उप राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन शुरू होने से पहले उम्मीदवारों के नाम की चर्चा शुरू हो गई है। सत्तापक्ष की ओर से यानी एनडीए की ओर से कौन उम्मीदवार होगा, इसे लेकर ज्यादा अटकल नहीं है क्योंकि ज्यादातर लोग मान रहे हैं कि फैसला दो लोगों को करना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री जिसे चाहेंगे वह उम्मीदवार बनेगा। वह भाजपा का नेता होगा या किसी सहयोगी पार्टी का नेता होगा और किसी चुनावी राज्य का व्यक्ति होगा या कहीं अन्य का यह फैसला उन दो लोगों को करना है। उसमें किसी तीसरे व्यक्ति की भूमिका नहीं होगी। यह एकदम बिना मतलब की बात है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की ओर से नाम बताया जाएगा और अगर बात नहीं मानी गई तो संघ के करीबी सांसद लोग क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं। यह सोशल मीडिया के उस इकोसिस्टम का प्रचार है, जो सारे दिन मोदी और संघ का झगड़ा कराता रहता है।
सो, भले एनडीए में ज्यादा कसरत की जरुरत नहीं पड़ेगी, लेकिन विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में बहुत ज्यादा कवायद की जरुरत होगी। विपक्षी गठबंधन की पार्टी में सहमति बनाने के लिए बड़े प्रयास करने होंगे। जानकार सूत्रों का कहना है कि इस सिलसिले में शुरुआती बातचीत हुई है। यह लगभग तय है कि विपक्षी गठबंधन चुनाव लड़ेगा। इसका अर्थ है कि उप राष्ट्रपति का चुनाव निर्विरोध नहीं होने जा रहा है। लेकिन विपक्ष की ओर से कौन उम्मीदवार होगा, यह कई संभावनाओं पर निर्भर करता है। जानकार सूत्रों का कहना है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रख कर विपक्ष अपना प्रत्याशी तय करेगा। अगर इस पर सहमति बन जाती है तो उसके बात तय करना होगा कि प्रत्याशी किस पार्टी का होगा और पार्टी का होगा या कोई अराजनीतिक व्यक्ति होगा, जैसा एक बार विपक्ष ने गोपाल गांधी को उम्मीदवार बनाया था।
बताया जा रहा है कि कांग्रेस चाह रही है कि उसके किसी नेता को चुनाव लड़ाया जाए। इससे पहले के दो चुनावों में कांग्रेस ने अपनी शक्ति नहीं दिखाई थी या विपक्षी पार्टियों के सामने अपने उम्मीदवार के लिए दबाव नहीं बनाया क्योंकि तब कांग्रेस बहुत कमजोर थी। पहले उसके पास लोकसभा में सिर्फ 44 और दूसरी बार 52 सांसद थे। लेकिन इस बार लोकसभा में कांग्रेस मजबूत हुई है और उसके एक सौ सांसद हैं। इसलिए वह विपक्षी गठबंधन की धुरी है। तभी कहा जा रहा है कि कांग्रेस का कोई नेता प्रत्याशी हो सकता है। हालांकि ममता बनर्जी की ओर से इस बात का दवाब रहेगा कि पूर्वी भारत से, खास कर पश्चिम बंगाल से ही किसी को नेता बनाया जाए। कोई बांग्लाभाषी प्रत्याशी होगा तो उसका असर पश्चिम बंगाल और असम दोनों जगह होगा। एक दूसरी थ्योरी यह है कि कांग्रेस चूंकि दक्षिण भारत के दो राज्यों में ही सरकार में है और अगले साल तमिलनाडु व केरल का चुनाव होना है तो दक्षिण भारत के किसी नेता को प्रत्याशी बनाने की बात हो सकती है। अगर दक्षिण भारत का प्रत्याशी होगा तो भाजपा के सहयोगी चंद्रबाबू नायडू के लिए भी उसका विरोध करना मुश्किल हो जाएगा। बहरहाल, कहा जा रहा है कि उप राष्ट्रपति के उम्मीदवार का फैसला अभी तुरंत नहीं होगा। विपक्षी पार्टियां इंतजार करेंगी और एनडीए की ओर से उम्मीदवार तय होने के बाद अपना प्रत्याशी तय करेंगी। नामांकन भले सात अगस्त को शुरू हो जाएगा लेकिन दोनों के प्रत्याशियों की घोषणा 15 अगस्त के बाद ही होगी।
