मतदान के इतने भारी भरकम आंकड़े का जो पहला मैसेज लोगों तक पहुंचा वह ये है कि लोग बदलाव चाहते हैं और परिवर्तन के लिए इतनी बड़ी संख्या में निकल कर वोट कर रहे हैं। दूसरा मैसेज यह है कि चुनाव आयोग की ओर से कराई गई एसआईआर के कारण फर्जी मतदाताओं के नाम कट गए हैं और अभी जो वोट डाल रहे हैं वो वास्तविक लोग हैं।
पश्चिम बंगाल में बदलाव की बयार चल रही है। पहले चरण के मतदान में इसके बहुत स्पष्ट संकेत दिखे हें। अब अगर यह बयार आंधी में बदलती है तो अभूतपूर्व नतीजे आएंगे। दूसरे चरण में 29 अप्रैल को 142 सीटों पर मतदान होना है। आंकड़े की नजर से देखें तो यह क्षेत्र पूरी तरह से तृणमूल कांग्रेस के असर वाला है। पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 142 में से 123 सीटें जीती थी और भाजपा को सिर्फ 18 सीटें मिली थीं। इसका एक बड़ा कारण यह रहा था कि कोरोना महामारी के बीच आठ चरण में हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी बहुत प्रभावी तरीके से यह संदेश नहीं बना पाई थी कि वह चुनाव जीत रही है। दू
सरी बात यह है कि संकट के समय आमतौर पर लोग सुरक्षा खोजते हैं और उस समय बदलाव आदि के बारे में नहीं सोचते हैं। सो, कोरोना संकट के बीच लोगों ने यथास्थिति चुनी थी। असम में भी यथास्थिति रही थी तो केरल में भी लोगों ने फिर से लेफ्ट की सरकार को चुना, जहां पांच साल में सत्ता बदल जाती थी।
इस बार दो चरण में चुनाव हो रहे हैं और पहले चरण के चुनाव का संदेश दूसरे चरण में व्यापक रूप से पहुंच रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने भी इस संदेश को आम लोगों तक पहुंचाने में पूरी मेहनत की है। पहले चरण में हुए 93 फीसदी मतदान के आंकड़े को भारतीय जनता पार्टी अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करने में कामयाब रही है। मतदान के इतने भारी भरकम आंकड़े का जो पहला मैसेज लोगों तक पहुंचा वह ये है कि लोग बदलाव चाहते हैं और परिवर्तन के लिए इतनी बड़ी संख्या में निकल कर वोट कर रहे हैं। दूसरा मैसेज यह है कि चुनाव आयोग की ओर से कराई गई एसआईआर के कारण फर्जी मतदाताओं के नाम कट गए हैं और अभी जो वोट डाल रहे हैं वो वास्तविक लोग हैं। तीसरा संदेश यह है कि चुनाव आयोग और केंद्रीय बलों की तैनाती ने तृणमूल कांग्रेस के छापा वोट को रोक दिया है। चौथा और अंतिम संदेश यह है, जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जोर दिया है, कि इस बार पहले के मुकाबले नगण्य हिंसा हुई है। इसका अर्थ है कि लोग बिना भय के घर से निकल कर वोट डाल सकते हैं।
ये चारों मैसेज बहुत अहम हैं और प्रभावी साबित हो रहे हैं। असल में भाजपा के पास पश्चिम बंगाल में पहले से 40 फीसदी के करीब वोट है। उसमें थोड़ी बढ़ोतरी करनी थी। वह बढ़ोतरी दो बातें से हो सकती थी। पहली बात यह कि लोग इस भावना के साथ वोट डालने निकलें कि उनके साथ कोई हिंसा नहीं होगी। ध्यान रहे इससे पहले के चुनावों में कई तरह से मतदाताओं को रोका जाता था। चुनाव से पहले उनके घर पर संदेश भेज दिया जाता था कि वे मतदान करने न जाएं। रास्ते में रोक कर लोगों को लौटाया जाता था।
