कांग्रेस इकोसिस्टम के बहुत सारे लोग अब भी मान रहे हैं कि कॉकरोच जनता पार्टी को भाजपा ने खड़ा कराया है। उनका कहना है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां छात्रों की नाराजगी का लाभ न उठा सकें इसके लिए भाजपा ने योजना के तहत सीजेपी का गठन कराया। पता नहीं इस बात में कितनी सचाई है क्योंकि आजकल हर घटना के पीछे साजिश थ्योरी जरूर बताई जाती है। इसके बावजूद इसमें कोई संदेह नहीं है कि सरकार सीजेपी पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान रही है। सोमवार, 20 जुलाई को प्रदर्शन पर हुई कार्रवाई पर मत जाइए। वह कार्रवाई सीजेपी के लोगों पर नहीं थी। सीजेपी के लोग तो आराम से बैठे रहे। वह कार्रवाई अपनी प्रेरणा से छात्रों के मुद्दे का समर्थन करने पहुंचे लोगों पर थी, जिनमें भीम आर्मी के लोग थे तो जामिया, जेएनयू और डीयू के छात्र भी थे।
वास्तविकता यह है कि जिस दिन से आंदोलन शुरू हुआ है उस दिन से सरकार की मेहरबानी सीजेपी पर है। जैसे दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर पर पहले प्रदर्शन की अनुमति 15 मिनट के अंदर दी थी और वह भी तब जबकि पहले से इसका कोई आवेदन नहीं किया गया था। सीजेपी ने छह जून को प्रदर्शन का ऐलान कर दिया लेकिन अनुमति नहीं ली। छह जून की सुबह अमेरिका की फ्लाइट से अभिजीत दिपके दिल्ली हवाईअड्डे पर उतरे और वहीं उनसे आवेदन लिया गया और वही मंजूरी दे दी गई थी। कई लोगों को लग रहा था कि उनको गिरफ्तार किया जाएगा, उलटे उनको हाथों हाथ मंजूरी दी गई। उन्हें दूसरी बार भी इसी तरह मंजूरी दी गई। वे छह जून के प्रदर्शन के बाद अपने राज्य महाराष्ट्र चले गए। लेकिन फिर उन्होंने जब जंतर मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति मांगी उन्हें मिल गई औऱ 28 जून से वहां सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठ गए। इतना ही नहीं 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान सीजेपी का मंच टूट गया और पुलिस ने वहां से सब कुछ हटा दिया। लेकिन उसी रात नौ बजे के बाद पुलिस वाले वहां खड़े रहे और सीजेपी का मंच फिर से बनवाया। मौजूदा स्थिति में यह सब सामान्य नहीं दिख रहा है।
