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मोदी का नया राजनीतिक दांव: एक देश-एक चुनाव…

भोपाल। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के 17 वर्षीय कार्यकाल से अपने प्रधानमंत्री काल को बेहतर सिद्ध करने की तमन्ना रखने वाले हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने जवाहरलाल की ही 6 दशक पुरानी रणनीति एक देश एक चुनाव को अपनाने का फैसला लिया हैI आजादी के बाद के दो आम चुनाव नेहरू जी की इसी नीति पर आधारित थेए जो सफलतापूर्वक संपन्न हुए थेए जिससे नेहरू की कीर्ति में अभिवृद्धि हुई थीए अब नरेंद्र भाई मोदी की सरकार ने भी इसी नीति को अपनाने का फैसला लिया है और इसे लागू करने की संवैधानिक औपचारिकताओं के बाद इसे 5 साल बाद अर्थात 2029 में चुनावों के समय अमल में लाया जाएगाI

इस नीति के तहत संसद ;लोकसभाद्ध और देश की सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होंगे तथा संसद विधानसभाओं के चुनावों के 100 दिन बाद देश की सभी स्थानीय निकायों के चुनाव होंगे। इस घोषणा के साथ सरकार ने दावा किया है कि इस प्रयास से न सिर्फ देश में चुनाव पर होने वाले अरबो रुपए के खर्चे में कटौती होगी साथ ही समय की भी बचत होगी तथा फिर सरकारी और स्थानीय संस्थाएं बिना किसी तरह के अवरोध या विघ्न के जनहित के कार्य कर सकेगी।

वैसे मोदी जी की यह सोच कोई नई नहीं है भारत में आजादी के बाद पहले चार आम चुनाव 1951.52 से 57ए 1962 से 67 और 1971 के दौरान देश के मतदाताओं ने लोकसभा चुनाव के साथ अपने राज्यों की विधानसभाओं के लिए भी वोट डाले थेए बाद में नए राज्य बनने और कुछ राज्यों के पुनर्गठन के बाद यह प्रक्रिया बंद हो गई। 1968 में कुछ राज्यों की विधानसभाओं को भंग किया गया इससे लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई थीए 1983 में चुनाव आयोग ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव कराने की व्यवस्था फिर से शुरू करने का सुझाव दिया था। 1999 में विधि आयोग की रिपोर्ट में भी श्एक देश एक चुनावश् का उल्लेख किया गया थाए 2018 में विधि आयोग ने दोबारा श्एक देश एक चुनावश् का समर्थन कियाए बाद में मोदी सरकार ने इस मसले पर विस्तृत विचार कर अपनी सिफारिशें देने के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था।

जिसने पिछले मार्च माह में अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति जी को सौपी और उसी की सिफारिशों पर करीब 6 महीने विचार विमर्श के बाद मोदी सरकार ने स्कवीकार कर पूरे देश में संसद व विधान मंडलों के चुनाव एक साथ कराने का फैसला लिया तथा इन चुनावों के 100 दिन बाद पूरे देश की स्थानीय संस्थाओं के चुनाव कराने की घोषणा कीए सरकार ने यह महत्वपूर्ण घोषणा तो कर दी किंतु संविधान के अनुसार इस फैसले को सरकार इससे संबंधित संविधान में संशोधन के बिना लागू नहीं कर सकतीए इसलिए सरकार ने अब संसद के अगले शीतकालीन सत्र में संबंधित संविधान संशोधन करवा कर इसे लागू करने का फैसला लिया। किंतु इसके लिए देश के सभी राजनीतिक दलों की सर्वसम्मति जरूरी होगीए फिलहाल देश में 62 राजनीतिक दल हैं जिनमें से 13 ने इस प्रस्ताव को मंजूर नहीं किया है तथा 13 ने हीं इस पर मौन धारण कर रखा हैए शेष 32 राजनीतिक दलों ने केंद्र के इस प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की है सरकार के प्रयास है कि शीतकालीन सत्र के पहले रूठे हुए दलों को मना लिया जाए तथा सर्वसम्मति से इसे संसद से मंजूरी दिलाई जाएए इस दिशा में प्रयास जारी है।

वैसे मुख्य प्रतिपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार के इस प्रस्ताव को भारतीय संविधान के खिलाफ मानकर इसका विरोध शुरू कर दिया हैए कुछ अन्य प्रतिपक्षी दलों की भी यही मानता हैए इसलिए मौजूदा स्थिति में तो सर्व समिति से प्रस्ताव पारित होना मुश्किल प्रतीत हो रहा हैए किंतु अभी शीतकालीन सत्र में कुछ समय बाकी हैए इसी दौरान यदि सरकार विरोधियों को मना लेती है तो शीतकालीन सत्र में संविधान संशोधन की प्रक्रिया पूरी हो सकती है और इसे कानूनी रूप से अगले आम चुनाव 2029 से लागू किया जा सकेगाए वैसे फिलहाल इसकी अंतिम मंजिल काफी दूर है।

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