तीन सौ सदस्यों की बांग्लादेश संसद में सिर्फ तीन हिंदू जीते हैं। य़ह अब तक की सबसे कम संख्या है। इसका मतलब है कि मुस्लिम ध्रुवीकरण लगभग सौ फीसदी रहा। वहां कट्टरपंथी या उदार दोनों किस्म के मुस्लिम मतदाताओं ने हिंदुओं को हराने के लिए वोट किया। इस किस्म का ध्रुवीकरण पश्चिम बंगाल में हिंदू मतदाताओं को सोचने के लिए मजबूर करेगा। सो इस बार हिंदू ध्रुवीकरण पहले से ज्यादा व्यापक रूप से हो सकता है।
बांग्लादेश में बहुत बड़ा बदलाव हुआ है। लगभग पूरी तरह से समाप्त मान ली गई बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी ने रिकॉर्ड बहुमत हासिल किया है। करीब 20 साल के बाद पार्टी सत्ता में लौटी है। लगभग 17 वर्ष तक निर्वासन में रहे तारिक रहमान देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। किसी पड़ोसी देश में चुनाव के परिणामों का असर भारत की राजनीति पर आमतौर पर नहीं होता है। लेकिन बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल का मामला अलग है। दोनों गर्भनाल से जुड़े रहे हैं। तभी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तारिक रहमान को ‘भाई’ कह कर बधाई दी। बांग्लादेश के चुनाव परिणामों में बहुत से सूक्ष्म राजनीतिक संकेत छिपे हैं, जिनसे पश्चिम बंगाल के चुनाव और राजनीतिक स्थितियों की व्याख्या हो सकती है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल की वर्तमान घरेलू राजनीतिक स्थिति से भी कुछ संकेत मिल रहे हैं। ये संकेत ममता बनर्जी का सिरदर्द बढ़ाने वाले हैं।
पश्चिम बंगाल की घरेलू राजनीतिक स्थितियों पर विचार करने से पहले बांग्लादेश के चुनाव नतीजों को बारीकी से देखने की जरुरत है। विशेष तौर पर दो प्रवृत्तियों को देखऩे की आवश्यकता है। पहला, इस बार कट्टरपंथी पार्टी जमात ए इस्लामी के गठबंधन को 70 सीटें मिली हैं। इससे पहले उसे सबसे ज्यादा 18 सीटें मिली थीं और वह भी 1991 में। उसके बाद के चुनाव में तो उसकी सीटें कम होकर तीन रह गई थीं। पिछले तीन चुनावों से पार्टी लड़ नहीं रही थी। इस बार वह लड़ी तो अब तक मिली अधिकतम सीट से चार गुना सीटें मिल गईं। जमात का इस तरह से मजबूत होना बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के लिए चिंता की बात है।
हिंदुओं ने इस बार पूरी तरह से बीएनपी का समर्थन किया क्योंकि हिंदुओं की हितैषी मानी जाने वाली अवामी लीग इस बार चुनाव नहीं लड़ी थी। उसकी नेता शेख हसीना का तख्तापलट हो गया था और वे भारत में रह रही हैं। दूसरी संख्या यह है कि इस बार तीन सौ सदस्यों की बांग्लादेश संसद में सिर्फ तीन हिंदू जीते हैं। य़ह अब तक की सबसे कम संख्या है। इसका मतलब है कि मुस्लिम ध्रुवीकरण लगभग सौ फीसदी रहा और वहां कट्टरपंथी या उदार दोनों किस्म के मुस्लिम मतदाताओं ने हिंदुओं को हराने के लिए वोट किया। इस किस्म का ध्रुवीकरण पश्चिम बंगाल में हिंदू मतदाताओं को सोचने के लिए मजबूर करेगा। मुस्लिम ध्रुवीकऱण पहले से बंगाल में होता रहा है लेकिन इस बार हिंदू ध्रुवीकरण पहले से ज्यादा व्यापक रूप से हो सकता है।
