भारतीय राजनीति को अचानक युवा मतदाता याद आ गया है। राहुल गांधी रंग-बिरंगी शर्टों में प्रयागराज से पुणे तक युवाओं की भीड़ से संवाद कर रहे हैं। उधर भाजपा नई पीढ़ी को समझने के लिए अपने पुराने अनुभवी चेहरों की टीम बना रही है। दोनों तस्वीरें साथ रखें तो रणनीतियां एक-दूसरे के उलट दिखाई देती हैं। मगर हैं नहीं। एक पार्टी कॉलर ढीला कर रही है, दूसरी संगठन की पकड़ कस रही है। दोनों ने एक ही साफ बात समझी है—2029 का रास्ता उस पीढ़ी से होकर जाएगा, जिसे अब कोई भी पार्टी अपना तयशुदा वोटर नहीं कह सकती।
लेकिन तस्वीरों और दिखावे से आगे देखें तो पुरानी राजनीतिक आदतें भी लौटती दिखाई देती हैं।
पिछले सप्ताह भाजपा के संगठनात्मक फेरबदल को लगभग तुरंत उस पार्टी की वापसी के रूप में पढ़ा गया, जो राजनीति को पूरी ताकत से लड़ना जानती थी। पुराने और परिचित चेहरे वापस लाए गए। डिजिटल अभियान की कमान बदली गई। पुरानी राजनीतिक मशीनरी ने लगभग तुरंत अपनी ताकत दिखानी शुरू कर दी। स्मृति ईरानी संगठन में लौटीं और लगभग उतनी ही तेजी से प्राइम टाइम पर भी। सामने फिर राहुल गांधी थे और तेवर वही, जिनसे कभी उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान बनाई थी। पार्टी के सोशल मीडिया अभियान के शीर्ष पर अमित मालवीय की जगह पुराने ढंग के अनुभवी दीपक म्हस्के आए और कुछ ही दिनों बाद जनरेशन जेड तक पहुंचने के लिए अलग टीम बना दी गई।
पुरानी स्क्रीप्ट मानो तय समय पर फिर शुरू हो गई—चुनौती देने वाले को पहचानो, उस पर एक लेबल चिपकाओ और बहस की दिशा तय कर दो। पिछले बारह वर्षों में भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकतों में एक यही रही है। केवल बहस जीतना नहीं, बल्कि यह तय कर देना कि बाकी देश अगले पूरे सप्ताह बहस किस बात पर करेगा।
दूसरी तरफ राहुल गांधी अलग तरह के रीसेट की कोशिश में हैं। फिलहाल सफेद कुर्ते वाले नेता की कुछ अकड़ और औपचारिकता गायब है। रंगीन शर्टें हैं, कैंपस में बातचीत है और छात्रों तक पहुंचने का अभियान लगातार फैल रहा है। लेकिन इस अनौपचारिकता के नीचे कांग्रेस की एक बहुत पुरानी राजनीतिक सहज-वृत्ति मौजूद है—उन लोगों के इर्द-गिर्द राजनीति खड़ी करना, जिन्हें लगता है कि सत्ता और संसाधनों में उन्हें उनका हिस्सा नहीं मिला।
जाति जनगणना राहुल गांधी के लिए वह ‘एक्स-रे’ है, जो दिखाएगा कि किसके पास क्या है और किसके पास नहीं। कथित ‘वोट चोरी’ के खिलाफ उनका अभियान इसी तर्क के सामने एक सत्ता-प्रतिष्ठान खड़ा करता है, जिससे लड़ा जा सके। मंच नया है, माहौल युवा है और नेता पहले से कहीं अधिक सहज दिखाई देता है। लेकिन राजनीतिक प्रवृत्ति जानी-पहचानी है।
इसलिए पिछले कुछ सप्ताह में भाजपा भी लड़ाई की पुरानी भाव-भंगिमा में है। कांग्रेस उस राजनीति को फिर खोज रही है, जिसे वह अपनी कह सके। दोनों राजनीति कर रहे हैं और राजनीति करने में कुछ गलत भी नहीं है। समस्या दूसरी है—राजनीति करने का यह हुनर अब अपनी उम्र दिखाने लगा है।
आजाद भारत के इतिहास में राजनीति एक पूरे पैकेज की तरह मिलती थी। परिवार, जाति, समुदाय, विचारधारा और पार्टी अक्सर साथ-साथ चलते थे। कांग्रेस के परिवार थे, भाजपा के परिवार थे, कम्युनिस्ट घराने थे और क्षेत्रीय दलों के प्रति पीढ़ियों की निष्ठाएं थीं। मंडल ने नई राजनीतिक पहचानें बनाईं तो मंदिर ने दूसरी पहचानों को मजबूत किया। भारतीय राजनीति ने मतदाता को समझाने से पहले उसकी जगह तय करना सीखा—पहचान खोजो, बेचैनी पहचानो, दुश्मन तय करो और फिर उसी के चारों ओर राजनीति खड़ी कर दो। जरूरत पड़े तो साम, दाम, दंड, भेद उसके औजार थे ही।
इसका अर्थ यह नहीं कि पिछली पीढ़ियां विरासत में मिली हर बात आंख बंद करके स्वीकार करती थीं। हर पीढ़ी ने अपने बुजुर्गों पर शक किया है, नेताओं का मजाक उड़ाया है और खुद को पिछली पीढ़ी से कम भोला माना है। भारतीयों को यह जानने के लिए इंस्टाग्राम की जरूरत कभी नहीं थी कि महंगाई बढ़ रही है, नौकरियां घट रही हैं या सरकार काम नहीं कर रही। मोबाइल फोन पर किसी भाषण का फैक्ट-चेक संभव होने से बहुत पहले वे सरकारें गिरा चुके थे।
तो फिर बदला क्या है?
