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बंगाल का विवाद तो और बढ़ जाएगा

New Delhi, May 22 (ANI): A view of the Supreme Court of India, in New Delhi on Thursday. (ANI Photo/Rahul Singh)

सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में कटे नामों को लेकर जो कुछ कहा है वह आगे के लिए बड़ी चिंता का कारण बन सकता है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने सोमवार, 13 अप्रैल को सुनवाई के दौरान कहा कि अगर जीत हार का अंतर कम होता है और कटे हुए नामों का प्रतिशत ज्यादा होता है तो अदालत दखल दे सकती है। इतना ही नहीं बेंच ने मिसाल देकर कहा कि नाम 15 फीसदी कटे हैं और जीत हार का अंतर दो फीसदी है तो इस पर विचार करना होगा। यह सर्वोच्च अदालत की मौखिक टिप्पणी है। उसके आदेश का हिस्सा है। अदालत का फैसला यह है कि इस मुकाम पर वह चुनाव प्रक्रिया में दखल नहीं देगी। यानी जितने लोगों के नाम कटे हैं वे वोट नहीं दे पाएंगे और पहले से तय कार्यक्रम के हिसाब से 23 और 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल की सभी 294 सीटों के लिए चुनाव हो जाएगा।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अभी तक 34 लाख आपत्तियां पहुंची हैं। यह संख्या बढ़ भी सकती है। तभी यह तो तय है कि कम से कम 34 लाख लोग मतदान नहीं कर पाएंगे। अब सवाल है कि अदालत ने जीत हार के अंतर और कुल कटे नामों के प्रतिशत की जो बात कही है वह पूरे एसआईआर के लिए है या तार्किक विसंगति पर जिन लोगों के नाम कटे हैं उनके लिए है? अगर पूरे एसआईआर के लिए होगा तब तो देश भर में चुनाव के बाद कानूनी मुकदमों की बाढ़ आएगी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है कि वह पूरे राज्य के लिए है या विधानसभा के हिसाब से भी यह अंतर मैटर करेगा? अगर पूरे राज्य की बात करें तो पश्चिम बंगाल में पिछली बार जीतने वाली पार्टी तृणमूल कांग्रेस और हारने वाली भारतीय जनता पार्टी के बीच 60 लाख वोट का अंतर था। इस बार एसआईआर में कुल 91 लाख वोट कट गए हैं। अगर अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद तार्किक विसंगति के आधार पर कटे नामों की बात करें तब भी 27 लाख नाम कटे हैं। यह कुल मतदाताओं की सख्या के चार फीसदी के बराबर है। पूरे एसआईआर में 12 फीसदी के करीब नाम कटे हैं।

इसका अर्थ है कि पूरे एसआईआर को मानें तो भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के जीत हार में अगर 12 फीसदी से कम अंतर रहता है तो उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिया जा सकता है। अगर सिर्फ तार्किक विसंगति के आधार पर देखें तो अगर दोनों पार्टियों की जीत हार में चार फीसदी से ज्यादा का अंतर रहता है तो उसे सर्वोच्च अदालत में चुनौती दिया जा सकता है। यह कहानी क्षेत्रवार दोहराई जा सकती है। यानी जिस क्षेत्र में जितने नाम कटे हैं उससे कम अंतर से अगर जीत हार का फैसला होता है तो हारने वाला उम्मीदवार उसे चुनौती दे सकता है। मिसाल के तौर पर ममता बनर्जी के चुनाव क्षेत्र भबानीपुर में 51 हजार नाम कटे हैं। इसमें से 38 हजार के करीब हिंदू मतदाता हैं और 13 हजार के करीब मुस्लिम है। अगर जीत हार का अंतर 51 हजार से कम होता है तो इस फैसले को चुनौती दी जाएगी। एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछली बार के नतीजों के हिसाब से देखें तो 44 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां जीत हार के अंतर से ज्यादा नाम कट गए हैं। सो, सुप्रीम कोर्ट ने जो मौखिक टिप्पणी की है उससे एसआईआर के बाद पैदा हुई समस्या का समाधान नहीं होता है, बल्कि विवाद बढ़ने की संभावना पैदा हो गई है। चुनाव के बाद सैकड़ों मुकदमें कोर्ट में पहुंचे तो हैरानी नहीं होगी।

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