• डाउनलोड ऐप
Friday, May 14, 2021
No menu items!
spot_img

आज का लेख

लेफ्ट का वोट निगल कर भाजपा बनी विपक्ष

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अपनी पूरी ताक़त झोंकी। इसके बावजूद वो ममता बनर्जी को सत्ता से इंच भर भी डिगा नहीं पाई। उखाड़ फेंकना तो बहुत दूर की बात है। हां, बीजेपी राज्य में मुख्य...

देश के हाई कोर्ट्स को सलाम

देश की उच्च न्यायपालिका में लोगों के कम होते भरोसे की मजबूत होती धारणा के बीच देश की उच्च अदालतों ने रोशनी की किरण दिखाई है। दिल्ली से लेकर मद्रास हाई कोर्ट और इलाहाबाद से लेकर गुजरात हाई कोर्ट...

बहुत सही कहा अनमोल अंबानी ने!

अब तक राजीव बजाज यह कहते रहे थे कि लॉकडाउन बिना सोचे-समझे किया गया एक गलत फैसला था, जिसने देश की अर्थव्यवस्था को गर्त में पहुंचा दिया। यही बात अब अनिल अंबानी के बेटे अनमोल अंबानी ने कही है।...

संघीय व्यवस्था के लिए चुनौती

केंद्र सरकार देश की संघीय व्यवस्था के लिए लगातार चुनौती खड़ी करती जा रही है। मुख्य विरोधी कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के साथ टकराव की वजह से संघीय व्यवस्था के सुचारू संचालन के रास्ते में लगातार बाधा आ...

संस्थाओं की साख का सवाल

चुनाव करा रही संस्थाओं की साख पर बड़ा सवाल उठा है। यह पहली बार है, जब इस तरह से संस्थाएं विपक्षी पार्टियों के निशाने पर आई हैं। चुनाव आयोग के ऊपर तो खैर कुछ पहले से आरोप लगने लगे...

नौकरियों के वादे का अर्थशास्त्र क्या?

कांग्रेस ने असम में चुनाव जीतने पर पांच लाख लोगों को सरकारी नौकरी देने का वादा किया है। इस वादे का क्या असर होगा, यह चुनाव नतीजे के एलान के बाद ही पता चलेगा।

लॉकडाउन की बरसी पर कुछ सवाल

भारत में जो भी होता है वह ‘दुनिया में सबसे बड़ा’ होता है, ऐसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते रहे हैं।

जो है वह सिर्फ दिखावा

यह संभवतः पहली बार हो रहा है कि देश की सरकार वास्तविक अर्थों में काम करने की बजाय सिर्फ काम करने का दिखावा कर रही है। काम नहीं हो रहा है, उसका सिर्फ प्रचार हो रहा है। बुनियादी कामों में या लोगों के जीवन के लिए सबसे जरूरी कामों में भी सिर्फ दिखावा हो रहा है

जनता कर्फ्यू से कुछ नहीं सधना!

कोरोना वायरस की महामारी ने देश के लोगों को जिन नए शब्दों और अवधारणाओं से परिचित कराया उनमें एक जनता कर्फ्यू भी है। सोमवार को देश में लगाए गए पहले जनता कर्फ्यू की सालगिरह थी।

लोकतंत्र की रेटिंग का यदि बना देशी संस्करण…

बड़े आराम से कोई ऐसी शोध संस्था बनाई जा सकती है जो लोकतंत्र की रैंकिंग का देसी संस्करण जारी करने लगे। इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। मगर यह वैसा ही होगा जैसे हम नोबेल पुरस्कार अथवा ऑस्कर जैसा कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार शुरू कर दें। आप चाहें तो अपने पुरस्कार में दूसरों से ज्यादा पैसा दे सकते हैं और उसके लिए दूसरों से ज्यादा भव्य समारोह आयोजित कर सकते हैं।

Latest News

सत्य बोलो गत है!

‘राम नाम सत्य है’ के बाद वाली लाइन है ‘सत्य बोलो गत है’! भारत में राम से ज्यादा राम...