मतदान केंद्र के अंदर विरोधी पार्टियों के पोलिंग एजेंट्स को धमका कर छापा वोटिंग होती थी। चुनाव आयोग ने इस बार पहले ही ऐलान कर दिया था कि भय मुक्त और हिंसा मुक्त चुनाव होगा। साथ ही सोर्स जैमिंग और बूथ जैमिंग रोकने का भी ऐलान किया था। दूसरे राज्यों के लोगों के लिए यह शब्दावली थोड़ी नई लगेगी। लेकिन बंगाल में पता है कि बूथ जैमिंग और सोर्स जैमिंग कैसे होती थी। सोर्स जैमिंग का मतलब होता है कि लोगों को वोटिंग के लिए निकलने से पहले ही उनको घरों पर रोक दो। बूथ जैमिंग का मतलब है कि अगर लोग घर से निकल कर वोट डालने चल दिए और उनके बारे में यह धारणा है कि वे राज्य में सत्तारूढ़ दल के खिलाफ वोटिंग कर सकते हैं तो उनको बूथ पर पहुंचने से पहले रोक दो। इस बार ऐसा नहीं हुआ।
चुनाव आयोग यह धारणा बनाने में कामयाब रहा कि पहले होने वाली कोई ग़ड़बड़ी इस बार नहीं होगी। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने चुनाव आयोग की तैयारियों का विरोध किया लेकिन उनके विरोध से यह धारणा और मजबूत हुई। मिसाल के तौर पर तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि पश्चिम बंगाल के चुनाव में ढाई लाख केंद्रीय बल तैनात किए गए हैं, जबकि पूरे लोकसभा चुनाव में सिर्फ तीन लाख 40 हजार केंद्रीय बल तैनात किए गए थे। उन्होंने तो यह बताने के लिए पोस्ट लिखा कि चुनाव आयोग कितनी ज्यादती कर रहा है लेकिन उनकी इस पोस्ट ने अंतिम समय तक अनिर्णय की स्थिति में रहने वाले मतदाताओं यानी फ्लोटिंग वोटर्स की दुविधा समाप्त कर दी। उन्होंने घरों से निकल कर वोट डालने का फैसला किया। चुनाव के दिन कई जगह हिंसा की खबरें आईं, लेकिन बंगाल के पहले के चुनावों के मुकाबले वो नणग्य थीं।
लोगों के मन से भय निकालने और सुरक्षा का भाव पैदा करने के बाद दूसरी बात यह हुई कि भाजपा पहले चरण के मतदान के बाद यह माहौल बनाने में कामयाब रही कि वह चुनाव जीत रही है। यह माहौल दूसरे चरण के मतदान को बहुत प्रभावित करेगा। कम हिंसा और 93 फीसदी मतदान के आंकड़े ने भाजपा को जीत का माहौल बनाने और दूसरे चरण के लिए मतदाताओं को सकारात्मक मैसेज देने का मौका दिया। भाजपा ने इस मौके का भरपूर इस्तेमाल किया है। ध्यान रहे दूसरे चरण की 142 सीटों में ज्यादातर सीटों पर हिंदू मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं।
जहां मुस्लिम मतदाता चुनावी जीत हार तय करते हैं वहां मतदान हो चुका। मालदा, मुर्शिदावाद, उत्तरी दिनाजपुर, वीरभूम आदि इलाकों में वोटिंग हो चुकी है। इन इलाकों में वोटिंग के बाद भाजपा यह मैसेज बनवाने में कामयाबी रही है कि 152 में से वह एक सौ के करीब सीट जीत रही है। ऐसे में समझ सकते हैं कि इसका कितना असर उन इलाकों में होगा, जहां हिंदू निर्णायक हैं। सो, सुरक्षा का भाव पैदा करना और जीत की धारणा बनाना भाजपा के लिए दूसरे चरण में बहुत कारगर साबित होगा।
जहां तक पहले चरण की बात है तो इसमें दो क्षेत्र पारंपरिक रूप से भाजपा के लिए बहुत मजबूत रहे हैं। उत्तर बंगाल के जिले, जहां 54 सीटें हैं और जंगल महल के जिले, जहां 40 सीटें हैं। इन 94 सीटों में से भाजपा को पिछली बार 46 सीटें मिली थीं। पहले चरण की बची हुई 58 सीटों में से भाजपा ने 13 सीटें जीती थीं। उसे पहले चरण की 152 सीटों में से पिछली बार 59 सीटें मिली थीं। भाजपा ने पहले चरण में सौ सीटों का आंकड़ा पार करने का लक्ष्य रख कर चुनाव लड़ा। उत्तरी बंगाल, जंगलमहल और बर्धमान में उसके समर्थक बड़ी संख्या में वोट डालने निकले। उत्तरी बंगाल के हर जिले में चाहे कूचबिहार हो या अलीपुरद्वार हो या दार्जिलिंग और कलिम्पोंग हो हर जगह 93 फीसदी के प्रादेशिक औसत से ज्यादा मतदान हुआ।
