इस सवाल पर तमिलनाडु से ज्यादा चर्चा दिल्ली में हो रही है। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक की पार्टियों में इस पर चर्चा हो रही है और बयानबाजी भी हो रही है। कुछ पार्टियां चुप्पी साधे हुए हैं तो कुछ खुल कर बोल रही हैं। चेन्नई में डीएमके की ओर से एक नेता ने कहा कि कांग्रेस ने पीठ में छुरा भोंका है। हालांकि कांग्रेस इसे नहीं मान रही है। कांग्रेस ने दिल्ली में कहा कि 2014 तक लगातार दस ,साल डीएमके केंद्र में कांग्रेस की सरकार में शामिल रही। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले ऐलान कर दिया कि वह लोकसभा का चुनाव अकेले लड़ेगी। लेकिन कांग्रेस ने इसे पीठ में छुरा भोंकना नहीं माना। इसी तरह अगर कांग्रेस कह रही है कि अगला लोकसभा चुनाव वह डीएमके से अलग होकर लड़ेगी तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
जहां तक अभी डीएमके से अलग होकर टीवीके को समर्थन देने का सवाल है तो कांग्रेस का कहना है कि डीएमके को इससे कोई नुकसान नहीं होगा। वैसे भी डीएमके सरकार नहीं बनाने जा रही है। अगर कांग्रेस के समर्थन से उसकी सरकार बन रही होती और तब कांग्रेस उसका साथ छोड़ती तो उसे धोखा देना कहा जाता। अभी तो आधे रास्ते में खड़ी है। इसके साथ ही कांग्रेस का यह भी कहना है कि चुनाव से पहले ही पार्टी ने साफ कर दिया था कि वह बहुत दिल से डीएमके के साथ नहीं है। प्रदेश कांग्रेस के नेता खास कर सांसद मणिक्कम टैगोर हर हाल में विजय से तालमेल की जिद कर रहे थे। लेकिन मल्लिकार्जुन खड़गे ने पुराने संबंधों और पुराने गठबंधन का हवाला देकर डीएमसे से तालमेल कराया। अगर उस समय कांग्रेस और टीवीके मिल कर लड़ते तो कांग्रेस राज्य की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन सकती थी। इसलिए भले ‘इंडिया’ ब्लॉक की पार्टियां नाराज हों लेकिन कांग्रेस पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।
