बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए छह उम्मीदवार मैदान में हैं। राष्ट्रीय जनता दल ने अपने निवर्तमान राज्यसभा सांसद अमरेंद्रधारी सिंह को फिर से टिकट दिया है। खुद तेजस्वी यादव उनका नामांकन कराने गए थे। अगर संख्या के हिसाब से देखें तो विपक्ष के पास 41 विधायक हैं और एक सीट जीतने के लिए इतने ही सीटों की जरुरत होती है। लेकिन मुश्किल यह है कि इन 41 में आधा दर्जन पार्टियां हैं। मुख्य विपक्षी गठबंधन यानी महागठबंधन की 35 हैं, जिसमें राजद की 25 सीटें हैं तो कांग्रेस की छह, लेफ्ट की तीन, आईआईपी की एक और बसपा की एक सीट है। इसके अलावा ओवैसी की पार्टी के पांच विधायक हैं। इन सभी को मैनेज करना होगा। बताया जा रहा है कि कांग्रेस के प्रदेश के एक बड़े नेता और प्रदेश अध्यक्ष अपने छह विधायकों की गारंटी ले रहे हैं। उन्होंने तेजस्वी यादव से कहा है कि वे अपने सभी 25 विधायकों को एकजुट रखें।
दूसरी ओर सत्तारूढ़ एनडीए के पास चार सीटें जीतने के बाद पांचवीं सीट के लिए तीन वोट कम हो रहे हैं। उसे पहली वरीयता के तीन वोट चाहिए। ध्यान रहे बिहार में भाजपा और जदयू दोनों अपने अपने विधायकों के दम पर दो-दो सीटें जीत लेंगे। लेकिन पांचवीं सीट जीतने के लिए चिराग पासवान की लोजपा, उपेंद्र कुशवाहा की रालोमो और जीतन राम मांझी की हम पर निर्भरता है। इसके बावजूद तीन वोट कम हो रहे हैं। इस बीच खबर है कि राजद और कांग्रेस के प्रबंधक लोजपा, रालोमो और हम के विधायकों से संपर्क कर रहे हैं। लोजपा के दो विधायकों से राजद उम्मीदवार की बात होने की खबर है।
इस बीच पांचों सीटें जीतने का दबाव भाजपा के ऊपर आ गया है। ध्यान रहे बिहार में चुनाव से ठीक पहले सत्ता परिवर्तन हो रहा है। नीतीश कुमार से राज्यसभा का नामांकन दाखिल कराया गया है। इसके बाद भाजपा का मुख्यमंत्री बनने की चर्चा है। अगर ऐसे समय में एनडीए का उम्मीदवार चुनाव हारता है तो उसका ठीकरा भाजपा पर फूटेगा और मैसेज जाएगा कि नीतीश को हटाने की वजह से एनडीए को यह झटका लगा है। भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बिहार से हैं। सो, नितिन नबीन और संभावित मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी दोनों पर जिम्मेदारी है कि वे पांचों सीट जीतें।
