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अमृतकाल के रंगरेज़ और चुनावों के खरगोश

बीजगणित तो कहता है कि असम में इस बार भाजपा कोई सरपट नहीं दौड़ रही है। कांग्रेस से उस का मुकाबला बराबर की टक्कर का है। हिमंत बिस्वा सरमा की लोकप्रियता-लकीर इस बीच इसलिए बहुत तेज़ी से नीचे लुढ़की है कि चुनाव अभियान के दौरान उन की हताशाजनित अहंकारी ज़ुमलेबाज़ी को लोगों ने आमतौर पर नापसंद किया है।

असम, केरल और पुडुचेरी की कुल 296 विधानसभा सीटों के लिए बृहस्पतिवार को हुए मतदान की कुछ नकारात्मक-सकारात्मक उपलब्धियों का ज़िक्र इसलिए ज़रूरी है कि हमारे देश के निर्वाचन-मौसम ने पिछले एक दशक में एक ही पल में माशा से तोला हो जाने की तासीर अपना ली है। इन तीन राज्यों की विधानसभाओं के लिए हुए चुनाव प्रचार में निषेधात्मक भाषा के इस्तेमाल की विलक्षण मिसालें देखने को मिलीं। ख़ासकर असम में। वहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अपनी ज़ुबान से तो विपक्ष के लिए जो कहा सो कहा ही, अपनी असंस्कृत देह-भंगिमाओं के प्रदर्शन से सार्वजनिक जीवन में भोंडेपन की तमाम हदें पार कर दीं।

लेकिन बावजूद इस के सियासत के रहनुमाओं ने अपने भीतर की कुत्सितता को बाहर लाने से कोई गुरेज़ नहीं किया, इन तीनों प्रदेशों के मतदाताओं ने अपनी कर्तव्यबद्धता का बेहद सकारात्मक उदाहरण पेश किया। वे भरभरा कर मतदान केंद्रों तक पहुंचे और जम कर रायशुमारी में शिरकत की। महिलाओं ने इस मामले में पुरुषों को काफी पीछे छोड़ा और आज़ादी के बाद सब से ज़्यादा मतदान का कीर्तिमान बना। जम्हूरियत के गहरे क्षरण के इस दौर में इस दीये की टिमटिमाहट ने आगत के आसार उजले किए हैं।

असम, केरल और पुडुचेरी के चुनाव नतीजों के संकेत मतदान के बाद तक़रीबन साफ हो गए हैं। असम की 126 सीटों में से 9 अनुसूचित जातियों और 19 अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। वहां के ढाई करोड़ मतदाताओं में महिलाओं और पुरुषों की तादाद करीब बराबर-बराबर है। 2021 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी असम में 60 सीटें जीती थी। उसे सवा 33 प्रतिषत वोट मिला था। कांग्रेस 29 सीटें जीती थी और उसे पौने 30 प्रतिषत वोट मिला था। एआईयूडीएफ 16 सीटें जीती थी। उसे सवा 9 प्रतिषत वोट मिला था।

जब 2024 के लोकसभा चुनाव हुए तो असम में भाजपा को 75 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली। यानी उस की स्थिति में सुधार हुआ और वह पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले 15 अतिरिक्त सीटें जीत सकने की पायदान पर खड़ी नज़र आने लगी। लोकसभा के चुनाव में भाजपा को असम में 40 प्रतिशत वोट मिले। यानी उस के वोट प्रतिशत में भी पौने 7 अंक का इज़ाफ़ा हुआ। मगर पिछले विधानसभा चुनाव से लोकसभा चुनाव तक के बीच कांग्रेस का वोट प्रतिशत भाजपा से ज़्यादा बढ़ा है। उस के प्रतिशत में 10 अंक की बढ़ोतरी हुई है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 40 प्रतिशत वोट मिले। उसे 31 सीटों पर बढ़त मिली। पहले से 2 ज़्यादा।

तो यह बीजगणित तो कहता है कि असम में इस बार भाजपा कोई सरपट नहीं दौड़ रही है। कांग्रेस से उस का मुकाबला बराबर की टक्कर का है। हिमंत बिस्वा सरमा की लोकप्रियता-लकीर इस बीच इसलिए बहुत तेज़ी से नीचे लुढ़की है कि चुनाव अभियान के दौरान उन की हताशाजनित अहंकारी ज़ुमलेबाज़ी को लोगों ने आमतौर पर नापसंद किया है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व को भी उन के रवैए ने असहज किया है। इसलिए मुझे लगता है कि अगर किसी न किसी तरह भाजपा की सरकार असम में बन भी गई तो वहां मुख्यमंत्री का चेहरा बदल जाएगा।

