अर्थशास्त्री इस स्थिति को लेकर सावधान हैं। जगदीश भगवती ने पहले ही चेताया था कि बहुत सारे अलग-अलग व्यापार समझौते “स्पेगेटी बाउल” जैसी उलझन पैदा करते हैं—नियम जटिल हो जाते हैं और लाभ सबसे कुशल व्यापारियों को नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से पसंदीदा साझेदारों को मिलता है।
दो सौदों की कहानी
भारत की 2026 की शुरुआत ज़ोरदार कूटनीतिक हलचल से हुई। 27 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फ़ॉन डर लेयेन ने भारत–यूरोपीय संघ के एक बड़े मुक्त-व्यापार समझौते की घोषणा की। ब्रसेल्स में इसे “सभी सौदों की जननी” कहा गया। इसमें शुल्क कम करने, निवेश बढ़ाने और पर्यावरण से जुड़ी प्रतिबद्धताओं की बात थी, जिससे दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ और क़रीब आने वाली थीं।
इसके एक हफ़्ते के भीतर ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ एक अलग द्विपक्षीय समझौते की घोषणा कर दी, जिसमें ऊँचे अमेरिकी शुल्क घटाने और तनावपूर्ण रिश्तों को सुधारने का वादा था। छह दिनों में दो बड़े सौदे। दो महाशक्तियाँ प्रभाव बढ़ाने की होड़ में। और भारत—एक उभरती अर्थव्यवस्था—एक बिखरती वैश्विक व्यवस्था में संतुलन साधने की कोशिश में।
भारत के लिए असली सवाल यह नहीं है कि ये समझौते अहम हैं या नहीं—वे अहम हैं। सवाल यह है कि क्या ये सचमुच वैश्विक व्यापार में भारत की छोटी-सी हिस्सेदारी को बढ़ा पाएँगे, या फिर केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाएँगे।
स्वतंत्रता के बाद से भारत की विश्व वस्तु-निर्यात में हिस्सेदारी लगभग 2 प्रतिशत के आसपास ही रही है। अर्थव्यवस्था अब लगभग चार ट्रिलियन डॉलर की हो चुकी है, फिर भी वैश्विक मूल्य-श्रृंखलाओं में भारत की भागीदारी सीमित है। इसके उलट चीन आज दुनिया के कुल निर्यात का 14 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखता है। भारत-चीन व्यापार 150 अरब डॉलर से ऊपर है, लेकिन इसमें भारत का घाटा बहुत बड़ा है। भारत ज़्यादातर इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और रसायन आयात करता है, जबकि निर्यात में कच्चा माल और कम मूल्य के उत्पाद हावी हैं। यह असंतुलन लंबे समय से बना हुआ है।
चीन के अलावा भारत का काफ़ी व्यापार खाड़ी देशों, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका से होता है। ये रिश्ते विविध हैं, पर गहरे नहीं। वे एक ऐसी अर्थव्यवस्था दिखाते हैं जो बड़े पैमाने पर नहीं, बल्कि लचीलापन दिखाकर प्रतिस्पर्धा कर रही है। ऐसे में दो बड़े व्यापारिक ऐलानों का अचानक आना किसी ठोस रणनीति से ज़्यादा एक कूटनीतिक प्रदर्शन जैसा लगता है—ख़ासकर तब, जब देश के भीतर आर्थिक दबाव बढ़ रहे हों।
अर्थशास्त्री इस स्थिति को लेकर सावधान हैं। जगदीश भगवती ने पहले ही चेताया था कि बहुत सारे अलग-अलग व्यापार समझौते “स्पेगेटी बाउल” जैसी उलझन पैदा करते हैं—नियम जटिल हो जाते हैं और लाभ सबसे कुशल व्यापारियों को नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से पसंदीदा साझेदारों को मिलता है। ब्रिटेन, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ और ओमान जैसे देशों के साथ हुए समझौते भी भारत की वैश्विक व्यापार हिस्सेदारी नहीं बढ़ा पाए हैं। यूरोपीय संघ के नए नियम छोटे निर्यातकों के लिए और मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं, जो पहले ही मानकों और प्रमाणन से जूझ रहे हैं।