अगर बंगाल के वर्तमान घरेलू राजनीतिक स्थितियों की बात करें तो पश्चिम बंगाल में इस समय दो स्तर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना स्पष्ट दिख रही है। एक व्यापक हिंदू ध्रुवीकरण तो दूसरा नई ताकतों के ईर्द गिर्द मुस्लिम ध्रुवीकरण। पिछले तीन चुनावों से हिंदू मतदाताओं का व्यापक रूप से रूझान भाजपा के पक्ष में दिखता रहा है। 2019 लोकसभा चुनाव फिर 2021 विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 38 से 41 फीसदी के बीच वोट मिले हैं। यह वोट विशुद्ध रूप से हिंदू वोट है। ध्यान रहे पश्चिम बंगाल में 70 फीसदी हिंदू मतदाता हैं। उनमें से अगर भाजपा औसतन 40 फीसदी वोट ला रही है इसका मतलब है कि 60 फीसदी हिंदू भाजपा को वोट दे रहे हैं।
एक सौ में से 60 हिंदू का वोट भाजपा को मिलना अपने आप में बड़े ध्रुवीकरण का सबूत है। लेकिन आमने सामने की लड़ाई में यह जीत के लिए पर्याप्त नहीं है। जीतने के लिए आवश्यक है कि भाजपा को कम से कम 10 फीसदी हिंदू वोट और मिलें। क्या यह संभव है? इस सवाल का जवाब हिंदू वोट की संरचना में छिपा है। पश्चिम बंगाल में गैर बांग्लाभाषी हिंदू भाजपा को समर्थन देता है। लेकिन बांग्लाभाषी हिंदू व्यापक रूप से भाजपा के खिलाफ वोट करता रहा है। मोटे तौर पर इसको बांग्ला भद्रलोक कह सकते हैं। चूंकि इस मतदाता समूह को लगता है कि वह भाषा और संस्कृति, जीवन शैली, खान पान, पहनावा सबमें बाहरी हिंदुओं की बजाय मुस्लिमों के ज्यादा करीब है इसलिए ये मुसलमानों के साथ वोट करने में कोई परहेज नहीं करते रहे हैं।
परंतु अब स्थितियां बदल गई हैं। अब तेजी से बदलती जनसंख्या संरचना और मुस्लिम बहुलता वाले इलाकों में बांग्लाभाषी हिंदुओं पर होने वाली अत्याचार की घटनाओं में बढ़ोतरी ने उनको सोचने के लिए मजबूर किया है। उनको लग रहा है कि गैर बांग्लाभाषी हिंदू तो अपने राज्य लौट जाएंगे लेकिन अगर इसी अनुपात में मुस्लिम आबादी बढ़ती रही तो बांग्लाभाषी हिंदू कहां जाएंगे! उन्हीं के बच्चों का अवसर ज्यादा मारा जा रहा है और उन्हीं के बच्चों को अपना घर छोड़ कर बाहर जाना पड़ रहा है। पहले अगर इस समूह का वोट ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस से टूटता भी था तो वह वाम मोर्चा और कांग्रेस के साथ चला जाता था। इसका भी फायदा तृणमूल को ही मिलता था।
ध्यान रहे पिछले विधानसभा चुनाव में भी लेफ्ट और कांग्रेस के गठबंधन को 11 फीसदी से कुछ ज्यादा वोट मिला था। इस वोट में ज्यादा हिस्सा हिंदू मतदाताओं का ही था क्योंकि मुस्लिम वोट लगभग पूरी तरह से तृणमूल के साथ गया था तभी उसे 48 फीसदी वोट मिला था। इस बार बहुत स्पष्ट बदलाव दिख रहा है। बांग्लाभाषी हिंदू पहली बार भाषा और संस्कृति की बजाय अपनी रोजमर्रा की व्यावहारिक समस्याओं को ध्यान में रख कर वोट करने की तैयारी में दिख रहे हैं। उनकी समस्याओं के केंद्र में आज बढ़ती हुई मुस्लिम आबादी और सत्ता के संरक्षण की वजह से उनका बदलता व्यवहार है। इसलिए पहले के मुकाबले ज्यादा बांग्लाभाषी हिंदू भाजपा के साथ जा सकते हैं। वे लेफ्ट और कांग्रेस के साथ जाकर वोट बरबाद करने की बजाय प्राथमिक रूप से भाजपा को पसंद करेंगे।
