महाराष्ट्र में नगर निकाय चुनावों के बाद यह सबसे बड़ा सवाल है कि अब ब्रांड ठाकरे और पवार का क्या होगा? इस बार दोनों ने परिवार का ब्रांड बचाने के लिए कई उपाय किए थे। इनमें एक उपाय यह भी था कि अहंकार छोड़ कर दोनों परिवार एक हुए थे। ठाकरे बंधु 20 साल के बाद साथ आए थे तो पवार चाचा भतीजे ने भी हाथ मिलाया था। उद्धव और राज ठाकरे को मुंबई का किला बचाना था तो पवार चाचा भतीजे को पुणे, पिंपरी चिंचवाड़ और परभणी में परिवार का पुराना गढ़ वापस हासिल करना था। दोनों परिवारों को भाजपा के बढ़ते असर को चेक करना था और अपना वर्चस्व या तो बचाए रखना था या वापस हासिल करना था। लेकिन दोनों को कामयाबी नहीं मिली। महाराष्ट्र के 29 शहरी निकायों के चुनाव में ठाकरे और पवार परिवार को सिर्फ सांत्वना हासिल हुई है।
अब सवाल है कि आगे क्या होगा? क्या आगे भी ठाकरे परिवार एक साथ रहेगा, उद्धव ल राज ठाकरे मिल कर राजनीति करेंगे और दोनों की पार्टियों का विलय होगा? यही सवाल पवार परिवार के लिए है कि क्या चाचा और भतीजे की पार्टी का विलय हो जाएगा? पवार परिवार से जुड़ा सवाल यह भी है कि अगर विलय होता है तो फिर एक होने के बाद एनसीपी का स्थान कहां होगा? यह सवाल इसलिए है क्योंकि अजित पवार एनडीए में हैं तो शरद पवार अभी कांग्रेस गठबंधन में हैं। हालांकि नगर निकाय चुनावों में सारे गठबंधन टूट गए थे। फिर भी चुनाव खत्म होने के बाद पार्टियों को अपने राजनीतिक भविष्य के हिसाब से चुनना होगा कि वे किस तरफ रहेंगी। महाराष्ट्र में लगातार तीन चुनाव जीत कर भाजपा ने साबित किया है कि वह अब पूरे प्रदेश की पार्टी है और इस बार के स्थानीय चुनाव में उसके साथ साथ एकनाथ शिंदे की पार्टी को जो कामयाबी मिली है उसका एक मैसेज यह भी है कि भाजपा के साथ रहने पर कामयाबी और सत्ता की गारंटी है, जिसके पीछे महाराष्ट्र और खास कर मुंबई के नेता सबसे ज्यादा भागते हैं। सबको अपने धन का स्रोत बचाने की सबसे पहले चिंता रहती है।
बहरहाल, ठाकरे परिवार की आगे की राजनीति इस बात से तय होगी कि उद्धव और राज ठाकरे अपने जीते हुए पार्षदों को एकजुट रख पाते हैं या नहीं। मुंबई में बीएमसी का बजट 74 हजार करोड़ रुपए का होता है और पार्षद इसके जरिए अपनी और पार्टी की गाड़ी चलाए रखते हैं। भाजपा ऐसी उदार पार्टी नहीं है कि वह एक बार अपना मेयर बनाने के बाद पूरी मुंबई को अपना माने और उद्धव के पार्षदों को भी पर्याप्त फंड दे। वह इसका इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए कर सकती है। अगर विचारधारा के आधार पर उद्धव अपने पार्षदों को बचाए रखते हैं और उनके सांसद, विघायक उनके साथ रहते हैं तो वे अगली लड़ाई के लिए सर्वाइव कर जाएंगे। इसके लिए उनको नए सिरे से अलायंस पर विचार करना होगा। जहां तक पवार परिवार का मामला है तो उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंचे शरद पवार को फैसला करना है कि वे अपना उत्तराधिकार भतीजे अजित पवार को सौंप कर रिटायर होते हैं या नहीं। अजित पवार निश्चित रूप से भाजपा के साथ बने रहना चाहेंगे। भाजपा की जीत से उनको भी संदेश मिल गया है। मार्च में राज्यसभा चुनाव तक पवार परिवार की राजनीति स्पष्ट हो जाएगी।
