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चुनावी याचिकाओं से कुछ भी हासिल नहीं होगा

New Delhi, May 22 (ANI): A view of the Supreme Court of India, in New Delhi on Thursday. (ANI Photo/Rahul Singh)

सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को नई याचिकाएं दायर करने की अनुमति दे दी है। ममता की पार्टी के सांसद और वकील कल्याण बनर्जी ने अदालत को बताया कि पश्चिम बंगाल में 31 सीटें ऐसी हैं, जहां जीत और हार का अंतर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया में काटे गए वोट से कम है। संख्या को लेकर थोड़ा कंफ्यूजन अभी तक बना हुआ है। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कुल 49 सीटों पर एसआईआर में काटे गए वोट से कम अंतर से नतीजा आय़ा है। इसमें से 26 सीटें भाजपा ने जीती हैं, 21 सीटें तृणमूल कांग्रेस के खाते में गई हैं और दो सीटें कांग्रेस को मिली हैं। बहरहाल, सीटों की संख्या कितनी भी हो, जब बात सुप्रीम कोर्ट की हो रही है तो फैसला सैद्धांतिक मुद्दों पर होगा। तभी सवाल है कि क्या किसी सीट पर इस आधार पर नतीजा बदल सकता है या दोबारा चुनाव कराया जा सकता है कि वहां जीत या हार का अंतर एसआईआर में काटे गए वोट से कम है? अदालत को पहले इस पर फैसला करना होगा।

ध्यान रहे इस तरह की बात बिहार विधानसभा चुनाव के समय भी उठी थी। वहां भी कई उम्मीदवारों ने नतीजों को चुनौती देने की घोषणा की थी। उनका कहना था कि उनकी सीट पर जितना वोट कटा है उससे कम वोट से वे हारे हैं। ऐसे तमाम नेता राष्ट्रीय जनता दल या कांग्रेस के थे। लेकिन ऐसी कोई खबर नहीं आई है कि बड़ी संख्या में हारे हुए उम्मीदवारों ने इस बात को चुनौती दी। इसका कारण यह है कि ऐसे मामलों में एक तो फैसला आने में बहुत समय लगता है और कई बार तो चुनाव याचिकाओं का निपटारा होने में ही विधानसभा या लोकसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाता है। दूसरी बात यह है कि एसआईआर में नाम कटने के आधार पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। कोई यह दावा नहीं कर सकता है कि जिन लोगों के नाम कटे हैं वो सारे लोग उसके ही वोटर थे।

वैसे भी पिछले कुछ दिनों से मीडिया के जरिए यह नैरेटिव बना दिया गया है कि पश्चिम बंगाल में जिन सीटों पर सबसे ज्यादा नाम कटे हैं वैसी पांच सीटों में से चार पर तृणमूल कांग्रेस ही जीती है और एक सीट कांग्रेस के खाते में गई है। हालांकि इसकी अलग व्याख्या है। जिन सीटों पर सबसे ज्यादा नाम कटे वहां ज्यादातर सीटों पर मुस्लिम आबादी 60 फीसदी से ज्यादा थी। इसलिए नाम कटने के बाद भी तृणमूल या कांग्रेस का जीतना कोई बड़ी बात नहीं है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल में सुनवाई के दौरान कहा था कि अगर अंतर दो फीसदी का है और 15 फीसदी नाम कटे हैं तो अदालत इसको देखेगी। अच्छी बात है। लेकिन देखने से क्या पता चलेगा? जो जीता है वह भी तो दावा कर सकता है कि जो वोट कहा है वह उसका है और अगर वोट नहीं कटा होता तो वह ज्यादा अतंर से जीतता?

यह एक सब्जेक्टिव मामला है। जिन लोगों के नाम कटे हैं अगर उनका अस्तित्व है भी तो आप उन सभी लोगों को सामने खडा कर रायशुमारी नहीं करा सकते हैं कि अगर उनको वोट देने का मौका मिलता तो वे किसको वोट देते। दूसरे यह धारणा बना दी गई है कि जहां सबसे ज्यादा नाम कटे वहां भी तृणमूल जीती है। इसका अर्थ है कि नाम कटने का नतीजों पर कोई असर नहीं है। अगर कोई असर है भी तो कोई पक्के तौर पर नहीं बता सकता है कि क्या असर है। अगर तृणमूल कांग्रेस कहेगी की नाम कटने से उसे घाटा हुआ तो भाजपा भी यही तर्क देगी। इसलिए अदालत की कार्रवाई अकादमिक चर्चा के लिए ठीक है। उससे ममता बनर्जी को हासिल कुछ नहीं होगा।

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