सन् 1980 में अटलबिहारी वाजपेयी के सुर में जनसंघ का जब भाजपा नाम से जन्म हुआ तब संघ के प्रमुख थे बालासाहब देवरस। फिर प्रो. राजेंद्रसिंह, सुदर्शन बने। तब भाउराव देवरस भाजपा के साथ संघ के समन्वयक थे। (जैसे इन दिनों अरूणकुमार है) कर्नाटक के एक एच. वी. शेषाद्रि, दत्तोपंत ठेंगड़ी, मोरोपंत पिंगले, यादवराव जोशी, एकनाथ रानाडे जैसे वे प्रचारक भी थे जो वैचारिक तौर पर चाहे जितने ठस हो लेकिन चाल, चेहरे, चरित्र में बेदाग थे। इंदिरा गांधी से ले कर राजीव गांधी, नरसिंहराव, वीपीसिंह आदि कईयों से इन प्रचारकों की मुलाकात हुई थी। ये भरोसा पैदा करते थे, कतृज्ञ हुआ करते थे, आज की तरह अहसानफरामोश नहीं। वाजपेयी और ठेंगडी में परस्पर असहमतिया थी बावजूद इसके बतौर प्रधानमंत्री वाजपेयी के समय में मैंने कभी यह नहीं सुना कि वाजपेयी ने सुदर्शन या संघ को हैसियत बताने की जैसी बात की हो, अनदेखी की हो।
सवाल है क्या होता है हैसियत बताना? याद करें, मई 2024 में तत्कालीन भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जे. पी. नड्डा का नरेंद्र मोदी-अमित शाह की सोच को यह कहते हुए व्यक्त करना कि- “शुरुआत में हम कम सक्षम थे, छोटे थे और हमें आरएसएस की जरूरत पड़ती थी। आज भाजपा बड़ी हो चुकी है और सक्षम है। भाजपा खुद अपना काम चलाती है। यही अंतर है।” इतना ही नहीं मोदी-शाह की महिमा का बखान करते हुए कहा -अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के समय भाजपा का काडर छोटा था और उसे संघ के सहयोग पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन अब भाजपा खुद इतनी बड़ी सांगठनिक शक्ति बन चुकी है कि वह अपने फैसले और काम स्वयं संभालने में पूरी तरह सक्षम है।
सोचे, क्या यह सब मोहन भागवत, उनके पदाधिकारियों ने नहीं सुना होगा? नड्डा ने लोकसभा चुनाव के अधबीच संघ को हैसियत दिखाई थी। उनकी बात का मोहन भागवत और उनके पदाधिकारियों ने परोक्ष तौर पर भी जवाब नहीं दिया। मेरा मानना है कि तब से अब तक याकि मोदी द्वारा नितिन नवीन को अध्यक्ष बनाने से ले कर उनके पदाधिकारी, कार्यकारिणी बनाने के पूरे समय तक मोदी-शाह ने संघ को विश्वास में लेने याकि उनको बताने, सलाह करने में कुछ भी नहीं किया है। क्यों? इसलिए क्योंकि मोहन भागवत और उनके प्रचारक अब है क्या? मोदी-शाह के लिए ऐवें ही है। “न काम के, न काज के, ढाई सेर अनाज के।” जबकि मोदी भगवान है और अमित शाह चाणक्य! संघ नाम की संस्था में तनिक भी नैतिक बल नहीं है जो देवरस, ठेंगड़ी या मोरोपंत में था जो कह सकें कि देश को, आर्थिकी, उनके नौजवानों को क्या बना दे रहे हो? अब स्वदेशी संघ, मजदूर संघ, किसान संघ आदि सब मोदी-शाह के राज के खोखे है। ध्यान रहे वाजपेयी के वक्त में सुदर्शन ने जेड़-सुऱक्षा जैसी सरकारी सुरक्षा में सांसे नहीं ली थी तो न अपने दफ्तर फाइवस्टार होटलों जैसे बनवाए तथा न ही शिक्षा संस्थाओं में चाहे जैसी भर्तिया करवाई।
तभी बिना रोक टोक के मोदी-शाह की सत्ता ने सौ साल पुरानी हिंदू राजनीति की कथित होल्डिंग कंपनी आरएसएस को अपनी खोखा कंपनी में कनवर्ट किया है। जैसे मोदी-शाह के लिए नितिन नवीन है वैसे मोहन भागवत और उनकी कार्यकारिणी है। इसलिए मेरे इस वाक्य को जरूर नोट करें कि नरेंद्र मोदी न केवल हिंदू सभ्यता-संस्कृति को खोखा बना दे रहे है बल्कि भाजपा और संघ दोनों की वह नियति बना देंगे जैसे हिंदुओं के कई पुराने मठों की दशा है।
