सब खलास, शिक्षा सर्वाधिक!

सत्य है मनुष्य जब है तो सब खत्म नहीं हुआ करता! फिर भारत तो 140 करोड़ लोगों की भीड़ है। उस नाते खत्म और खलास होने की बात में मेरा मतलब है कि जो इकट्ठा, संग्रहित था वह खलास। मैं नवंबर 2016 को भारत के 140 करोड लोगों का टर्निंग प्वांइट मानता हूं। तभी से लगातार लिख रहा हूं कि भारत का महा बरबादी काल प्रारंभ। लक्ष्मी की चंचलता खत्म सो भारत को वह श्राप, जिससे तय बरबादी। कोई न माने लेकिन गौर करें कि तभी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी गलती को अभूतपूर्व कामयाबी करार देने के लिए भक्त लंगूरों, आईटी टीम से ऐसा झूठ बनवाया कि पूरा देश ही झूठा हो गया। नोटबंदी से शुरू झूठ महामारी को भी ‘अवसर’ बना गया। तभी भारत का एकत्र सब, भारत की बचत, आर्थिकी, प्रगति, निर्माण, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, भारत की ऊर्जा याकि नौजवानी छीज-छीज कर खलास हुई। तभी कोरोना वायरस की महामारी आई तो उससे लड़ने के लिए हमारे पास कुछ नहीं था। हम पहले दिन से लेकर आज तक महामारी से लगातार झूठ में लड़ रहे हैं। यह भी पढ़ें: आर्थिकी भी खलास! यह भी पढ़ें: आधुनिक चिकित्सा पर शक! बारीकी से सोचें कि नवंबर 2016 से जून… Continue reading सब खलास, शिक्षा सर्वाधिक!

भारतः ये दो साल!

मई 2019 में नरेंद्र मोदी की दुबारा शपथ से पूर्व मैंने लिखा था- आज सवा सौ करोड़ लोगों के साथ में भी उस विमान में बैठा हूं, जिसके कप्तान नरेंद्र मोदी और उप कप्तान अमित शाह की कप्तानी में मेरी नियति बंधी है। तभी हम सबको, सवा सौ करोड़ लोगों को नए पांच साला सफर के टेकऑफ के लिए प्रार्थना करनी चाहिए कि यात्रा मंगलमय हो। मेरी और जिनकी भी जो आंशकाएं थी या हैं वह गलत साबित हों। अगले पांच साल दुनिया जाने कि हिंदुओं को वैश्विक सभ्य समाजों जैसा राज करना आता है। इसके लिए मैं कुर्सी की बेल्ट बांध छह महीने तक चुपचाप बैठे रहने की कोशिश करूंगा। मन ही मन प्रार्थना करूंगा कि टेकऑफ सही हो और सभी का पायलट के प्रति विश्वास बना रहे (24 मई 2019)। यह भी पढ़ें: गद्दी पर रहेंगे, शासन क्या करेंगे! मगर कुछ दिन बाद मुझे लॉरेंस फरलिंगटन की कविता पढ़ने को मिली और उसका हिंदी अनुवाद बना मैं लिख बैठा- भेड़, गड़ेरिया देश पर क्या रोएं? (4 जून 2019)। उस कविता की पंक्तियां हैं- दया करो ऐसे देश पर, जहां लोग भेड़ हैं और गड़ेरिया, जिन्हें गुमराह करता है दया करो देश पर, जिसके लीडर झूठे हैं और मनीषी… Continue reading भारतः ये दो साल!

ऐसे दो साल पहले कभी नहीं!

सन् 2019-20 के दो वर्षों की तुलना वाले वर्ष भारत के इतिहास में ढूंढे नहीं मिलेंगे। पहला तथ्य कि ये दो वर्ष जनता द्वारा छप्पर फाड़ जिताने के तुरंत बाद के हैं। आजाद भारत के इतिहास में नेहरू से ले कर डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ऐसा कभी नहीं हुआ कि इधर शपथ हुई और उसके बाद कलह ही कलह के काम! तर्क के नाते ठीक बात है कि जम्मू-कश्मीर से 370 हटाना, सीएए कानून, राम मंदिर निर्माण का काम मामूली नहीं है। इस नाते चाहे तो इन दो सालों को उपलब्धियों के अभूतपूर्व वर्ष कह सकते हैं। जो कोई नहीं कर पाया वह नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने कर दिया। तब जरा ठंडे दिल-विवेक से सोचें क्या कश्मीर समस्या का समाधान हो गया? क्या मुसलमान और पाकिस्तान ठंडे पड़ गए? सीएए बना तो क्या बांग्लादेशी भारत से बाहर जा रहे हैं? मंदिर बन रहा है तो क्या रामजी का आशीर्वाद बना है? इतना बड़ा काम है तो रामजी, शिवजी, लक्ष्मीजी क्यों भारत के हिंदुओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से रूष्ट हैं? ऐसा क्यों लग रहा है कि भारत से कोई बड़ा पाप हुआ है जो महामारी की सर्वाधिक मार हिंदुओं को झेलनी पड़ रही है? क्यों भाग्यशाली मोदी बदकिस्मती… Continue reading ऐसे दो साल पहले कभी नहीं!

