद करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री ने वर्षों में इस शैली को “पूर्णता” तक पहुंचा दिया है। आज मोबाइल फोन देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी बन चुका है।
भागवत ने यह भी कहा कि बच्चे इसलिए मोबाइल से चिपके रहते हैं क्योंकि उनके माता-पिता भी अपने फोन से अलग नहीं होते। इसमें भी सच्चाई है। लेकिन यदि बच्चे अपने माता-पिता की नकल करते हैं, तो नागरिक भी सार्वजनिक संस्कृति से सीखते हैं। और पिछले बारह वर्षों में भारत की सार्वजनिक संस्कृति को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जितना शायद ही किसी और ने आकार दिया हो।
इसलिए यदि मोबाइल अनुशासन का राष्ट्रीय अभियान चलाना है, तो उसकी शुरुआत प्रधानमंत्री को स्वयं को कराना होगा। आखिर जो नेता लोगों से बालकनी में ताली बजवा सकता है, थाली बजवा सकता है, दीये जलवा सकता है और ऐप डाउनलोड करवा सकता है, वह करोड़ों लोगों से यह भी कह सकता है कि दिन में एक घंटा मोबाइल किनारे रखिए।
लेकिन भागवत की दूसरी टिप्पणी सही नहीं है। उनका कहना है कि जेन-ज़ेड भावुक है और शांत मन से नहीं सोचती।
कुछ समय पहले तक शायद मैं भी यही मानती। मेरी पीढ़ी और उससे पहले की पीढ़ियों ने जेन-ज़ेड के लिए एक पूरी शब्दावली बना रखी है—आलसी, मुश्किल, अधिकारवादी, अधीर, ध्यान भटकने वाली, दबाव न झेल पाने वाली। नौकरी जल्दी छोड़ देती है। रिश्ते जल्दी तोड़ देती है। छोटी-सी परेशानी पर कह देती है—“यह मेरी मानसिक सेहत पर असर डाल रहा है।”
लेकिन पिछले सप्ताह मैंने दिल्ली की सड़कों पर इन्हीं युवाओं के बीच कई दिन बिताए। उन्हें सुना, उनके साथ चली। और कुछ ही दिनों में उन्होंने हमारी अधिकांश धारणाओं को गलत साबित कर दिया।
जेन-ज़ेड को भावनाएं नहीं, बल्कि तर्क चलाता है—और कई बार वह बेबाक, बेहद कठोर तर्क होता है।
उन्होंने अपने माता-पिता और दादा-दादी को दशकों तक उन नौकरियों की शिकायत करते देखा जिन्हें उन्होंने कभी छोड़ा नहीं। उन्होंने बड़ों को छुट्टियां, शौक, दोस्तियां, यहां तक कि अपने व्यक्तित्व का एक हिस्सा भी उस भविष्य के लिए टालते देखा, जो हमेशा भविष्य ही बना रहा। उन्होंने लोगों को अधिक मेहनत करते देखा, जबकि जीवनशैली उससे भी तेजी से महंगी होती गई। उन्होंने पचास की उम्र में ऐसे लोगों को देखा जिनके बैंक खाते में पैसा था, लेकिन समय नहीं; शौक नहीं; और कई बार जीवन का आनंद भी नहीं बचा था।
तभी फिर जेन-ज़ेड ने बहुत शांत होकर पूछा, सोचा—हम ऐसा जीवन क्यों चाहेंगे?
हम इसे अधीरता कहते हैं। अधिकारबोध कहते हैं। जिम्मेदारियों से भागना कहते हैं। वे इसे केवल एक खराब सौदा कहते हैं। और शायद मूर्खता भी।
जेन-ज़ेड वास्तविकता से भागती नहीं। उसने वास्तविकता को बहुत ध्यान से देखा है।
यह भागवत की पीढ़ी के लिए भी असहज प्रश्न है और मेरी पीढ़ी के लिए भी। हमें अलग तरह से तैयार किया गया था—माता-पिता से डरना, समाज की चिंता करना, बड़ों की बात मानना, नौकरी से वफादार रहना, सहते रहना, सवाल कम करना।
हमारे आंदोलन भी इसी विरासत से बने थे। जेपी आंदोलन से लेकर आपातकाल विरोधी संघर्ष, अन्ना हजारे आंदोलन और निर्भया आंदोलन तक—विरोध में नैतिक आक्रोश था, त्याग था, गुस्सा था और कई बार भय भी था।
जेन-ज़ेड अपने साथ गुस्सा भी लाई। लेकिन उसने गंभीरता का बोझ उठाने से इनकार कर दिया। उसका गुस्सा तर्क के साथ आया, और आश्चर्यजनक रूप से हास्य, कटाक्ष, व्यंग के साथ भी। उसे अपनी राजनीति को गंभीर साबित करने के लिए पीड़ा, रोने -धोने के प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं लगी।
यहीं शायद पुरानी पीढ़ियां उसे समझ नहीं पा रहीं है।
संभव है भावनाओं ने हमारी पीढ़ी का विवेक अधिक धुंधला किया हो। हम नौकरियों में टिके रहे, विवाहों में टिके रहे, शहरों में टिके रहे—कई बार केवल इसलिए कि किसी को निराश न करना पड़े। “लोग क्या कहेंगे” नाम की उस भारतीय अदालत से हम जीवन भर डरते रहे। हमने सहते रहने को परिपक्वता समझ लिया और दुख झेलने को सद्गुण।
जेन-ज़ेड ने इस विरासत को नामंजूर कर दिया है।
वह यह नहीं मानती कि सार्थक जीवन जीने के लिए पहले लंबे समय तक कष्ट सहना जरूरी है। वह दशकों तक समझौते करते रहने, इंतजार करते रहने और उस काल्पनिक “एक दिन” का सपना देखने को तैयार नहीं है, जब भारत फिर “सोने की चिड़िया” बन जाएगा और जीवन तब शुरू होगा।
यह ऐसी पीढ़ी है जो ऐसे समय में जवान हो रही है जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता करियर की पूरी दुनिया बदल रही है और जलवायु संकट भविष्य को ही अनिश्चित बना रहा है। इसलिए वह अपनी इच्छाओं को भी टालना नहीं चाहती। उसकी सोच सरल है—जब तक जीवन है, तब तक जी भी लिया जाए।
इसलिए मुझे नहीं लगता कि जेन-ज़ेड शांत मन से नहीं सोचती। मुझे लगता है कि उसने बहुत शांत मन से पिछली पीढ़ियों का जीवन देखा है और तय किया है कि उसे उसी रास्ते पर नहीं चलना।
शायद यही बात आपको और हमारी पीढ़ी के बहुत-से लोगों को असहज करती है। हमने अपना जीवन “लोग क्या कहेंगे” की चिंता में बिताया। जेन-ज़ेड केवल एक सवाल पूछती है—“मुझे इसकी परवाह क्यों करनी चाहिए?”
और सच कहें तो यह सवाल गलत नहीं है।
अपने भाषण में भागवत ने स्वयं कहा है कि समय के साथ बदलना भारत की परंपरा का हिस्सा है। यदि ऐसा है, तो फिर अपनी सोच भी बदलिए। जेन-ज़ेड को उसके तरीके से जीने दीजिए। शायद वही वह बदलाव लेकर आए, जिसका इंतजार हमारी पीढ़ियां केवल करती रहीं, घसीटती रही।
