सुवेंदु की सरकार ने सभी शिक्षण संस्थानों, जिनमें मदरसे भी शामिल हैं उनमें ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य किया है। ध्यान रहे ‘वंदे मातरम’ कोई धार्मिक गीत नहीं है और अगर इसमें कुछ धार्मिक संदर्भ हैं भी तो वह बंगाल की संस्कृति से जुड़े हैं। बंकिम चंद्र चटोपाध्याय बांग्ला संस्कृति के प्रतिनिधि थे। उनकी रचना हर शिक्षण संस्थान में गायी जाए और युवा पीढ़ी को उसकी जानकारी मिले यह बंगाल के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए आवश्यक है।
भारतीय जनता पार्टी जब इस बार पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव में उतरी तो उसने दो बातें बहुत स्पष्ट तरीके से कही थी। पहली बात यह थी कि पश्चिम बंगाल का चुनाव कोई सामान्य चुनाव नहीं है। इसे किसी एक अन्य राज्य के चुनाव की तरह नहीं देखा जा सकता है। भाजपा ने कहा था कि यह वैचारिक लड़ाई है। दूसरी बात यह थी कि इस बार का चुनाव राष्ट्रीय सुरक्षा का चुनाव है। इस तरह पश्चिम बंगाल चुनाव का मूल नैरेटिव हिंदुत्व की वैचारिकी और राष्ट्रीय सुरक्षा का था। इसके इर्द गिर्द दूसरे नैरेटिव तैयार किए गए और लड़ने व जीतने की रणनीतियां बनाई गईं। इसलिए जब भाजपा चुनाव जीती तो उसे सबसे पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के कदम उठाने थे और वैचारिक मुद्दों पर पूरी स्पष्टता के साथ निर्णय करना था।
यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि शपथ लेने के दो सप्ताह के भीतर सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने दोनों बड़े मुद्दों पर निर्णायक रूप से काम किया है और जरूरी फैसले किए हैं। वैचारिक प्रतिबद्धता से जुड़े निर्णय़ करने के बाद ही सुवेंदु दिल्ली की पहली यात्रा पर गए। प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री से मिल कर उन्होंने अपनी सरकार के आरंभिक निर्णयों की जानकारी दी। दोनों मुलाकातों में वे आत्मविश्वास से भरे दिखाई दिए और यह भी दिखा कि दोनों शीर्ष नेताओं का उनके प्रति सद्भाव, स्नेह और समर्थन है।
अगर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े निर्णयों की बात करें तो सरकार गठन के बाद पहली कैबिनेट बैठक में बांग्लादेश से लगती सीमा पर बाड़ लगाने को लिए सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ को जमीन देने का फैसला हुआ। इसके बाद चिकन नेक के नाम से प्रचलित सिलिगुड़ी के एक क्षेत्र को भी राज्य सरकार ने बीएसएफ के हवाले किया। ध्यान रहे बांग्लादेश की पिछली सरकार के समय कई लोग ऐसे थे, जो चिकन नेक पर कब्जा करने की बात करते थे। दिल्ली दंगों में गिरफ्तार कई कथित छात्र नेताओं ने भी यह बात कही थी। चिकन नेक वह इलाका है, जहां से पूर्वोत्तर के सभी हिस्सों को भारत से बाकी हिस्सों से काटने की साजिश की चर्चा हमेशा होती रही है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार तभी इसे प्राथमिकता में रखती है। कुछ समय पहले ही सिलिगुड़ी में ऐसे एक्सप्रेस वे का उद्घाटन हुआ, जहां प्रधानमंत्री स्वंय सेना के जहाज में बैठ कर उतरे। भारत ने दिखाया कि बुनियादी ढांचे को किस तरह से मजबूत किया जा रहा है। सुवेंदु अधिकारी की सरकार के फैसले केंद्र सरकार की उस प्राथमिकता को ध्यान में रख कर किए जा रहे हैं। वैसे यह भी ध्यान रखने की बात है कि सीमावर्ती क्षेत्रों को लेकर केंद्र सरकार बहुत गंभीर है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कुछ दिन पहले ही बिहार के सीमांचल में कई दिन तक प्रवास किया और सुरक्षा सिनेरियो का अध्ययन किया। उन्होंने अब स्मार्ट बॉर्डर की बात की है और पाकिस्तान व बांग्लादेश से लगती पूरी सीमा की बाड़ेबंदी का संकल्प जताया है।
