स्पष्ट अर्थ है कि जब तक इन सभी 52 लाख मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच नहीं हो जाती है और उनमें से पात्र मतदाताओं के नाम पूरक मतदाता सूची में नहीं शामिल किया जाता है तब तक चुनाव नहीं होगा। तभी प्रश्न है कि क्या चुनाव से पहले इन सभी मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच हो जाएगी? यह सवाल इसलिए है क्योंकि मतदाता सूची में नाम जोड़ने की एक निर्धारित प्रक्रिया और तय समय सीमा होती है।
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा होने वाली है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अध्यक्षता में चुनाव आयोग की फुल बेंच ने उन सभी पांच राज्यों का दौरा कर लिया है, जहां अगले महीने विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इस सप्ताह की शुरुआत में चुनाव आयोग की फुल बेंच ने कोलकाता का दौरा किया, जहां सभी राजनीतिक दलों के साथ साथ पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों के साथ बैठक हुई और चुनाव तैयारियों की समीक्षा की गई। दो दिन की बैठकों के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो बातें कहीं उसमें कुछ बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की बात तो कही ही साथ मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर कहा, ‘किसी भी योग्य मतदाता का नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जाएगा। हर पात्र मतदाता को मतदान का अधिकार होगा।‘ इसके आगे उन्होंने कहा, ‘मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एक भी अपात्र मतदाता का नाम सूची में नहीं रहे’।
ये दोनों बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं और शब्दों से ज्यादा इनके अर्थ को पढ़ने की आवश्यकता है। जब इनके अर्थों को सर्वोच्च न्यायालय में मंगलवार, 10 मार्च को हुई सुनवाई के साथ मिला कर पढ़ेंगे तो तस्वीर और स्पष्ट होगी। सर्वोच्च न्यायालय को बताया गया कि 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद जिन 60 लाख मतदाताओं के नाम विचाराधीन श्रेणी में रखे गए थे उनमें से 8 लाख लोगों के दस्तावेजों की जांच हो गई है। यानी 10 मार्च तक 52 लाख नामों की जांच नहीं हुई थी। एक तरफ मुख्य चुनाव आयुक्त कह रहे हैं कि एक भी पात्र मतदाता का नाम मतदाता सूची से नहीं हटेगा और किसी भी अपात्र का नाम सूची में नहीं रहेगा तो दूसरी ओर 52 लाख विचाराधीन मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच चल रही है।
इसका स्पष्ट अर्थ है कि जब तक इन सभी 52 लाख मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच नहीं हो जाती है और उनमें से पात्र मतदाताओं के नाम पूरक मतदाता सूची में नहीं शामिल किया जाता है तब तक चुनाव नहीं होगा। तभी प्रश्न है कि क्या चुनाव से पहले इन सभी मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच हो जाएगी? यह सवाल इसलिए है क्योंकि मतदाता सूची में नाम जोड़ने की एक निर्धारित प्रक्रिया और तय समय सीमा होती है। चुनाव के नियमों के मुताबिक जिस दिन अधिसूचना जारी होती है और नामांकन शुरू होता है उस दिन मतदाता सूची को फ्रीज कर दिया जाता है। यानी उसी दिन तक नाम जोड़ने का आवेदन लिया जाता है। उसके बाद चुनाव आयोग को दूसरे बहुत सारे काम करने होते हैं। मतदाता सूची तैयार की जाती है, मतदाताओं तक परची पहुंचाई जाती है, नामांकन कराना होता है, नामांकन पत्रों की जांच होती है, ईवीएम में उम्मीदवारों के नाम और चुनाव चिन्ह भरने होते हैं, मतदान के लिए अधिकारी और कर्मचारी नियुक्त किए जाते हैं, सुरक्षा बलों की तैनाती होती है, मतदानकर्मियों का प्रशिक्षण होता है, उनको मतदान केंद्र तक पहुंचाने की व्यवस्था होती है और इसके साथ ही मतगणना की तैयारी भी होती है। मतदाता सूची तैयार करना चुनाव प्रक्रिया का एक हिस्सा है। चुनाव आयोग मतदान के दिन तक वही काम नहीं करता रह सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के मुताबिक सात सौ के करीब न्यायिक अधिकारी विचाराधीन श्रेणी के मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच की निगरानी कर रहे हैं। परंतु अगर चुनाव की अधिसूचना जारी होने तक यह जांच पूरी नहीं हुई तो क्या होगा? ध्यान रहे अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद 10 दिनों में 8 लाख मतदाताओं की जांच हुई थी। इसका अर्थ है कि एक दिन में 80 हजार नामों की जांच हुई। इस लिहाज से 52 लाख मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच के लिए 65 दिन की आवश्यकता होगी, जबकि चुनाव की प्रक्रिया अप्रैल के अंत तक पूरी की जानी है। पिछले चुनाव में 29 अप्रैल को आखिरी चरण का मतदान हुआ था और 2 मई को वोटों की गिनती हुई थी। पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल 7 मई तक है। अभी तक जिस गति से विचाराधीन मतदाताओं की जांच हुई है उससे तो नहीं लग रहा है कि अप्रैल के अंत तक भी सभी मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच हो पाएगी। अगर जन प्रतिनिधित्व कानून में कोई बदलाव नहीं हुआ या नियम में कोई अपवाद नहीं बनाया गया तो अधिसूचना जारी होने के दिन ही मतदाता सूची फ्रीज करनी पड़ेगी। तब तक तो किसी हाल में सभी विचाराधीन मतदाताओं की जांच नहीं हो पाएगी।
