कांग्रेस में अध्यक्ष और प्रभारी महासचिवों के खाली पदों पर नियुक्तियों की चर्चा के साथ ही कांग्रेस में इस बात की भी चर्चा है कि राहुल गांधी राजनीतिक लोगों को आगे करेंगे या गैर राजनीतिक लोगों पर ज्यादा भरोसा करेंगे? यह सवाल भी है कि अगर राजनीतिक लोगों को आगे करेंगे तो पुराने और अनुभवी लोगों को तरजीह देंगे या अपने प्रति निष्ठा रखने वाले ऐसे युवाओं को आगे करेंगे, जिनमें अनुभव की कमी है? गौरतलब है कि राहुल गांधी ने पिछले कुछ सालों में जो नियुक्तियां की हैं उनमें अराजनीतिक और कम अनुभव वाले लोगों को ज्यादा महत्व दिया है। राहुल के करीबियों का कहना है कि पार्टी में नई लीडरशिप पैदा करने के लिए ऐसा जरूरी है। लेकिन समस्या यह है कि ऐसे नेताओं के साथ प्रदेश कमेटी का तालमेल नहीं बैठता है या फिर सहयोगी दलों के साथ किसी न किसी तरह का विवाद हो जाता है। ऐसा न भी हो तो ये नेता अपने कामकाज से कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं।
जैसे बिहार में राहुल ने अपने करीबी कृष्णा अल्लावरू को राज्य का प्रभारी बनाया। लेकिन वे पिछले साल के चुनाव में बुरी तरह फेल हुए। वे प्रदेश के नेताओं को साथ लेकर नहीं चल सके, गुटबाजी नहीं रोक सके, राजद के साथ सीट बंटवारा नहीं करा सके उसके लिए अशोक गहलोत को जाना पड़ा और सीट बंटवारे में पैसे के लेन देन के आरोप लगे और अंततः पार्टी बुरी तरह से हारी। उसके बाद पिछले आठ महीने में वे सिर्फ एक बार बिहार गए हैं। ऐसे ही राहुल ने झारखंड में के राजू को प्रभारी बनाया। उनका प्रदेश की राजनीति में कोई मतलब नहीं बन पाया है। राहुल ने केशव महतो कमलेश को झारखंड का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। लेकिन वे कोई असर नहीं छोड़ पा रहे हैं। अपनी करीब मीनाक्षी नटराजन को राहुल गांधी ने तेलंगाना का प्रभारी बनाया है। हर्षवर्धन सपकाल को उन्होंने महाराष्ट्र का प्रदेश अध्यक्ष बनाया तो सबको हैरानी हुई। तभी यह सवाल पूछा जा रहा है कि वे ऐसे लोगों को नियुक्त करेंगे या कुछ अनुभवी नेताओं को भी मौका देंगे?
