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बंगलादेश में नरसंहार का पैमाना सबसे बड़ा

किसी समुदाय को हथियारों से मार डालने के अलावा उस के विरुद्ध ऐसी कानूनी, आर्थिक, सांस्कृतिक व्यवस्थाएं लादना भी नरसंहार है जिस से उस का क्रमशः नाश सुनिश्चित हो। यह बंगलादेश में दशकों से, सब के सामने हो रहा है। इस नरसंहार का पैमाना और रूप वर्तमान विश्व में अभूतपूर्व और सबसे बड़ा है।

हिंदुस्तान में हिंदू संहार – 2

यहाँ तक कि कठिन बातों पर विचार करना भी उन का काम नहीं। हिंदू  नेता मनोहर बातों से भविष्य के सपने दिखाने में लगे रहते हैं। इसलिए भी, ताकि कश्मीर या बंगलादेश-बंगाल में जारी हिंदू  नरसंहार, जेनोसाइड से ध्यान हटा सकें। जबकि यह गत डेढ़ सौ सालों में विश्व का सब से बड़ा जेनोसाइड है।

‘जेनोसाइड’ और ‘होलोकॉस्ट’ 20वीं सदी में राजनीतिक शब्दकोष में जुड़े शब्द हैं। किसी विशेष समुदाय को खत्म करने का सचेत काम जेनोसाइड है। इस विषय पर अब तक कोई तीन हजार पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। पहले 1915 में उस्मानी तुर्कों द्वारा आर्मीनियाई क्रिश्चियनों का, फिर 1941-1945 के दौरान नाजियों द्वारा यहूदियों के समूल खात्मे की कोशिशों से ये शब्द प्रचलित हुए। परन्तु उसी सदी में हिंदुओं के तीन बार, 1947, 1971, और 1990 में सामूहिक संहार हुए। जो कहीं नोट नहीं होता। जबकि यह पहली बार नहीं, बल्कि सदियों से चली रही कोशिशों की नई कड़ियाँ थीं। भारत में इतिहास-लेखन की परंपरा नहीं रही।‌ इसलिए उन कोशिशों की झलक मुस्लिम या यूरोपीय विद्वानों के लेखन से देख सकते हैं।

सो, सूफी कहलाने वाले मशहूर शायर अमीर खुसरो को मलाल था कि भारत से हिंदू  खत्म नहीं हो सके। उन के शब्दों में — “हमारे मजहबी लड़ाकों की तलवार से यह देश ऐसा बन गया जैसे आग जंगल को कांटों से साफ कर देती है। यह धरती तलवार के पानी से सिक्त हो गई और कुफ्र (हिंदू  धर्म) की भाप छिन्न-भिन्न हो गई। हिन्द के शक्तिशाली लोग पाँव के नीचे कुचल डाले गए… यदि कानून ने जजिया कर ।देकर जान बचाने की मंजूरी न दी होती, तो हिन्द का नाम, जड़-मूल समेत, मिट गया होता।”

‘चाचनामा’ (फतेहनामा सिन्ध) के अनुसार, 712 में मुहम्मद बिन कासिम के सिंध जीतने के बाद, मुलतान में 6 हजार योद्धाओं को मार डाला गया और उन के परिवार गुलाम बना लिये गये। तभी से राजपूत स्त्रियों में जौहर प्रथा शुरू हुई। तब आबादी के हिसाब से यह बहुत बड़ी संख्या थी।

दूसरी झलक: 1568 में चितौड़ पर अकबर के हमले के दौरान 8 हजार हिंदू  स्त्रियों ने आत्मदाह किया, जिस दौरान (उदार मुस्लिम शासक!) अकबर ने 30 हजार सामान्य हिंदू  नागरिकों का भी संहार किया था। तब वहाँ की पूरी जनसंख्या कितनी रही होगी? वैसे हमले में जीत के बाद हिंदुओं का फौरन सामूहिक संहार किया जाता था। जैसे 1565 में विजयनगर पर कब्जे के बाद किया गया।