तभी यह प्रश्न है कि क्या पश्चिम बंगाल का चुनाव समय से नहीं हो पाएगा? क्या चुनाव की घोषणा के बाद भी मतदान टल सकता है? चुनाव की घोषणा के बाद मतदान टलना कोई अनहोनी बात नहीं है। 1995 में बिहार विधानसभा चुनाव के समय स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए तत्कालीन चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने तीन बार मतदान की तारीख बढ़ाई थी। परंतु पश्चिम बंगाल में समस्या यह है कि विधानसभा का कार्यकाल सात मई को समाप्त हो रहा है। अगर उस दिन तक मतदान की प्रक्रिया पूरी नहीं होती है तो राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ सकता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को इसकी चिंता सता रही है। तभी उन्होंने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के खिलाफ पांच दिन के धरने के दौरान इसकी आशंका जताई थी। नए राज्यपाल रविंद्र नारायण राय की घोषणा के बाद उन्होंने सवालिया लहजे में कहा था कि क्या केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाना चाहती है? इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अगर राष्ट्रपति शासन लगा तो उनके लिए अच्छा होगा क्योंकि वे सड़क पर उतर कर संघर्ष करेंगी।
हालांकि सबको पता है कि अगर चुनाव टला और राष्ट्रपति शासन में मतदान की स्थिति बनी तो तृणमूल कांग्रेस अपना बहुत बड़ा एडवांटेज गंवा देगी। अभी उसके पास पुलिस और प्रशासन की ताकत का एडवांटेज है, जिसके दम पर पार्टी के कार्यकर्ता और नेता आम मतदाताओं को खौफ में रखते हैं, उनके मतदान व्यवहार को प्रभावित करते हैं या मतदान से रोकते हैं। बड़ी संख्या में घोस्ट मतदाताओं के वोट डलवाए जाते हैं। यह राष्ट्रपति शासन में नहीं हो पाएगा। दूसरी ओर राष्ट्रपति शासन से भाजपा के समर्थक मतदाताओं की हिम्मत लौटेगी। पिछले चुनाव के नतीजों के बाद जिस प्रकार की हिंसा हुई थी उससे भाजपा समर्थकों की हिम्मत टूटी है। इस चुनाव में भी अभी तक उनको अपनी सुरक्षा का भरोसा नहीं मिल पा रहा है। सुरक्षा का भरोसा दिलाने के साथ साथ उनको यह उम्मीद बंधनी चाहिए कि इस बार भाजपा चुनाव जीत सकती है। अगर भाजपा यह मैसेज बनवाने में कामयाब हो जाती है कि वह चुनाव जीत रही है तो उसके अपने समर्थक तो ज्यादा हिम्मत के साथ एकजुट होंगे ही, तृणमूल कांग्रेस के कैडर में भी टूट होगी। साथ ही कांग्रेस और वाम मोर्चे की ओर जाने वाले वोट में भी कमी होगी। चुनाव पहले से ज्यादा दोध्रुवीय होगा और लेफ्ट व कांग्रेस को मिलने वाले बांग्लाभाषी हिंदुओं का वोट भाजपा की ओर शिफ्ट करेगा। इससे नतीजा पूरी तरह से बदल सकता है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बंगाल दौरे और भाजपा की सभाओं से भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों में एक जोश बना है। उसे चुनावी जीत में बदलने के लिए भाजपा को अपने समर्थकों को सुरक्षा का भरोसा दिलाना होगा और जीत की उम्मीद बंधानी होगी। एसआईआर के जरिए ऐसे लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर किए गए हैं, जिनकी मृत्यु हो गई है या जिनका अस्तित्व नहीं है या जो स्थायी रूप से कहीं और शिफ्ट कर गए हैं या जिनका नाम एक से ज्यादा जगहों पर दर्ज है। मतदाता सूची के इस शुद्धिकरण अभियान से भी आम लोगों में विश्वास लौटा है और उनको लग रहा है कि स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित होगा। अब चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना है कि विचाराधीन श्रेणी में रखे गए मतदाताओं के दस्तावेजों की व्यापक रूप से जांच होगी और एक भी विदेशी नागरिक का नाम सूची में नहीं रहने दिया जाएगा। इससे आम लोगों का भरोसा और बढ़ेगा, चुनाव की प्रक्रिया स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी बनेगी। समय सीमा की बाध्यता के कारण इस प्रक्रिया से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। चुनाव जब भी हो पूरी तरह से शुद्ध मतदाता सूची से हो। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