जंगलमहल में भी मतदान प्रतिशत काफी अच्छा रहा। मुस्लिम बहुल इलाकों में इस बार कांग्रेस और लेफ्ट दोनों जोर लगा रहे थे। उनके अलावा हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी भी थी तो असदुद्दीन ओवैसी की एमआईएम भी थी। कांग्रेस की ओर से अधीर रंजन चौधरी और कांग्रेस के इकलौते सांसद ईशा खां चौधरी का परिवार पूरा जोर लगा रहा था। इससे मालदा, मुर्शिदाबाद के इलाके में वोट बंटे, जिसका कुछ न कुछ फायदा भाजपा को हुआ है। यानी भाजपा ने अपना गढ़ बचाया और तृणमूल के गढ़ में वोट बिखराव का फायदा उसे मिला।
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर भी एक बड़ा फैक्टर है, जिसका कुछ न कुछ फायदा भाजपा को होता दिख रहा है। मिसाल के तौर पर मुर्शिदाबाद जिले में सबसे ज्यादा साढ़े चार लाख नाम कटे। 22 विधानसभा सीटों वाले इस जिले में हर सीट पर औसतन 20 हजार वोट कटा। इसी तरह मुस्लिम बहुल उत्तरी दिनाजपुर में साढ़े तीन लाख नाम कटे। उसके बाद भी इन इलाकों में बंपर वोटिंग हुई। इसका मैसेज यह हुआ कि हिंदू मतदाता बिना किसी भय के घरों से निकल कर वोट कर रहे हैं। यही मैसेज दूसरे चरण में मतदान को सबसे ज्यादा प्रभावित करेगा। लोगों के मन से भय निकल गया है और यह उम्मीद पैदा हो गई है कि भाजपा चुनाव जीत सकती है।
तभी चुनाव के समय या चुनाव के बाद होने वाली हिंसा से घबराने वाले लोग घरों से बाहर निकले हैं और मतदान किया है। इसमें महिलाएं बहुत आगे रहीं। पहले चरण में पुरुषों के मुकाबले दो फीसदी ज्यादा महिलाओं ने वोट दिया है। दूसरे चरण के प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरजी कर बलात्कार और हत्या मामले की पीड़िता की मां को अपने साथ बैठा कर जो सम्मान दिया उसका महिलाओं के बीच बहुत अच्छा संदेश गया है। महिलाओं का सम्मान, सुरक्षा और आर्थिक विकास की आशा ने व्यापक रूप से बंगाली मानस को प्रभावित किया है। ध्यान रहे पश्चिम बंगाल में बड़ी हिंदू आबादी, जिसमें बांग्ला बोलेने वाले हिंदू भी शामिल हैं, को लगने लगा था कि बढ़ती मुस्लिम आबादी और जनसंख्या संरचना में हो रहा बदलाव उनके और उनके बच्चों के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है।
इसलिए पहली बार वे सांस्कृतिक व भाषायी पहचान के दायरे से बाहर निकले और भाजपा को अपनाने के बारे में सोचा। सरकार, पुलिस और प्रशासन के तुष्टिकरण ने भी उनको प्रेरित किया कि वे बदलाव के लिए मतदान करें। भाजपा ने उनको सुरक्षा और जीत का भरोसा तो दिलाया ही साथ ही यह भरोसा भी दिलाया कि बांग्ला भाषा, संस्कृति, खान पान आदि किसी के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। भाजपा के शीर्ष नेताओं ने खुद कहा कि बंगाल में जन्मा, बंगाल में पढ़ा लिखा और बांग्ला बोलने वाला मुख्यमंत्री बनेगा, जो मांस, मछली भी खाने वाला होगा। इस संदेश ने रही सही आशंका को भी समाप्त कर दिया। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