फ्रांसीसी इतिहासकार फर्नांड ब्राऊडल ने ‘ए हिस्टरी ऑफ सिविलाइजेशन्स’ (1988, पेन्ग्विन) में लिखा है, कि भारत में इस्लामी शासन ‘अत्यधिक हिंसक’ था, और “मुसलमान व्यवस्थित आतंक के बिना इस देश पर शासन नहीं कर सकते थे। क्रूरता आम थी – आग लगा देना, फौरन मार डालने की सजाएं, अंग-भंग करना, सलीब पर लटकाना, शरीर में डंडा, लोहा, आदि घुसेड़ना, और यातना की नई-नई तरकीबें। मंदिरों को तोड़ कर मस्जिदें बनाई गईं। समय-समय पर जबरन धर्मांतरण कराए गए। विद्रोहों को बर्बरता से कुचलना – घरों को जलाकर, गाँवों-खेतों को बर्बाद कर, पुरुषों को खत्म कर और स्त्रियों को गुलाम बना कर।”

कभी-कभी मुस्लिम शासकों ने जबरन अकाल की स्थिति ला कर भी अत्याचार किए। अल्लाऊद्दीन खिलजी और जहाँगीर ने ऐसा किया था। ब्राउडेल के अनुसार, “हिंदुओं पर टैक्स का बोझ इतना भारी था कि एक बार भी फसल खराब होने पर अकाल और बीमारियाँ शुरू हो जाती थीं, जिस में एक-एक बार में दस-दस लाख लोग मर जाते थे।।”

संहार के अलावा, गुलाम बना कर बाहर बेचने से भी लाखों-लाख हिंदू  लुप्त होते रहे। हर मुस्लिम जीत के बाद बगदाद और समरकंद के बाजार गुलामों से पट जाते थे। सभी गुलाम हिंदू  होते थे, क्योंकि इस्लाम में मुसलमान को गुलाम बनाना मना है। जिहाद की बढ़त में एक तकनीक यह भी है।

इतिहासकार डर्क कॉल्फ ने ‘नौकर, राजपूत एंड सिपॉयः द एथनोहिस्टरी ऑफ ए मिलिटरी लेबर मार्केट इन हिन्दुस्तान, 1450-1850’ (कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1990) में लिखा हैः “मुगल सत्ताधारियों द्वारा हजारों-हजार किसानों को गुलाम बनाकर बाहर भेजने के अकाट्य प्रमाण हैं। इन में से कई पश्चिम एशिया के देशों में बेचे जाते थे। यह धंधा 1400 ई. से पहले शुरू हुआ था, जब मुल्तान को गुलामों का एक बड़ा बाजार माना जाता था। पर यह तब से जारी रहा और बाद में काबुल इस का मुख्य केंद्र बना।… इन में (गुलामों को बाहर भेजने में) जहाँगीर का भी हिस्सा था। …”

वे गुलाम बेहद कठिन हाल में मरते थे। हिंदू  कोह दर्रे का नाम ‘हिंदू -कुश’ (गिलगिट से बमुश्किल 100 कि.मी. पश्चिमोत्तर) इसी लिए पड़ा, जब एक ठंढी रात एक लाख गुलाम वहाँ मर गए, जिन्हें बेचने के लिए मध्य एसिया ले जाया जा रहा था। तब तैमूल लंग का शासन (1398-99) था। तैमूर ने एक मुसलमान शासक से दिल्ली छीनी थी। पर उस ने डायरी में लिखा है कि उस की फौज ने मुस्लिम घरों को छोड़ कर हिंदू  बस्तियों में हरेक सैनिक ने 20-20 को गुलाम बनाकर उठाया।

