आप भी सोचें, साल की कौन सी तस्वीर हम हिंदुओं के लिए सर्वाधिक शर्मनाक थी? मेरी स्मृति में हथकड़ी पहने हिंदुओं का अमेरिकी सैनिक विमान से उतरते हुए फोटो। फिर उस तस्वीर, वीडियो को आला अमेरिकी अधिकारियों द्वारा दुनिया में प्रचारित करना। मगर मोदी सरकार के मुंह से आपत्ति, विरोध का एक शब्द भी नहीं! ऐसे में साल अंत में बांग्लादेश में हिंदुओं को मारने की ताजा घटनाओं पर क्या रोएं? 1947 से 2025 के हिंदू अनुभवों में दुनिया में कभी हिंदुओं को हथकड़ी पहना कर, जलील कर भारत लौटाने की घटना नहीं हुई। इसलिए आश्चर्य नहीं जो पड़ोसी पिद्दी देश में आज बांग्लादेश में हिंदुओं को पीट कर, जला कर मारा जा रहा है। और ढाका की अंतरिम सरकार को रत्ती भर परवाह नहीं! उलटे वहां से यह बयान सुनने को मिला है कि हमें कम न समझें। भारत के नार्थ-ईस्ट इलाके को हम भारत से काट देंगे। अलग कर देंगे!
हकीकत है कि वर्ष 2025 में वैश्विक पैमाने पर ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड से लेकर अमेरिका, कनाड़ा तक में हिंदूफोबिया है। हिंदुओं से नफरत में हेट क्राइम की खबरें हैं। दुनिया में हिंदुओं को देखने का नजरिया बदला है। 2014 से पहले प्रवासी हिंदू का आईटी मेधा, सभ्य, समझदार-समावेशी, उदार, मेहनती तासीर में मान-सम्मान था। पश्चिम में मुसलमान को लेकर चिंता, नफरत याकि इस्लामोफोबिया था। वह अब भी है। मगर मुस्लिम, यहूदी के बाद अब हिंदूफोबिया भी है। कनाडा, अमेरिका में हिंदू परेशान हैं। कनाडा में उग्रवादी सिख नेताओं ने प्रशासन में यह बात पैठा दी है कि हिंदू होते ही ऐसे हैं!
नतीजतन हिंदुओं के लिए अमेरिका, कनाडा आदि उन देशों में अवसर सिमट गए हैं जो नरसिंह राव-बिल क्लिंटन की आपसी समझदारी से खुले थे। 1993 से 2023 के तीस सालों में हिंदुओं ने बाहर पढ़ाई कर, अपनी उपयोगिता साबित करके वहां के नागरिक बनने का जो रिकॉर्ड बनाया था वह सिलसिला भी खतरे में है। पढ़ाई के लिए, विदेश में नौकरी, विदेशी नागरिकता की चाहना वाले हिंदुओं के लिए अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया सभी अब चिंता के मुकाम हैं। हिंदुओं का वेलकम नहीं है उनसे दूरी रखने, बनाने का रूख है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एचबी 1 जैसे वीजा खत्म या कठिन बना कर हिंदुओं, भारतीयों को रोकने के कई रोड़े बना दिए हैं।
क्यों हुआ यह सब? क्यों कर हिंदूफोबिया? वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छप्पन इंची छाती तथा थोथा चना बाजे घना के नतीजे हैं। अमेरिका का बाइडेन प्रशासन हो या ट्रंप प्रशासन, बांग्लादेश की शेख हसीना वाजेद हों या मोहम्मद यूनुस या ब्रिटेन की ऋषि सुनक सरकार हो या मौजूदा कीर स्टार्मर सभी को समस्या मोदी के हिंदू राज के नैरेटिव की छाया में प्रवासी हिंदू भक्तों का व्यवहार है। क्रिकेट के एक मैच पर ब्रिटेन में जैसी हिंदू-मुस्लिम हिंसा हुई उसने ब्रितानी समाज की सोच पर असर डाला। पहले मुसलमान व यहूदी के प्रति पश्चिमी देशों में घृणा और भेदभाव, हेट क्राइम थे अब तीसरे नंबर पर हिंदू हैं। अमेरिका के कॉलेज कैम्पस, सोशल मीडिया व कार्यस्थलों में अपमानजनक भाषा, बहिष्कार और पक्षपात के मामले रिपोर्ट हो रहे हैं। तभी अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया में हिंदू संगठनों ने कॉलेज कैम्पस में हिंदूफोबिया की घटनाओं को रिकॉर्ड करने के लिए ट्रैकिंग टूल बनाए हैं। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने नीतिगत विचार-बहस में हिंदू को लेकर बढती असहनशीलता पर चिंता जतलाई है। अमेरिका के जार्जिया राज्य में हिंदूफोबिया की चिंता में कानून बनाने का प्रस्ताव है। वहां सोशल मीडिया में हिंदू हेट के जुमले, मैसेज, भाषणों की भरमार है। सब कुछ अजीब, अचानक है।
सोचें, यह सब 2014 से पहले नहीं था। अमेरिका और कनाडा के प्रवासी हिंदुओं का तब मुख्यधारा के बौद्धिक विमर्श में दबदबा था, उपस्थिति थी। हिंदू विरोधी उग्रवादी चेहरे, समूह हाशिए में थे। अब वे हावी हैं और हिंदू रक्षात्मक या घृणा-भेदभाव तथा हिंसा के मारे।
इसका प्रतिमान 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने बनाया। सर्वाधिक कम संख्या में अपने सपनों से जैसे-तैसे पहुंचे हिंदुओं के हाथ-पांव में हथकड़ियां डाल भारत लौटाना, फिर प्रचार कर उसे दुनिया को दिखलाना यह बतलाना था कि वे हिंदू और हिंदू भारत के प्रति क्या भाव लिए हुए हैं।