यह नहीं कि आज की पीढ़ी ज्यादा जानती है। बदला यह है कि वह किसी बात को सच मानने तक पहुंचती कैसे है।
बीस साल का कोई युवा अब नाश्ते से पहले पांच अलग-अलग राजनीतिक दुनियाओं से गुजर सकता है—एक राष्ट्रवादी पॉडकास्ट, कोई नारीवादी रील, जातिगत भेदभाव पर वीडियो, मंदिर का क्लिप, राहुल गांधी पर कोई चुटकुला और नरेंद्र मोदी पर कोई निर्मम मीम। उसे इनमें कोई विरोधाभास दिखाई देना जरूरी नहीं। उसके लिए यह बस स्क्रॉल करना है—देखना, सुनना, कुछ मानना और अगले ही क्षण आगे बढ़ जाना।
और यहीं, इसी स्क्राल से राजनीति का पुराना पैकेज खुलकर बिखरने लगता है।
पार्टी आज भी पूरा पैकेज बेचना चाहती है—विचारधारा भी, शिकायत भी, नेता भी, निष्ठा भी और हो सके तो दुश्मन भी। युवा मतदाता उसमें से केवल वह हिस्सा उठा लेता है, जिससे वह सहमत है और बाकी को स्वाइप करके आगे निकल जाता है। वह जातिगत भेदभाव को गंभीर समस्या मान सकता है, लेकिन अपनी पूरी राजनीति जाति के हवाले करना जरूरी नहीं समझता। धार्मिक हो सकता है, मगर यह नहीं चाहता कि धर्म उसका हर वोट तय करे। एक मुद्दे पर राहुल गांधी से सहमत हो सकता है और अगले ही मुद्दे पर कांग्रेस को बेदम पा सकता है। सोमवार को मोदी की प्रशंसा कर सकता है और मंगलवार को उन्हीं पर बने मीम को शेयर कर हंस सकता है।
मगर राजनीति की पुरानी किताब अब भी वही सवाल पूछती है—बल्कि लगभग जिद करके पूछती है—तुम किस तरफ हो?
और जवाब पर्याप्त साफ न हो तो एक लेबल हमेशा तैयार मिलता है। भारतीय राजनीति ने उन लोगों का नामकरण करने की अद्भुत दक्षता हासिल कर ली है, जिन्हें वह अपने तय खानों में ठीक से रख नहीं पाती। लेकिन वह यह समझने में धीमी रही है कि नया मतदाता खुद को किसी खाने में फिट न होने वाला मानता ही नहीं। वह तो बस एक अलग सवाल पूछ रहा है—किस मुद्दे पर?
