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यूपी में परिषद चुनाव का क्या संदेश है?

उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की शिक्षक व स्नातक क्षेत्र की पांच सीटों पर चुनाव हुए थे, जिनमें से चार पर भाजपा जीत गई है। समाजवादी पार्टी को हर सीट पर बड़ी हार का सामना करना पड़ा है। एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं और वे दशकों से लगातार जीत रहे हैं। ध्यान रहे उत्तर प्रदेश में इस समय समाजवादी पार्टी अपने स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं के सहारे अगड़ा बनाम पिछड़ा की लड़ाई बनाने के प्रयास में है। इसके लिए मौर्य जैसे नेता रामचरित मानस का विरोध कर रहे हैं। ओबीसी मोर्चा के लोग रामचरित मानस के पन्ने फाड़ कर जला रहे हैं। ऐसे ध्रुवीकरण के समय में यह चुनाव हुआ था, जिसमें सपा को बड़ा झटका लगा।

तभी सवाल है कि क्या यह सपा के लिए संदेश है कि वह इस तरह से हिंदू समाज को बांटने का प्रयास बंद करे? भाजपा के नेता नतीजों की ऐसी ही व्याख्या कर रहे हैं। उनका कहना है कि रामचरित मानस के अपमान की वजह से हिंदू समाज और एकजुट हुआ है। इसी लाइन पर बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने बयान दिया है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी के नेता यह काम भाजपा के कहने से कर रहे हैं ताकि समाज का ध्रुवीकरण हो सके। विधान परिषद की पांच सीटों के नतीजे इस मायने में दिलचस्प हैं कि तुलसीदास की आलोचना के माहौल में भी पांच में से दो ब्राह्मण जीते हैं। कानपुर-उन्नाव से अरुण पाठक और इलाहाबा-झांसी से बाबूलाल तिवारी जीते हैं। बाकी तीन सीटों पर निर्दलीय राज बहादुर चंदेल और भाजपा के जयपाल सिंह व्यस्त और देवेंद्र प्रताप सिंह की जीत भी समाजवादी पार्टी के लिए बड़ा संकेत है। हालांकि ऐसा लगता नहीं है कि पार्टी के नेता अभी जाति की राजनीति से पीछे हटेंगे।

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