यह सही है कि बिहार में कांग्रेस के सिर्फ छह विधायक हैं। लेकिन उन छह विधायकों का भी एक नेता तो होना चाहिए। 403 सदस्यों वाले उत्तर प्रदेश में तो कांग्रेस के सिर्फ दो विधायक हैं। फिर भी उन दो विधायकों की नेता अराधना मिश्र मोना चुनी गई हैं। ऐसे ही छह विधायकों का नेता चुना जाना चाहिए। लेकिन चुनाव के तीन महीने बीत जाने के बाद भी कांग्रेस ने नेता नहीं चुना है। पिछले दिनों कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने सभी छह विधायकों को बुलाया था। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने उनके साथ मीटिंग की। कहा गया कि पटना लौट कर नेता चुना जाएगा लेकिन 10 दिन बाद भी वहीं स्थिति है और बिहार में विधानसभा का बजट सत्र चल रहा है।
असल में कांग्रेस ने जिन नेताओं पर दांव लगाया उनमें से कोई चुनाव नहीं जीता है। पिछली बार शकील अहमद खान विधायक दल के नेता थे। लेकिन इस बार वे हार गए हैं। प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम भी चुनाव हारे हैं। विजय शंकर दुबे जैसे बड़े नेता की टिकट काट दी गई थी। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा विधान परिषद में हैं। इसलिए कांग्रेस के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है। जो छह विधायक जीते हैं उनमें से दो मुस्लिम हैं। कांग्रेस के दो विधायक उत्तर बिहार की वाल्मिकी नगर और चनपटिया सीट से जीते हैं, जबकि तीन सीमांचल के हैं। एक विधायक मनिहारी सीट से जीते हैं। कांग्रेस को जातीय और क्षेत्रीय दोनों संतुलन भी बनाना है। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी अभी देख रही है कि उसके विधायक कितने दिन तक साथ रहते हैं। माना जा रहा है कि अप्रैल में होने वाली राज्यसभा चुनाव तक कुछ टूट फूट हो सकती है।