बांग्लाभाषी हिंदुओं और उसमें भी भद्रलोक की सोच में आए बदलाव के पीछे एक मुख्य कारण भाजपा की राजनीति और उसका सांगठनिक बदलाव भी है। यह ध्यान रखने की बात है कि पश्चिम बंगाल के भद्रलोक में सबसे ज्यादा हिस्सा ब्राह्मण और कायस्थ जातियों का है। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में प्रदेश अध्यक्ष शामिक भट्टाचार्य को बनाया है, जो ब्राह्मण जाति से आते हैं और जमीनी स्तर पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ व भाजपा के साथ बहुत कम उम्र से काम कर रहे हैं। इस बार कायस्थ भद्रलोक नितिन नबीन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने के बहुत खुश है। भाजपा की राजनीति में पहली बार कायस्थ समाज के किसी नेता को इतना ऊंचा स्थान मिला है। नितिन नबीन एक बार बंगाल का दौरा कर चुका हैं और जैसे जैसे चुनाव नजदीक आएगा वैसे वैसे उनके दौरे बढ़ेंगे। सो, एक तो बांग्ला भद्रलोक और बांग्लाभाषी हिंदू व्यापक रूप से बढ़ती हुई मुस्लिम आबादी की वजह से अपना मतदान व्यवहार बदलने की तैयारी करता दिख रहा है तो दूसरी ओर नितिन नबीन और शामिक भट्टाचार्य की वजह से उसको एक किस्म का बूस्टर भी मिल गया है। एक तीसरा कारण बांग्लादेश के चुनाव नतीजे हैं, जहां जमात जैसी कट्टरपंथी ताकत मजबूत हुई है और हिंदू राजनीतिक रूप से लगभग पूरी तरह से हाशिए में गए हैं।
अब अगर मुस्लिम ध्रुवीकरण की बात करें तो उसमें भी बहुत दिलचस्प तस्वीर दिखाई देती है। मुस्लिम मतदाता आजादी के बाद कांग्रेस के साथ थे। बाद में वाम मोर्चे के साथ उनका ध्रुवीकऱण हुआ और अब तृणमूल कांग्रेस के प्रति उनकी निष्ठा दिखाई देती है। वर्तमान राजनीति की एक सचाई यह है कि मुस्लिम मतदाताओं का एकमात्र लक्ष्य किसी तरह से भारतीय जनता पार्टी को हराने का है। इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। इसलिए प्रदेश में बन रही नई राजनीतिक पार्टियों को मुस्लिम आवाम ताकत देना चाहेगा लेकिन वह तृणमूल कांग्रेस की कीमत पर नहीं होगा। जहां भी तृणमूल कांग्रेस की लड़ाई भाजपा से है और मुस्लिम मतदाताओं को लगेगा कि ममता बनर्जी की पार्टी ही भाजपा को हरा सकती है वहां वे पूरी तरह से उनके साथ खड़े होंगे।
परंतु जहां ऐसी स्थिति नहीं है, जहां दूसरी पार्टी भी भाजपा को हरा सकती है और अगर वह पार्टी किसी मुस्लिम नेता की पार्टी है तो वहां उसके प्रति मुस्लिम मतदाता रूझान दिखा सकता है। यह सुनने में थोड़ा जटिल लग सकता है लेकिन जमीनी स्तर पर इस किस्म का ध्रुवीकरण कई जगह देखने को मिला है। बिहार के सीमांचल में जहां मुस्लिम आबादी 40 फीसदी से ज्यादा है वहां मुस्लिम मतदाताओं ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को वोट दिया। लगातार दो चुनावों में उनकी पार्टी के पांच पांच विधायक जीते। इसी तरह का रूझान महाराष्ट्र में भी देखने को मिला। बिहार और महाराष्ट्र से उलट पश्चिम बंगाल में सिर्फ एक मुस्लिम पार्टी नहीं है, बल्कि कई मुस्लिम पार्टियां हैं, जो आपस में तालमेल करने की तैयारी भी कर रही हैं।
मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद का निर्माण शुरू कराने वाले विधायक हुमायूं कबीर की जनता उन्ननयन पार्टी है तो इसी से मिलते जुलते नाम वाली एक और जातीय उन्नयन पार्टी भी बनी है। ओवैसी की एआईएमआईएम की उपस्थिति पहले से है और उसके प्रदेश अध्यक्ष ने हुमायूं कबीर की एक रैली में हिस्सा लिया था। बदरूद्दीन अजमल की पार्टी भी किस्मत आजमाने की तैयारी कर रही है। इनके अलावा नौशाद सिद्दीकी की इंडियन सेकुलर फ्रंट भी है, जिसने पिछली बार कांग्रेस और वाम मोर्चे के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था। इस बार भी उसके नेता किसी मजबूत गठबंधन की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस ने ऐलान किया है कि वह अकेले लड़ेगी। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि वाम मोर्चा क्या करता है? वाम मोर्चे का नेतृत्व कर रही सीपीएम के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम की पिछले दिनों हुमायूं कबीर से मुलाकात हुई थी। सो, क्या वाम मोर्चा मुस्लिम पार्टियों के साथ तालमेल कर सकता है?
जो हो राज्य की राजनीतिक तस्वीर बहुत दिलचस्प हो गई है। मुस्लिम नेताओं को पता है कि मुस्लिम आवाम अपना नेता तलाश रही है। सेकुलर राजनीति करने वाली पार्टियों पर से उनका भरोसा उठ रहा है। वे रणनीतिक तरीके से मतदान कर रहे हैं। यह भी ममता बनर्जी के लिए चिंता की बात है। जहां मुस्लिम आबादी 20 फीसदी तक या उससे कम है वहां तो भाजपा को हराने के लिए मुस्लिम मतदाता पूरी तरह से उनका साथ देंगे। लेकिन जहां आबादी ज्यादा है और वोट बंटने पर भी नुकसान की संभावना कम है, विशेष रूप से मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तरी दिनाजपुर आदि इलाकों में, वहां मुस्लिम मतदाता प्रयोग के तौर पर मुस्लिम पार्टियों के साथ जा सकते हैं।
उनको पता है कि अगर एआईएमआईएम या आईएसएफ या जेयूपी या एआईयूडीएफ का विधायक जीतेगा तो वह उनका अपना होगा और जरुरत होने पर भाजपा विरोधी पार्टी का ही साथ देगा। इस सोच में मतदान होने पर ममता बनर्जी को नुकसान हो सकता है। दूसरे, मुस्लिम आवाम का इस प्रकाऱ का ध्रुवीकऱण भी हिंदू मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में ज्यादा मजबूती से खड़ा होने के लिए प्रेरित करेगा। सो, इस बार विधानसभा का चुनाव तृणमूल कांग्रेस के लिए कड़ी परीक्षा की तरह है। उसे 15 साल की सत्ता विरोधी लहर का भी जवाब देना है और नए ध्रुवीकऱण का भी मुकाबला करना है तो दूसरी ओर भाजपा व्यापक हिंदू ध्रुवीकऱण और डबल इंजन की सरकार के आधार पर इतिहास बनाने की तैयारी में है। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