इतिहासकार प्रो. के. एस. लाल के अनुसार दिल्ली सल्तनत के दौर में हिंदुओं की आबादी 5 करोड़ गिरी। पर केवल मुस्लिम तारीखनवीसों के विवरणों से भी साफ है कि मुस्लिम हमलावरों और जिहादियों ने सदियों के दौरान सब से बड़ी संख्या में हिंदुओं-बौद्धों का ही संहार किया। मध्य एसिया में बौद्ध मठों, विश्वविद्यालयों, और भिक्षुओं का खात्मा किया। पूरे एशिया के एक विशाल क्षेत्र से बौद्ध धर्म को उजाड़ देने का काम इस्लाम ने किया। यह डॉ अंबेडकर ने भी लिखा है। हजारों बौद्ध भिक्षुओं का कत्ल अकेले मुहम्मद घूरी और उस के सरदारों ने किया था।

इतिहासकार फरिश्ता ने कई मौकों का उल्लेख किया है, जब मध्य भारत के बाहमनी सुल्तानों (14-15वीं सदी) ने हिंदुओं को ‘दंड देने के लिए’ एक-एक लाख का टारगेट रखकर मारा था। जबकि वह एक क्षेत्रीय स्तर का शासक-वंश था। सब से बड़े संहार महमूद गजनवी (1000 ई.) के हमलों; मुहम्मद घूरी और उस के सरदारों (1192 ई. से); और दिल्ली सल्तनत (13-16वीं सदी) के दौर में हुए। उन की तुलना में बाबर और औरंगजेब तो बहुत छोटे संहारक थे।

कुल मिलाकर, उन संहारों की संख्या, बेहिसाब क्रूरताओं, उस के परिणामों, आदि से ही महान इतिहासकार विल ड्यूराँ ने अपने  ग्रंथ ‘स्टोरी ऑफ सिविलाइजेशन’ (1935-75) में मूल्याकंन किया था:  “भारत पर इस्लामी कब्जा पूरे मानव इतिहास में सब से खूनी कहानी है।” उस के प्रथम खंड का तीसरा अध्याय भारत पर है। उस प्रसंग में ड्यूराँ ने दार्शनिक टिप्पणी की है कि सभ्यता बड़ी अनमोल चीज है। वह शांति-अहिंसा के मंत्र-जाप से नहीं बचती। रक्षा के लिए सुदृढ़ व्यवस्था करनी होती है, नहीं तो मामूली बर्बर भी उसे तहस-नहस कर डालता है।

पर दुर्भाग्य से, हिंदू  नेता आज भी वैसे ही गाफिल हैं। ‘विकास’ का दंभ भरते हैं। पर हिंदुस्तान में हिंदू  संहार चल रहा है। उस के रूप और परिस्थितियाँ भर बदली हैं। केवल 1947 में हुए संहार-विस्थापन को ‘पार्टीशन होलोकॉस्ट’ भी कहते हैं। उस में संभवतः 5 लाख हिंदू  मारे गए। यह संख्या चाहे छोटी लगे, किन्तु पाकिस्तान के कई क्षेत्रों से हिंदुओं का सफाया हो गया। 70 लाख से अधिक हिंदू  वहाँ से भगाए गए। पाकिस्तान में 1947 में तेरह प्रतिशत हिंदू  थे। अब केवल एक प्रतिशत हैं।

फिर, 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में वैसी कोशिश हुई। उस में लगभग 25 लाख हिंदू  मार डाले गए। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’, 14 जुलाई 1971, में सिडनी एच. शानबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, “… फौजी हमले शुरू होने से अब तक असंख्य बंगाली मारे जा चुके हैं। कई सामूहिक संहारों के द्वारा। विदेशी राजनयिकों के अनुसार दो से ढाई लाख लोग। हालाँकि निशाने पर बंगाली मुसलमान और हिंदू  थे, पर अब फौज हिंदुओं को ही निशाना बना रही है। जिसे विदेशी अवलोकनकर्ताओं ने जिहाद  माना है।… भाग कर भारत जाने वाले 60 लाख बंगालियों में कम से कम 40 लाख हिंदू  हैं। फौज अभी भी हिंदुओं को मार डाल रही है और उन के गाँवों को जला और लूट रही है।”