बहरहाल, राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ साथ भाजपा को वैचारिक मुद्दों पर भी त्वरित निर्णय करना था। वैचारिक मुद्दे मूल रूप से भारत की संस्कृति और सनातन से जुड़े हैँ। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के शीर्ष नेताओं ने इनसे जुड़े विषयों को लेकर जितने तरह के वादे किए थे उन पर सबको पूरा करने का उत्तरदायित्व सुवेंदु अधिकारी के ऊपर है। उन्होंने शासन की बागडोर संभालते ही उन पर अमल शुरू कर दिया है। सुवेंदु की सरकार ने सभी शिक्षण संस्थानों, जिनमें मदरसे भी शामिल हैं उनमें ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य किया है। ध्यान रहे ‘वंदे मातरम’ कोई धार्मिक गीत नहीं है और अगर इसमें कुछ धार्मिक संदर्भ हैं भी तो वह बंगाल की संस्कृति से जुड़े हैं। बंकिम चंद्र चटोपाध्याय बांग्ला संस्कृति के प्रतिनिधि थे। उनकी रचना हर शिक्षण संस्थान में गायी जाए और युवा पीढ़ी को उसकी जानकारी मिले यह बंगाल के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए आवश्यक है। इसके विरोध का कोई कारण नहीं है। लेकिन जैसा की सबको पता है, बांग्लादेश की सीमा से लगते इलाकों में वहाबी कट्टरपंथी मुस्लिम समूह सक्रिय हैं और मदरसों में कट्टरपंथी सिलेबस के हिसाब से पढ़ाई होती है। वहां पीर, फकीर या सूफी वाली संस्कृति नहीं है। तभी हो सकता है कि इस निर्णय का विरोध हो लेकिन सरकार इसके क्रियान्वयन के लिए प्रतिबद्ध है।
इसी तरह चुनाव के समय भाजपा की ओर से यह वादा किया गया था कि वह सरकार में आई तो उस व्यवस्था को पूरी तरह से बदलेगी, जिसके तहत बहुसंख्यक हिंदुओं को अल्पसंख्यक की तरह रहने को मजबूर किया जाता था। यह बड़ी बात थी, जिसने लोगों के मानस को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। उनको समझ में आया कि वे बहुसंख्यक हैं लेकिन तृणमूल सरकार की तुष्टिकरण के कारण उनको अल्पसंख्यक की तरह और अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक की तरह रखा जा रहा है। इसके कुछ प्रतीक थे, जिनमें एक प्रतीक सड़कों पर नमाज पढ़ने का था। जुमे यानी शुक्रवार को या किसी धार्मिक मौके पर खुली जगह पर या सड़कों पर नमाज पढ़ना शक्ति प्रदर्शन की तरह होता था। इस ऑप्टिक्स के जरिए एक संदेश दिया जाता था। सुवेंदु अधिकारी ने सरकार में आते ही इस ऑप्टिक्स पर रोक लगा दी है। उन्होंने सड़कों पर नमाज बंद करा दिया है। यह अपने आप में बहुसंख्यक हिंदू आबादी के अंदर सुरक्षा की भावना पैदा करने वाला है। इसी तरह का एक प्रतीक अतिक्रमण का था। उसकी भी सफाई शुरू हो गई है। खुद तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता रहे एक नेता ने सियालदह स्टेशन की सफाई के बाद की तस्वीरें सोशल मीडिया में शेयर की।
