घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें भारत की सीमा से निकालने का काम युद्धस्तर पर चल रहा है। सिर्फ पश्चिम बंगाल में नहीं, बल्कि बिहार से लेकर राजस्थान तक यह अभियान चल रहा है। पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमा जिन राज्यों के साथ मिलती है वहां बाड़ लगाई जा रही है और सीमा की सुरक्षा को मजबूत किया जा रहा है।
बंगाल बदल रहा है। यह सिर्फ कहने की बात नहीं है, बल्कि आंखों के सामने घटित हो रही एक शानदार परिघटना है। पिछले 50 साल में जिस बात की कल्पना नहीं की जा सकती थी वह काम हो रहा है। 107 साल में पहली बार ऐसा हुआ कि ईद उल अजहा यानी बकरीद के अवसर पर कोलकाता की रेड रोड सूनी रही। रेड रोड की बजाय ब्रिगेड परेड ग्राउंड मैदान में नमाज पढ़ी गई। कोलकाता ही नहीं, पश्चिम बंगाल के अन्य शहरों में भी सड़कों पर ट्रैफिक सामान्य रूप से चलता रहा। पहली बार ऐसा हुआ कि कुर्बानी के इस त्योहार पर प्रतिबंधित पशुओं यानी गाय या गोवंश की कुर्बानी नहीं हुई। पहली बार ऐसा हुआ कि बंगाल की सड़कों पर, सोसायटीज में या खुले में कुर्बानी नहीं हुई।
ऐसे ही दशकों बाद सड़कों और रेलवे स्टेशनों पर से अतिक्रमण स्वतः हटा दिए जा रहे हैं, जिसके चलते सड़कें, बजार और स्टेशन साफ सुथरे हो गए हैं। अवैध निर्माण पर बुलडोजर चल रहा है। ये ऐसी बातें हैं, जिनकी कल्पना आम बंगाली नहीं कर सकता था। पिछले 50 साल में जन्मी और बड़ी हुई पीढ़ी को तो अब तक जो हो रहा था वही स्वाभाविक लगता था। लेकिन अब सारी चीजें बदल गई हैं। पहली बार लोग यह भी देख रहे हैं कि हजारों की संख्या में ऐसे लोग, जिनके पास भारत का आधार कार्ड, वोटर आई कार्ड और राशन कार्ड है वे सामान लेकर बांग्लादेश की सीमा पर जमा है और भारत छोड़ कर जा रहे हैं। बांग्लादेशी लोगों के पास भारत के तमाम किस्म के पहचान पत्र होना कितनी गहराई तक जड़ जमा चुकी समानांतर व्यवस्था का संकेत है, इसे समझा जा सकता है।
इसका अर्थ है कि बंगाल हर तरह से बदल रहा है और यह बदलाव इतनी जल्दी हो रहा यह सुखद आश्चर्य की बात है। राज्य में सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में सरकार बने अभी सिर्फ तीन हफ्ते हुए हैं। इतने कम समय में वह परिवर्तन दिखने लगा है, जिसका वादा चुनाव प्रचार के दौरान किया गया था या जिसका संकल्प भाजपा कई दशकों से जाहिर करती रही थी। सबसे सुखद आश्चर्य यह है कि मुस्लिम समाज के लोग इस परिवर्तन को स्वाभाविक रूप से स्वीकार कर रहे हैं। वे इस परिवर्तन के रास्ते में बाधा नहीं बन रहे हैं। वे स्वंय आगे आकर इसका स्वागत कर रहे हैं। ध्यान रहे बकरीद से पहले मुस्लिम समाज के प्रबुद्ध और नामचीन लोगों ने अपने समाज के लोगों से कहा कि वे प्रतिबंधित पशुओं की कुर्बानी न दें और खुले में कुर्बानी न करें। उन्होंने बहुसंख्यक हिंदू समाज के लोगों की आस्था का सम्मान करने की बात कही।