केवल 1971, एक वर्ष में पूर्वी पाकिस्तान में हुए संहार में कुल 24 लाख हिंदुओं के मारे जाने का हिसाब लगाया गया है। यह वहाँ तब हुए कुल नरसंहार का 80 प्रतिशत था। पर उस का कोई लेखा-जोखा नहीं किया गया, न उस की कोशिश की गई। भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, तीनों देशों के शासकों ने अपने-अपने कारणों से उस की चर्चा दबा दी। फिर, जल्द ही कश्मीर में, केवल 1990 में, ढाई लाख हिंदुओं को निकाल बाहर किया गया। उसी तकनीक से, ‘एक को मारो ताकि सौ भागें।’ उस की भी चर्चा नदारद रही है।

इसीलिए, प्रसिद्ध पुलिस अधिकारी के. पी. एस. गिल  (जो उत्तर-पूर्वी भारत में लंबे समय तक रहे) ने अपनी प्रत्यक्ष जानकारी से कहा था कि बंगलादेश का हिंदू  ‘‘दुनिया का सब से बदकिस्मत व्यक्ति है। वहाँ वह तीसरे-चौथे दर्जे का नागरिक है। न उस की संपत्ति सुरक्षित है, न वह अपने धर्म अनुसार पूजा कर सकता है। उस की स्त्रियाँ कभी भी उठाई जा सकती हैं और उस की हालत के बारे में दुनिया को बहुत कम जानकारी है।’’

पर इतने लंबे, सदियों के इतिहास के बावजूद, हिंदुस्तान पर इस्लामी हमलों, सुलतानों, जिहाद ने आज तक जो चोट पहुँचाई है – उस का कोई शोध अभी शुरू भी नहीं हुआ है! उलटे, पाठ्य-पुस्तकों और विचार-विमर्श में झूठी बातों का प्रचार बना रहा है। ऐसा प्रचार राष्ट्रवादी आंदोलन ने, 1919 के लगभग शुरू किया, जो अब एक स्थापित राष्ट्रीय झक, लत बन चुकी है — इस्लाम से जुड़ी हर असुविधाजनक बात पर पर्दा डालना।

तब क्या आश्चर्य कि लोगों को पता भी न चला — कि कब, कैसे, किस विधि से आधुनिक युग में दुनिया का सब से बड़ा नरसंहार — भारत यानी ‘अखंड भारत’ वाली बंगाल-बंगलादेश भूमि पर हुआ। और भारत का देसी राज उस पर कुछ करना तो दूर, उस पर कुछ  कहने तक की चाह नहीं  रखता!

बंगलादेश में हिंदू  विनाश गत कई दशकों से सतत जारी, विश्व का सब से बड़ा नरसंहार है। संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (1948) के अनुच्छेद 2 के अनुसार, “जेनोसाइड का अर्थ है किसी राष्ट्रीय, नस्ली, धार्मिक, या जातीय समूह के विरुद्ध ऐसे काम जो उसे पूर्णतः/अंशतः नष्ट करने की क्षमता रखता हो।” इन कामों में यह भी है, “किसी समूह विशेष पर जीवन की ऐसी स्थितियाँ लादना जिस से उस का पूर्णतः/अंशतः भौतिक नाश करने की मंशा हो।”

सो, किसी समुदाय को हथियारों से मार डालने के अलावा उस के विरुद्ध ऐसी कानूनी, आर्थिक, सांस्कृतिक व्यवस्थाएं लादना भी नरसंहार है जिस से उस का क्रमशः नाश सुनिश्चित हो। यह बंगलादेश में दशकों से, सब के सामने हो रहा है। इस नरसंहार का पैमाना और रूप वर्तमान विश्व में अभूतपूर्व और सबसे बड़ा है। (जारी)

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