दुनिया के दूसरे लोकतंत्रों में भी कुछ ऐसा ही राजनीति की पुरानी गणित को बिगाड़ रहा है। ब्रिटेन और यूरोप के कुछ हिस्सों में युवा मतदाता पुराने वाम-दक्षिण के अनुमानों से कहीं कम अनुमानित साबित हो रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में युवाओं की बेचैनी का बड़ा हिस्सा मकान, जीवन-यापन की लागत और इस सवाल पर केंद्रित हुआ है कि राजनीति उस जिंदगी से कोई वास्ता भी रखती है या नहीं, जिसे वे वास्तव में बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटेन के निर्वाचन आयोग के निष्कर्ष भी बताते हैं कि रोजगार, पैसे, आवास और शिक्षा जैसे सवाल जब राजनीति को सीधे रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ते हैं तो युवाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ती है।
भारत निश्चित रूप से इस कहानी की हूबहू नकल नहीं करेगा। यहां जाति मायने रखती है। धर्म मायने रखता है। परिवार और समुदाय आज भी शक्तिशाली राजनीतिक ताकतें हैं। लेकिन एक पुरानी धारणा अब जोखिम भरी दिखाई देने लगी है—मतदाता कौन है, यह जान लिया तो यह भी जान लिया कि वह वोट किसे देगा।
और यहीं 2029 (लोकसभा चुनाव) दिलचस्प हो जाता है।
तब तक भारतीय राजनीति युवा मतदाता को लगभग अश्लील हद तक जान चुकी होगी। एआई आंकड़ों की धार को और तेज कर देगा। जाति के नक्शे उपभोग की आदतों से जुड़ेंगे। पार्टियों को पता होगा कि वह क्या देखती है, कहां स्क्रॉल करती है, किस चीज पर उसकी उंगली रुकती है और शायद यह भी कि उसे गुस्सा किस बात पर आता है। जनरेशन जेड के सेल होंगे, जनरेशन जेड की रणनीतियां होंगी, नेता पॉडकास्ट पर बैठे होंगे और इतनी रीलें बनेंगी कि अंततः शायद सबको दूरदर्शन याद आने लगे।
मशीन इस मतदाता के बारे में लगभग सब कुछ जानती होगी।
सिवाय शायद एक बात के—उसे अपने साथ टिकाए कैसे रखा जाए? क्योंकि इस मतदाता की सहमति उस तरह एक मुद्दे से दूसरे मुद्दे तक यात्रा नहीं करती, जैसा पार्टियां मानकर चलती हैं। वह आपके राष्ट्रवाद पर ताली बजा सकती है और आपके उम्मीदवार को नकार भी सकती है। आपकी जाति जनगणना का समर्थन कर सकती है और आपके गठबंधन को वोट देने से इनकार भी कर सकती है। आपके नेता को पसंद कर सकती है और उसी सप्ताह उस पर हंस भी सकती है।
यही वह उलझन है, जिसके लिए पुराने राजनीतिक खांचे, हिसाब, रणनीतियां बने ही नहीं थे।
इसीलिए राहुल गांधी की रंगीन शर्टें और भाजपा में पुराने दिग्गजों की वापसी दिलचस्प जरूर है, मगर अंततः असली मुद्दे के सामने गौण है। राहुल गांधी पहनावा बदलकर अधिक अनौपचारिक हो सकते हैं। भाजपा अपने संगठन की मांसपेशियां फिर कस सकती है। दोनों युवा दिखने, युवा भाषा बोलने और युवा मंचों पर मौजूद रहने में पहले से बेहतर हो सकते हैं। लेकिन कठिन बदलाव कपड़ों का नहीं, राजनीति का है।
राजनीतिक दल हमेशा मानते आए हैं कि सत्ता की कुंजी मतदाता को समझ लेने में है। वह कौन है, कहां रहता है, किस जाति और समुदाय से है, उसकी नाराजगी क्या है, उसकी आकांक्षा क्या है—इन सबको पहचानो और फिर उसके लिए सही संदेश तैयार कर दो। भारतीय चुनावी राजनीति की पूरी मशीनरी लंबे समय से इसी समझ पर खड़ी रही है।
लेकिन भारत का युवा मतदाता अब केवल एक ‘डेमोग्राफिक’ नहीं है, जिसे रिझाया जाए, उसकी प्रोफाइल बनाई जाए और फिर सही संदेश किसी पार्सल की तरह उसके पास पहुंचा दिया जाए। वह इससे कहीं अधिक असुविधाजनक मतदाता बन रहा है—ऐसा मतदाता, जो उस खाने, सांचे में टिके रहने से इनकार करता है, जिसमें राजनीति ने उसका नाम दर्ज कर रखा है।
2029 तक हर पार्टी को निश्चित रूप से मालूम होगा कि उसे कहां वोट खोजना है। उसके फोन पर, पॉडकास्ट में, रील में, कैंपस में, नौकरी की कतार में, परीक्षा के सवालों के बीच या महंगे होते शहर में घर खोजते हुए। उसके बारे में डेटा इतना होगा कि राजनीतिक दल शायद उसे उससे भी बेहतर जानने का दावा करें, जितना वह स्वयं को जानता है।
लेकिन तब उन्हें एक पुराना और कहीं अधिक ठंडा राजनीतिक सत्य समझ में आएगा— जिस मतदाता को आप किसी तय खाने में रखकर समझ नहीं सकते, आखिरकार फैसला वही करता है। पार्टियां जानेंगी सब, लेकिन वोटर करेगा अपने मन की। वह न नरेंद्र मोदी का अब है और न राहुल की रंगीन शर्ट, उनकी निडरता, बेधड़की में कांग्रेस-विपक्ष के पुराने खांचों को भूलने वाला है!
