बारह बरस में भाजपा के आंगन में प्रवेश करने वाले सारे सियासी घुसपैठिए ‘मोशा- के लिए बूमरेंग साबित होंगे।… बारह साल में तक़रीबन दो सौ सांसद और विधायक दूसरे राजनीतिक दलों को छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए हैं। हर चार दलबदलू सांसदों-विधायकों में से तीन से ज़्यादा को भाजपा ने सीधे अपनी गोद में बिठाया है और आधा-पौना ही अपना दल छोड़ने के बाद भाजपा के बजाय कहीं और गए हैं। भाजपा में शामिल हुए 68 प्रतिशत सांसद-विधायक पहले कांग्रेस में थे।
‘मोशा’-जोड़ी ने भारतीय जनता पार्टी की मूल चाल, उस के मूल चरित्र और चेहरे को पिछले बारह बरस में बदनुमा बनाने में जिस तरह कोई कसर बाक़ी नहीं रखी है, भारतीय राजनीति के इतिहास में उस की गाथा गहरी सिसकियों के साथ आने वाले कई दशकों तक सुनाई देती रहेगी।
तृणमूल कांग्रेस के तीन राज्यसभा सदस्यों सुष्मिता देब, सुखेंदु राय, और प्रकाश चिक बराइक को भाजपा की तरफ़ से राज्यसभा में भेजने के ताज़ा फ़ैसले की सड़ाध के मारे ख़ुद भाजपा के ही ज़्यादातर लोग नाक पर रूमाल लगाए घूम रहे हैं। किसी भी हालत में सत्ता पर काबिज़ रहने की इस हवस ने, दूसरों को तो छोड़िए, भाजपा के ही बहुत-से अर्थवान लोगों को नरेंद्र भाई मोदी और अमित भाई शाह के प्रति गहन वितृष्णा के भाव से भर दिया है।
जैसी भी है, भाजपा की एक विचारधारा है। देश का बहुमत उस विचारधारा के साथ नहीं है, लेकिन 35-40 फ़ीसदी लोग उस विचारधारा से कुल मिला कर इत्तफ़ाक रखते हैं। उन में से कई ‘बेहद आक्रामक’ हिंदुत्व के पक्ष में नहीं हैं, मगर वे हिंदू अस्मिता और हिंदू गौरव की हिफ़ाज़त के लिए अपनाए जाने वाले ‘ठोस उपायों’ के समर्थक हैं। इसलिए वे भाजपा के बुनियादी वैचारिक स्तंभ में पड़ चुकीं संजीदा दरारों को ले कर चिंतित ही नहीं, उद्वेलित हैं।
वे दूसरे राजनीतिक दलों के लोगों की भाजपा में हो रही ‘घुसपैठ’ पर अब तक भीतर-ही-भीतर कुनमुन-कुनमुन कर रहे थे, मगर तृणमूल के सांसदों के लिए बिछाए गए लाल कालीन से अब उन की यह कुनमुनाहट चैराहे पर आती जा रही है। उन्हें भय सता रहा है कि कहीं वह दिन ज़्यादा दूर तो नहीं रह गया है, जब भाजपा का अध्यक्ष कोई आयातित व्यक्ति बन बैठेगा?
बारह साल में तक़रीबन दो सौ सांसद और विधायक दूसरे राजनीतिक दलों को छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए हैं। हर चार दलबदलू सांसदों-विधायकों में से तीन से ज़्यादा को भाजपा ने सीधे अपनी गोद में बिठाया है और आधा-पौना ही अपना दल छोड़ने के बाद भाजपा के बजाय कहीं और गए हैं। भाजपा में शामिल हुए 68 प्रतिशत सांसद-विधायक पहले कांग्रेस में थे। तो जिन्हें इस बात पर ख़ुशियां मनानी हो कि कांग्रेस अपने लोगों को साथ नहीं रख पा रही है या कि सेकुलर विचारधारा के अनुयायी भी अंततः इस नतीजे पर पहुंचते जा रहे हैं कि हिंदू राष्ट्र ही भारत का अंतिम सत्य है, वे अपनी नृत्य-गोपाली में मशगूल रहने के लिए स्वतंत्र हैं। मगर ज़रा उन बेचारे दधीचि-पुत्रों का तो सोचिए, जिन्होंने 101 बरस तक दिन-रात परिश्रम कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सियासी संतान जनसंघ और फिर भाजपा को इस मंज़िल तक पहुंचाया। उन के दिल पर आज क्या बीत रही है, वे ही जानते हैं।
अभी ढाई महीने पहले जब पंजाब से आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हुए तो ‘मोशा’-मंडली भले ही ज़ोर-ज़ोर से अपनी पीठ थपथपा रही थी, मगर सच मानिए, नागपुर के हेडगेवार भवन और दिल्ली के केशवकुंज में ज़्यादातर लोग अपनी ठोड़ी पर हाथ रखे उदास आंखों से यह दृश्य देख रहे थे।
इस तरह का ‘मोशा’-भांगड़ा संघ-शक्ति के घोषदंड की लेझिम और शंख से निकली केदार, शिवरंजिनी और चेतक की स्वरलहरियों से उपजे पथ-संचलन से भला कहां मेल खाता है? सो, दक्षिणमार्गी संगीतशाला के भीतर गूंज रही ताज़ा खक्खट हल्लाबोल की ‘मोशा’-मुनादी अगर भाजपा की परंपरागत शिलाओं के रखवालों की नींद उड़ा रही है तो इस में अस्वाभाविक क्या है?