कौशिक बसु ने भी चेताया है कि जवाबी शुल्क और सीमित साझेदारियों से बचना चाहिए। अमेरिका के साथ नया समझौता रिश्तों को आसान बना सकता है, लेकिन इसमें ऊर्जा ख़रीद और रणनीतिक अपेक्षाएँ भी जुड़ी हैं, जो सरकारी ख़र्च और नीति-स्वतंत्रता पर दबाव डाल सकती हैं। यूरोप, कनाडा और पूर्वी एशिया के साथ व्यापक जुड़ाव के बिना भारत असमान द्विपक्षीय निर्भरता में फँस सकता है—ख़ासकर तब, जब बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था कमज़ोर हो रही है।
अरविंद सुब्रमणियन मानते हैं कि यूरोपीय बाज़ार तक बेहतर पहुँच से अमेरिका पर भी दबाव बन सकता है। लेकिन वे साफ़ कहते हैं कि अगर देश के भीतर लॉजिस्टिक्स, अवसंरचना, शुल्क व्यवस्था और निजी निवेश में सुधार नहीं हुआ, तो लाभ सीमित ही रहेंगे। जीडीपी वृद्धि में 0.3 से 0.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी अच्छी है, पर इससे तस्वीर पूरी तरह नहीं बदलती।
रघुराम राजन इस दौर को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ख़तरनाक मानते हैं। उनके अनुसार व्यापार समझौते भारत के लिए सुरक्षा नहीं, बल्कि विविधीकरण का साधन होने चाहिए। अमेरिकी शुल्क केवल रूसी तेल का मामला नहीं थे; वे भू-राजनीतिक दबाव का हिस्सा थे। छोटी रणनीतिक जीतों को बड़ी कामयाबी समझना ख़तरनाक हो सकता है।
जयति घोष दोनों समझौतों को असमान मानती हैं। उनका कहना है कि अमेरिकी समझौते में कृषि और डिजिटल कर पर स्पष्टता नहीं है, जबकि यूरोपीय समझौता भारी सब्सिडी पाने वाले यूरोपीय उत्पादकों के लिए भारतीय बाज़ार खोल सकता है। इसका असर छोटे किसानों और निर्माताओं पर सीधे पड़ेगा।
इन सबके बावजूद, एक बात पर लगभग सभी सहमत हैं: भारत केवल व्यापार समझौतों के सहारे समृद्ध नहीं बन सकता। उसका निर्यात सीमित दायरे में है, उद्योग का योगदान जीडीपी में वर्षों से ठहरा हुआ है और तकनीक अपनाने की रफ़्तार असमान है। चीन का उत्थान बड़े निवेश, विशाल विनिर्माण और लगातार तकनीकी सुधार से हुआ। भारत ने अभी ऐसे इंजन नहीं बनाए हैं।
2026 के ये समझौते अवसर देते हैं, लेकिन तभी जब वे दिशा बदलने का कारण बनें। भारत को व्यापार को दिखावे की कूटनीति नहीं, बल्कि तकनीकी और औद्योगिक सुधार का साधन बनाना होगा। उसे विश्व व्यापार संगठन में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए और द्विपक्षीय समझौतों में केवल शुल्क नहीं, बल्कि तकनीक हस्तांतरण और साझा शोध पर ज़ोर देना चाहिए।
देश के भीतर भी सुधार ज़रूरी हैं। छोटे-मध्यम उद्योगों को नई तकनीक अपनाने में मदद चाहिए। उत्पादन प्रोत्साहन योजनाओं को वैश्विक मानकों से जोड़ना होगा। बंदरगाह, परिवहन, सीमा-शुल्क और वित्त तक पहुँच को तेज़ी से सुधारा जाना चाहिए। चीन के साथ व्यापार असंतुलन को भी सीधे संबोधित करना होगा।
अगर व्यापार नीति को तकनीकी उन्नयन से जोड़ा गया, तो 2047 तक भारत की वैश्विक व्यापार हिस्सेदारी 4 या 5 प्रतिशत तक पहुँच सकती है। नहीं तो नतीजा वही पुराना होगा—बड़े समझौते, सीमित फ़ायदे और बनी रहने वाली कमज़ोरियाँ।
दो सौदों की यह कहानी अभी भारत के बदलाव की कहानी नहीं है। यह एक परीक्षा की शुरुआत है—क्या भारत वैश्विक बिखराव के इस दौर में अपनी क्षमताएँ सचमुच बना पाएगा, या केवल कूटनीतिक प्रदर्शन तक सिमट जाएगा। टूटती दुनिया में मौके दरारों में छिपे होते हैं। भारत को तय करना है कि वह उन्हें दूरदृष्टि से भरेगा या शोर से।
