नई दिल्ली। जब आवाज़ें जुड़ती हैं, मन के तार मिलते है, सुर से सुर मिलते है तो कितनी ही कोशिश हो शक्ति बिखरती नहीं बल्कि संगठित होती है। और जब शक्ति संगठित हो जाती है, तो सबसे ताकतवर सत्ता को भी समझना, मानना होता है कि वह उतनी अजेय नहीं है, जितना उसने स्वयं को मान
लिया था। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा अप्रत्याशित था। आखिर छात्र, नौजवान उनतीस दिनों से सड़कों पर थे। सोनम वांगचुक का अनशन आंदोलन को नैतिक ऊर्जा दे चुका था। लेकिन सरकार को भरोसा था कि यह विरोध भी बाकी आंदोलनों की तरह थक जाएगा, पीट जाएगा, दम तोड़ देगा। फिर 20 जुलाई आया। दिल्ली की सड़कों पर वह पीढ़ी उतर आई, जिसे शायद सरकार बैरिकेडों, बंद मेट्रो स्टेशनों और पुलिस के अभूतपूर्व घेरे में कैद कर लेने का भ्रम पाल बैठी थी।
सरकार ने सोचा था कि डर छात्रों को घरों में रोक देगा। लेकिन उसी समय एक और मोर्चा खुल चुका था—उस मैदान में, जिस पर पिछले एक दशक से भाजपा का लगभग एकछत्र वर्चस्व रहा है। वह मैदान था सोशल मीडिया। एक दशक से अधिक समय तक नरेंद्र मोदी और भाजपा ने स्क्रीन की राजनीति को नई परिभाषा दी। तस्वीरें, हैशटैग, सावधानी से गढ़े गए वीडियो, वायरल क्लिप और पारंपरिक मीडिया को दरकिनार कर जनता तक सीधी पहुँच—ये प्रचार के साधन भर नहीं थे। यही उनकी राजनीतिक शक्ति की सबसे बड़ी पूँजी बन गए थे।
लेकिन पिछले एक महीने में, और खासकर पिछले एक सप्ताह में, एल्गोरिद्म जैसे करवट लेने लगे। पहली बार डिजिटल हवा का रुख बदलता दिखाई दिया।
पिछले दो दिनों में स्वयं प्रधानमंत्री ने भी इस बदलती हवा को अपनी ओर मोड़ने की कोशिश की। जनरेशन ज़ेड से संवाद स्थापित करने के लिए रीलें जारी की गईं। लेकिन वह दाँव भी उल्टा पड़ा। उनके वीडियो सामने आते ही वे काटे गए, रीमिक्स हुए, मीम बने और देखते ही देखते व्यंग्य में बदल गए। छवि सुधारने की सरकार की हर कोशिश अगले मीम का कच्चा माल बनती चली गई। प्रधानमंत्री जनरेशन ज़ेड की भाषा बोलने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन जनरेशन ज़ेड उसी भाषा में उन्हें जवाब देने लगी—और कहीं अधिक प्रभावशाली ढंग से।
यहीं मोदी सरकार की सत्ता पिछड़ गई।
जनरेशन ज़ेड वह पीढ़ी नहीं है जो शाम के समाचार बुलेटिन का इंतज़ार करती हुई बड़ी हुई हो। यह टिकटॉक, स्नैपचैट, इंस्टाग्राम, यूट्यूब शॉर्ट्स, एडिट्स, रीमिक्स और मीम्स की दुनिया में पली-बढ़ी पीढ़ी है। यह सहज रूप से जानती है कि तीन सेकंड में ध्यान कैसे खींचा जाता है, एक तस्वीर को तर्क में कैसे बदला जाता है और एक विचार को लाखों स्क्रीन तक कैसे पहुँचाया जाता है।
शायद पहली बार भाजपा का सामना ऐसे प्रतिद्वंद्वी से हुआ, जिसे वह न बेहतर वीडियो बनाकर पछाड़ सकी, न बेहतर मीम बनाकर।
यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता थी।
इसकी राजनीतिक भाषा किसी पुरानी पीढ़ी से उधार नहीं ली गई थी। यह भाषणों, पर्चों और घोषणापत्रों से नहीं चली। यह मीम बनकर फैली, जानबूझकर टेढ़े-मेढ़े पोस्टरों पर लिखी गई, बॉलीवुड गीतों पर बनी रीलों में दिखी और पुलिस की भागदौड़ भी कुछ घंटों के भीतर ऐसे वीडियो में बदल गई, जिन्हें देखकर लोग केवल हँसे नहीं—संदेश भी समझ गए।
यहीं मजाक, खिल्ली, हास्य ने जन प्रतिरोध का देश में चारों तरफ फैला दिया। मखौल, मजाक और व्यंग्य की मार आंदोलन का सबसे असरदार हथियार साबित हुआ। और क़ॉकरोच करार दी गई जनरेशन जेड ने यह लबोलुआब बताया है कि झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए!’
