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‘तार्किक विसंगति’ पर क्या करेगी अदालत

यह लाख टके का सवाल है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही इसे लेकर सस्पेंस बना दिया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि अभी तक सर्वोच्च अदालत ने ‘तार्किक विसंगति’ की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला क्या होगा यह अंदाजा लगाने की जरुरत नहीं है। लेकिन यह सवाल तो है कि अगर सर्वोच्च अदालत ने ‘तार्किक विसंगति’ के आधार पर लोगों के नाम काटने के चुनाव आयोग के फैसले को संवैधानिक रूप से वैध नहीं माने तो क्या होगा? अगर अदालत ने इसे संवैधानिक रूप से वैध मान लिया तब तो कोई बात नहीं है लेकिन अगर यह फैसला अवैध हुआ तो पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव सवालों के घेरे में आएगा। विपक्षी पार्टियां बंगाल का चुनाव रद्द करके दोबारा चुनाव कराने की मांग करेंगी।

ध्यान रहे चुनाव आयोग ने सबसे पहले ‘तार्किक विसंगति’ का मामला पश्चिम बंगाल में ही शुरू किया। उससे पहले जून 2025 में बिहार में एसआईआर का काम शुरू हुआ था, जो अक्टूबर में चुनाव होने से पहले ही पूरा हो गया था। वहां ‘तार्किक विसंगति’ के आधार पर किसी का नाम नहीं काटा गया था। बिहार में ‘एएसडीडी’ यानी ‘एब्सेंट, शिफ्टेड, डेड एंड डुप्लीकेट’ इसी चार आधार पर नाम काटा गया था। इसके बाद जब पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य राज्यों में एसआईआर का काम शुरू हुआ तो चुनाव आयोग ने बंगाल में ‘तार्किक विसंगति’ के आधार पर 27.10 लाख लोगों के नाम काट दिए। ‘तार्किक विसंगति’ का क्या मतलब है इस पर कई बार चर्चा हो चुकी है। ‘तार्किक विसंगति’ के नाम पर जो कथित गड़बड़ी हुई है वह मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर और अलगोरिद्म के कारण है। लोगों के नाम में मामूली गड़बड़ी या पिता के उपनाम से मतदाता का उपनाम मैच नहीं करने के आधार पर या दोनों उपनाम की स्पेलिंग में गड़बड़ी के आधार पर लोगों के नाम काटे गए थे। अलगोरिद्म इस आधार पर लोगों के नाम काट रहा था कि एक व्यक्ति के छह या उससे ज्यादा बच्चे कैसे हो सकते हैं। इन गड़बड़ियों को ठीक करने के बाद 90 फीसदी लोगों के नाम वोटर लिस्ट में वापस शामिल किए जा रहे हैं।

गौरतलब है कि जब पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने ‘तार्किक विसंगति’ की एक नई श्रेणी बनाई तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने ‘तार्किक विसंगति’ के आधार पर जिन लोगों को नाम कटे थे उनको राहत देते हुए न्यायाधिकरण बनाने का आदेश दिया। पहली बार ऐसा हुआ कि सर्वोच्च अदालत ने कार्यपालिका का काम करने के लिए न्यायिक अधिकारियों को लगाया गया। कुल 19 न्यायाधिकरण बनाए गए। लेकिन इनके काम की रफ्तार इतनी धीमी है कि अभी तक एक लाख लोगों के मामले का भी निपटारा नहीं हो सका है। इसी मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा था कि एक बार वोट नही डालेंगे तो क्या हो जाएगा, अगली बार लोग वोट डाल लेंगे। लेकिन ऐसे संवैधानिक व्यवस्था काम नहीं करती है। खुद चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि न्यायाधिकरणों में जिन लोगों के दस्तावेजों की जांच हो रही है उनमे से 90 फीसदी लोगों के दावे सही पाए जा रहे हैं और उनके नाम वोटर लिस्ट में जोड़े जा रहे हैं।

तभी यह सवाल है कि अगर ‘तार्किक विसंगति’ के आधार पर काटे गए 27 लाख से ज्यादा नामों में से 90 फीसदी सही पाए जा रहे हैं तो मई 2021 में आए पश्चिम बंगाल के नतीजे को कैसे सही माना जा सकता है? इसी तरह अगर ‘तार्किक विसंगति’ की श्रेणी को सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक रूप से वैध नहीं माना तब तो इस आधार पर काटे गए सारे नाम मतदाता सूची में शामिल करेंगे। ऐसे में भी पश्चिम बंगाल के चुनाव की क्या शुचिता रह जाएगी? तभी ऐसा लग रहा है कि यह मामला ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां जो भी फैसला होगा वह देश की चुनाव प्रक्रिया पर बहुत बड़ा असर डालने वाला होगा। ध्यान रहे दिल्ली में ‘तार्किक विसंगति’ के आधार पर 32 लाख के करीब लोगों को नोटिस भेजा गया था, जिनमें से 30 लाख से ज्यादा लोगों के नाम वापस मतदाता सूची में शामिल किए जा चुके हैं। इसलिए ‘तार्किक विसंगति’ पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बंगाल चुनाव के कठघरे में खड़ा करने वाला होगा।

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