केरल की 140 सीटों में से 14 अनुसूचित जातियों और 2 अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। वहां के कुल पौने तीन करोड़ मतदाताओं में महिलाओं की संख्या पुरुशों से ज़्यादा है। पुरुष 1 करोड़ 30 लाख हैं तो महिलाएं 1 करोड़ 40 लाख। 2021 के चुनाव में वाम दलों की अगुआई वाली एलडीएफ 99 सीटें जीती थी और उसे सवा 45 प्रतिषत वोट मिले थे। कांग्रेस की अगुआई वाली यूडीएफ 41 सीटें जीती थी और उसे साढ़े 39 प्रतिषत वोट मिले थे। भाजपा एक भी सीट नहीं जीती, मगर वह सवा 11 प्रतिशत  वोट मिले ले गई थी। कांग्रेस ने 21 सीटें जीती थी और उसे 25 प्रतिषत वोट मिले थे।

मगर 2024 के लोकसभा चुनाव में इस दृश्य का शीर्षासन हो गया। एलडीएफ के राजनीतिक दलों को सिर्फ़ 18 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली थी और साढ़े 33 प्रतिशत वोट मिले। यूडीएफ के राजनीतिक दलों को 111 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली और साढ़े 45 प्रतिशत वोट मिले। भाजपा को भी 11 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली और पौने 17 प्रतिशत वोट मिले। कांग्रेस को अकेले 84 सीटों पर बढ़त मिली और सवा 35 प्रतिशत वोट मिले। यानी एलडीएफ को 81 सीटों और 12 प्रतिशत वोट का भारी-भरकम नुक़्सान हुआ। यूडीएफ को 70 सीटों और साढ़े 6 प्रतिशत वोट का बेहद अच्छा-ख़ासा फ़ायदा हुआ। कांग्रेस को अकेले 63 सीटों और सवा 10 प्रतिशत वोट का फ़ायदा हुआ। भाजपा के भी साढ़े 5 प्रतिषत वोट बढ़े।

यह परिदृश्य केरल में इस बार कांग्रेस की अगुआई वाली यूडीएफ के आसानी से सरकार में आने का संकेत दे रहा है। एलडीएफ अपने सायोनारा-सफ़र पर जाती दिखाई दे रही है और हो सकता है कि भाजपा एकाध सीट के साथ केरल की विधानसभा में पहली बार अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा दे। मेरा आकलन है कि केरल में कांग्रेस को कम से कम 46 सीटें मिलेंगी और यूडीएफ न्यूनतम 75 का आंकड़ा छुएगी।

पुडुचेरी के 30 विधानसभा क्षेत्रों में से 5 अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं। वहां के कुल साढ़े 9 लाख मतदाताओं में भी महिलाओं की तादाद पुरुषों से ज़्यादा है। महिलाएं पांच लाख हैं और पुरुष साढ़े चार लाख। 2021 के चुनाव में एन. रंगास्वामी की पार्टी को 10 सीटें और 26 प्रतिशत वोट मिले थे। भाजपा को 6 सीटें और पौने 14 प्रतिशत वोट मिले थे। डीएमके ने 6 सीटें और साढ़े 18 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। कांग्रेस को पौने 16 प्रतिशत मतों के साथ 2 सीटें मिली थीं। 6 सीटें और सवा 26 प्रतिशत वोट अन्य राजनीतिक दलों की झोली में गए थे। पुडुचेरी का दृश्य इस बार भी कुहासे से सराबोर है। छिटपुट राजनीतिक दलों से जीत कर आने वाले विधायक तय करेंगे कि वहां की सरकार का रंग क्या होगा।

अगले बारह से अठारह दिनों के बीच पश्चिम बंगाल के 294 और तमिलनाडु के 234 विधानसभा क्षेत्रों में भी मतदान होगा। इन 528 सीटों पर निष्पक्ष और निडर मतदान कराने के लिए हमारे यशस्वी और और पराक्रमी प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी, लौहपुरुष-द्वितीय अमित भाई शाह और आईन-पसंद मुख्य निर्वाचन आयुक्त दिन-रात हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। वहां के ज़मीनी हालात तो ममता बनर्जी और एम. के. स्टालिन का ही घ्वजारोहण ही कर रहे हैं, मगर अमृतकाल में बारह-पंद्रह दिन बाद की मुस्तक़बिल-शिनासी करना बुद्धिमानी नहीं माना जाता है। सो, बावजूद इस के कि मै पूरी तरह मुतमइन हूं कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कोई रद्दोबदल नहीं होने वाला है, मगर वहां मतदान संपन्न हो जाने दीजिए, तभी मैं आप को बता पाऊंगा कि इन दोनों प्रदेशों की टोपियों से कूद कर बाहर आने वाले खरगोशों का रंग मौलिक रह पाया है या रंगरेज़ अपना कमाल दिखाने में कामयाब हो गए हैं।

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