महाराष्ट्र से ले कर मध्यप्रदेश तक, गोआ से ले कर पंजाब तक, कर्नाटक से ले कर हिमाचल प्रदेश तक, पश्चिम बंगाल से ले कर राजस्थान तक, बिहार से ले कर छत्तीसगढ़ तक – कौन-सा प्रदेश ऐसा है, जहां भाजपा द्वारा मचाई गई आल्हा-ऊदली तोड़फोड़ के कुख्यात किस्सों का नगाड़ा हम ने बारह बरस में पग-पग डग-डग न सुना हो?
इस के बरक्स मुझे 30 बरस पहले 1996 की गर्मियां याद आ रही हैं, जब लोकसभा के चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल को सरकार बनाने लायक पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। भाजपा 161 सीटों के साथ सब से बड़े दल के तौर पर उभरी थी और कांग्रेस के 140 सांसद चुन कर आए थे।
परंपरा है कि सब से बड़े राजनीतिक दल को सरकार बनाने के लिए बुलाया जाता है। खांटी कांग्रेसी रहे शंकरदयाल शर्मा राष्ट्रपति थे तो लोगों को लग रहा था कि कहीं वे यह खेल न खेल डालें कि कांग्रेस को समर्थन देने वाले राजनीतिक दलों के सांसदों की गिनती करा कर उसे पहले सरकार बनाने के लिए आमंत्रण भेज दें। मगर कांग्रेस ने पहले ही ऐलान कर दिया कि वह सरकार बनाने के लिए अपना दावा पेश ही नहीं करेगी। सो, राष्ट्रपति ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया।
अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि बहुत-से राजनीतिक दल उन का समर्थन करेंगे और वे बहुमत के लिए ज़रूरी 272 का आंकड़ा जुटाने में कामयाब हो जाएंगे। मगर प्रमोद महाजन जैसे तिकड़म-नरेशों के होते हुए भी 111 सदस्यों के समर्थन की यह खाई पाटना आसान नहीं था और वही हुआ। अटल जी की सरकार 13 दिन चली और उन्हें विदाई लेनी पड़ी। हरदनहल्ली डोडेगौड़ा देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बन गए।
उन के नेतृत्व में 13 राजनीतिक दलों की संयुक्त मोर्चा सरकार बनी। अटल जी कूचे से निकले, मगर बेआबरू हो कर नहीं निकले। 28 मई 1996 को जब लोकसभा में विश्वास मत आया तो पत्रकार दीर्घा में बैठे कर मैं ने भी अटल जी को अपना बहुत प्रभावकारी भाषण देते सुना। पूर्णो संगमा स्पीकर थे और अटल जी ने उन के सामने बिना मतदान कराए अपना इस्तीफ़ा देने का ऐलान कर दिया। क्या आज आप यह सोच भी सकते हैं कि एक व्यक्ति प्रधानमंत्री बन जाए और फिर भी अपना बहुमत साबित न कर पाए?
आज जिन्हें राघव चड्ढा में दीनदयाल उपाध्याय के और सुष्मिता देब में लक्ष्मीबाई केलकर के अंश दिखाई दे रहे हैं, प्रभु उन्हें यह समझने की सद्बुद्धि दें कि घाट-घाट घूमने वाले वाले किसी राजनीतिक दल या उस के वैचारिक पक्ष की आधारशिलाओं को मजबूत नहीं, खोखला करते हैं। भाजपा को न तो व्यवसायी सुनील चड्ढा के ’अति चीकने पात’ वाले होनहार बेटे से यह उम्मीद करनी चाहिए कि उस की उपस्थिति से दिल्ली-पंजाब के हर तालाब में कमल के फूल खिलने लगेंगे और न संतोष मोहन देब की टप्पेबाज़ बेटी से यह आस रखनी चाहिए कि उस की मौजूदगी पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर भारत में भाजपा की पगड़ी को तुर्रेदार बना देगी।
इस का उल्टा ही होगा। बरसों से अपनी ऐड़ियां रगड़ रहे भाजपाइयों और संघी स्वयंसेवकों का क्षोभ ‘नमो-नमो’ के आलाप को उलटबांसी में तब्दील कर देगा। सब ने देखा है कि आम आदमी पार्टी ने राघव को और कांग्रेस ने सुष्मिता को अवसर और ज़िम्मेदारियां देने में कभी कोई कोताही नहीं की। ऐसे लाभार्थियों की मतलबपरस्ती भारतीय मानस की मूल संरचना को कभी रास नहीं आती है।
सो, ये दोनों ही नहीं, बारह बरस में भाजपा के आंगन में प्रवेश करने वाले सारे सियासी घुसपैठिए ‘मोशा- के लिए बूमरेंग साबित होंगे। आज अगर आप को मेरी यह बात दूर के ढोल लग रही हो तो अगले बरस के मानसून का इंतज़ार कीजिए। तब होने वाली मूसलाधार हम-आप अपनी आंखों से देखेंगे।