जितने सहज रूप में इस बात को स्वीकार किया वह दिखाता है कि मुस्लिम समाज शांतिपूर्ण, सह अस्तित्व की व्यवस्था स्वीकार करने को तैयार है। पहले अगर ऐसा नहीं होता था तो उसका कारण राजनीतिक था। वोट बैंक की राजनीति के तहत लेफ्ट, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस मुस्लिम जमात के कुछ लोगों को आगे करके तुष्टिकरण की राजनीति करते थे। उनको भड़का करके धार्मिक और सामाजिक बढ़ाया जाता था। इसमें व्यापक रूप से मुस्लिम समाज सम्मिलित नहीं था। यह परेड ग्राउंड में सामूहिक नमाज के बाद दिखा। मुस्लिम समाज के लोगों ने इसका स्वागत किया। उन्होंने कहा कि वे पहले सड़कों पर नमाज पढ़ते थे, आज उनको अपनी जमीन, अपनी मिट्टी से जुड़ कर नमाज पढ़ने की जगह मिल गई है। उन्होंने सुवेंदु अधिकारी का आभार जताया। इस मामले में मुख्यमंत्री ने भी एक बड़ा संदेश दिया। बकरीद के दिन जिस समय कुर्बानी शुरू हुई लगभग उसी समय मुख्यमंत्री मायापुर गौशाला में जाकर गायों की सेवा की। गायों को प्यार से सहलाते हुए और बछड़ों को अपने हाथ से लड्डू खिलाते हुए उनका लाइव वीडियो पूरे प्रदेश ने देखा। इस तरह से उन्होंने एक बड़ा संदेश मुस्लिम समुदाय को दिया कि उनके मन में गोवंश को लेकर क्या भावना है।
असल में बंगाल की पूरी राजनीतिक संस्कृति में भी एक सुखद बदलाव देखने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के बोलने की भाषा, लहजा, उनकी भाव भंगिमा और उनकी राजनीति टकराव वाली नहीं है। ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के विपरीत वे शांति से अपनी बात रख रहे हैं। लोगों से अपील करने के अंदाज में अपनी बात कह रहे हैं। उनके अंदर शांति और सौम्यता के साथ थोड़ी कड़ाई का भाव भी है। उनका आचरण काफी प्रभावशाली, शालीन, अनुभवी और दूरदर्शी नेता का है। समाज के हर तबके में इसकी चर्चा और वाहवाही है। तभी बकरीद के मौके पर जो बदलाव दिखा उसके लिए उनको कहीं भी बल प्रयोग नहीं करना पड़ा। कहीं भी मुस्लिम समाज को धमकी या चेतावनी देने की जरुरत नहीं पड़ी। पुलिस या सेना का फ्लैगमार्च कराने की आवश्यकता नहीं पड़ी। वे ऐसी कार्य संस्कृति विकसित कर रहे हैं, ऐसा राजनीतिक व सामाजिक वातावरण बना रहे हैं, जिसमें लोग स्वाभाविक रूप से उनकी अपील स्वीकार कर रहे हैं। वे अपनी लोकप्रियता, लंबे राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक क्षमता का इस्तेमाल बंगाल में लंबे समय से चली आ रही कटुता वाली संस्कृति को समाप्त करने के लिए कर रहे हैं। हालांकि सीमा पार से कुछ उकसावे वाली घटनाएं हो रही हैं। पूर्व क्रिकेटर शाहिद अफरीदी ने सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल कराया, जिसमें वह एक विशाल आकार के बैल की बलि देने की तैयारी कर रहा है। इस गोवंश को भगवान शिव के वाहन नंदी की तरह बता कर प्रचारित किया गया। सीमा पार से इस तरह की उकसावे वाली घटनाओं के वीडिया वायरल कराए जाते रहे हैं। अच्छा है कि बंगाल और देश के लोग उनके प्रोपेगेंडा में नहीं फंस रहे हैं।
बहरहाल, सांस्कृतिक, धार्मिक व वैचारिक विषयों से अलग राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर सुवेंदु सरकार सख्ती दिखा रही है और केंद्र सरकार की ओर से भी इस मामले में बहुत सख्त रुख अपनाया जा रहा है। घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें भारत की सीमा से निकालने का काम युद्धस्तर पर चल रहा है। सिर्फ पश्चिम बंगाल में नहीं, बल्कि बिहार से लेकर राजस्थान तक यह अभियान चल रहा है। पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमा जिन राज्यों के साथ मिलती है वहां बाड़ लगाई जा रही है और सीमा की सुरक्षा को मजबूत किया जा रहा है। इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि जो घुसपैठिए अपने आप भारत छोड़ कर चले जाएंगे उनके खिलाफ सरकार कोई कानूनी कार्रवाई नहीं करेगी, बल्कि उनको तमाम सुविधाएं दी जाएंगी ताकि वे आसानी से देश छोड़ कर जा सकें। लेकिन जो ऐसा नहीं करते हैं उनके साथ सरकार सख्ती करेगी। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने राज्य की पुलिस और प्रशासन को निर्देश दिया है कि गैर भारतीयों की पहचान करके उन्हें कानूनी प्रक्रिया में नहीं डालना है, सीधे सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ को सौंप देना है।
असल में बंगाल में जो हो रहा है वह व्यापक रूप से पूरे देश की सीमा सुरक्षा करने और देश को सुरक्षित रखने के अभियान का ही हिस्सा है। इस दिशा में एक के बाद एक कई कदम उठाए गए हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार में सीमांचल के इलाके में पिछले दिनों चार दिन का समय लगाया और अधिकारियों के साथ घुसपैठ व आबादी की बदलती संरचना के पैटर्न का अध्ययन किया। इससे भी पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल लाल किले से अपने संबोधन में कहा था कि सरकार बदलती हुई जनसंख्या संरचना का अध्ययन करने के लिए एक कमेटी का गठन करेगी। केंद्रीय गृह मंत्री ने उस कमेटी के गठन का ऐलान कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर इसकी अध्यक्षता करेंगे। यह कमेटी उन क्षेत्रों का खासतौर से अध्ययन करेगी, जहां कृत्रिम तरीके से जनसंख्या संरचना बदली है। ऐसे इलाकों में पश्चिम बंगाल के कई क्षेत्र हैं, जो बांग्लादेश से सटे हैं। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तरी दिनाजपुर आदि इलाकों में मुस्लिम आबादी में 12 से 13 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। यह स्थिति तब है, जब पश्चिम बंगाल में प्रजनन दर दो फीसदी से कम है। यानी 2.1 फीसदी के रिप्लेसमेंट रेट से भी कम प्रजनन दर है। फिर भी कुछ इलाकों में जनसंख्या बढ़ने की दर 10 फीसदी से ऊपर है। बिहार के सीमांचल में 15 फीसदी से ज्यादा दर से मुस्लिम आबादी बढ़ी है। जाहिर है यह कृत्रिम बदलाव है, जिसे रोकना बहुत जरूरी है।
कृत्रिम तरीके से जनसंख्या संरचना में बदलाव कई कारणों से नुकसानदेह है। इससे सामाजिक व सांस्कृतिक बदलाव हो रहा है। व्यापक रूप से हिंदू धर्म व संस्कृति के लिए खतरा पैदा हो रहा है। इसके अलावा सरकार के ऊपर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है क्योंकि लोक कल्याण की योजनाओं के लाभार्थी ऐसे लोग बन जा रहे हैं, जो इस देश के नागरिक नहीं हैं। तीसरा और बड़ा खतरा राष्ट्रीय सुरक्षा को है। इन बातों का ध्यान रखते हुए देश भर में सीमा सुरक्षा को पुख्ता किया जा रहा है और घुसपैठियों को पहचान करके उनको निकाला जा रहा है। सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बंगाल इसमें अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
(लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