वैचारिक मुद्दों में घुसपैठ का मुद्दा सबसे अहम था, जो राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है और राज्य की जनसंख्या संरचना से भी। सुवेंदु अधिकारी ने बहुत साफ शब्दों में कहा है कि घुसपैठियों की पहचान की जाएगी और उनको अदालत में पेश करने की बजाय सीधे सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ को सौंपा जाएगा। उन्होंने ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ यानी ‘थ्री डी’ का सिद्धांत बनाया है। एक तरफ सीमा पर बाड़ लगाई जा रही है, ताकि घुसपैठियों को भारत की सीमा में घुसने से रोका जाए और दूसरी ओर पहले से घुसपैठ कर चुके लोगों की पहचान करके उनको बाहर करने की तैयारी भी हो रही है। ध्यान रहे एसआईआर की प्रक्रिया के तहत ऐसे लोगों की पहचान काफी हद तक हो गई है। तार्किक विसंगति के आधार पर जिनके नाम रोके गए हैं। उनकी जैसे जैसे जांच हो रही है वैसे वैसे एक सूची तैयारी होती जा रही है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने संशोधित नागरिकता कानून यानी सीएए को पूरी तरह से लागू करने की घोषणा भी कर दी है। इसके तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना झेल कर भारत आए गैर मुस्लिमों यानी हिंदू, जैन, सिख, पारसी आदि को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है। इस प्रक्रिया को तेज किया जाएगा औऱ इस क्रम में मुस्लिम घुसपैठियों की पहचान करके उनको बाहर निकाला जाएगा।
चुनाव प्रचार के दौरान वैचारिक मुद्दों में भारतीय जनता पार्टी ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वह मांस और मछली खाने के विरोध में नहीं है और न सरकार बनने के बाद इस पर रोक लगाई जाएगी। लेकिन गौवध को लेकर भाजपा का रुख हमेशा बहुत स्पष्ट रहा है। ध्यान रहे पश्चिम बंगाल देश के उन गिने चुने राज्यों में है, जहां सख्त कानूनी प्रावधानों के बीच गौवध की इजाजत है। इसके साथ ही सामान्य रूप से भी जानवरों को मारे जाने का एक स्पष्ट नियम है, जिसका बंगाल में कभी पालन नहीं हुआ। जैसा ऊपर कहा गया कि तुष्टिकरण की नीति के तहत अल्पसंख्यकों को कुछ भी करने की इजाजत थी। वे कहीं भी कुर्बानी करते थे। कहीं भी दुकानें खोल कर पशु हलाल करते थे। हिंदुओं की भावनाओं का ख्याल किए बगैर यह सब काम खुले में होता था और कोई भी उन्हें कुछ नहीं कह पाता था।
सुवेंदु अधिकारी ने इस चलन को बदलने का निर्णय किया है। उन्होंने बंगाल में लागू ‘वेस्ट बंगाल एनिमल स्लॉटर कंट्रोल एक्ट 1950’ को सख्ती से लागू कर दिया है। इस कानून के तहत बिना प्रमाणपत्र के किसी भी पशु का वध नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा गौवंश की रक्षा के लिए इसके तहत प्रावधान किया गया है कि उन्हीं पशुओं का वध होगा, जो 14 साल या उससे ज्यादा उम्र के हैं, काम के नहीं हैं, दूध नहीं देते हैं, प्रजनन की क्षमता समाप्त हो गई है और घायल या बीमार हैं। इस कानून को सख्ती से लागू कराने का परिणाम यह हुआ है कि पश्चिम बंगाल के बहुत से इलाकों में खास कर शहरी इलाकों में खुले में पशु वध बंद हो गया है। यह धार्मिक व सांस्कृतिक रूप से एक बड़े समुदाय के लिए संतोषजनक है और साथ ही स्वच्छता व स्वास्थ्य के लिहाज से भी बहुत उचित निर्णय है। सो, सुवेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल में बदलाव को गति दे दी है। उन्होंने केंद्र व राज्य के बीच समन्वय के साथ काम करना शुरू किया है और राष्ट्रवाद व हिंदू वैचारिकी से जुड़े विषयों का समाधान भी शुरू कर दिया है। दिख रहा है कि बंगाल के लोगों से किया गया वादा भाजपा पूरा कर रही है।
(लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