गद्दी पर रहेंगे, शासन क्या करेंगे!

दूसरे कार्यकाल के दो साल पूरे होते-होते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वहीं स्थिति है, जो 2014 से पहले तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हो गई थी। वे अपने आखिरी तीन साल प्रधानमंत्री रहे यानी गद्दी पर बैठे रहे लेकिन शासन नहीं कर पाए। उन्होंने अगले तीन साल सिर्फ घटनाओं पर प्रतिक्रिया दी। हवा के साथ बहते रहे और अंत नतीजा कांग्रेस की ऐतिहासिक पराजय का निकला। यह भी पढ़ें: भारतः ये दो साल! नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा भी उसी नतीजे पर पहुंचेगी यह अभी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि मनमोहन सिंह के मुकाबले मोदी प्रो एक्टिव होकर स्थितियों को संभालने का प्रयास करेंगे। परंतु मोदी सरकार का घटनाओं पर अब नियंत्रण नहीं है। इकबाल भी धीरे धीरे खत्म हो रहा है। सरकार की साख और विश्वसनीयता सात साल में सबसे निचले स्तर पर है। पहली बार ऐसा हुआ है कि उनके समर्थकों के मन में भी अविश्वास पैदा है। कोराना वायरस का संक्रमण शुरू होने से पहले सब कुछ मोदी के कंट्रोल में दिख रहा था। लेकिन पहले संकट ने ही सब कुछ संभाल लेने की उनकी क्षमता पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया। वे कोरोना संकट को नहीं संभाल सके, देश का आर्थिक संकट उनके… Continue reading गद्दी पर रहेंगे, शासन क्या करेंगे!

राजनीतिक नुकसान के दो बरस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके गृह मंत्री अमित शाह को दूसरे कार्यकाल के दो बरस में जितना राजनीतिक नुकसान हुआ है उतना उनके पूरे राजनीतिक करियर में नहीं हुआ होगा। भाजपा ने पिछले दो साल में अपने कई राजनीतिक सहयोगी गंवा दिए। महाराष्ट्र में दशकों से भाजपा की सहयोगी रही शिव सेना ने उसका साथ छोड़ दिया। शिव सेना की तरह ही सबसे पुरानी सहयोगियों में से एक अकाली दल ने कृषि कानूनों और किसान आंदोलन के मुद्दे पर भाजपा का साथ छोड़ दिया। महाराष्ट्र में राजू शेट्टी, बिहार में उपेंद्र कुशवाहा, असम में हाग्राम मोहिलारी जैसे अनेक छोटे छोटे क्षत्रपों ने भाजपा का साथ छोड़ दिया। हो सकता है कि भाजपा को अभी इसके नुकसान का अंदाजा नहीं हो रहा हो पर आने वाले दिनों में सहयोगियों की कमी उसे परेशान करेगी। यह भी पढ़ें: भारतः ये दो साल! लोकसभा चुनाव जीतने के बाद अगस्त के महीने में अनुच्छेद 370 का फैसला कराने और नागरिकता कानून बदलवाने के बाद लग रहा था कि अब आगे कोई भी चुनाव जीतने से भाजपा को कोई नहीं रोक सकता है। लेकिन इन दोनों फैसलों के बाद दो राज्यों- महाराष्ट्र व हरियाणा में में विधानसभा के चुनाव हुए। भाजपा ने महाराष्ट्र की सत्ता… Continue reading राजनीतिक नुकसान के दो बरस

दुनिया में डंका बजने का मिथक टूटा

जिस तरह से दूसरे कार्यकाल के दो साल में घरेलू मोर्चे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अजेय होने और सब कुछ संभाल लेने वाले नेता की छवि टूटी और लोगों को लगा कि वे भी एक आम नेता की तरह हैं, जो किसी बड़े संकट में फेल हो सकते हैं तो उसी तरह दुनिया में डंका बजने का मिथक भी टूटा। ध्यान रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद अपने भाषणों से, उनकी पार्टी के आईटी सेल ने, उनके प्रवक्ताओं और समर्थकों ने यह प्रचार किया हुआ है कि पहली बार दुनिया में भारत की आवाज गंभीरता से सुनी जा रही है और यह मोदी की वजह से हुआ है। यह भी पढ़ें: भारतः ये दो साल! मोदी ने इसके लिए सबसे ज्यादा मेहनत की। अमेरिका के राष्ट्रपतियों से दोस्ती दिखाने से लेकर चीन के राष्ट्रपति को झूला झुलाने और रूस के राष्ट्रपति के साथ अनौपचारिक वार्ता करने तक सब कुछ किया। उन्होंने अपनी वैश्विक छवि चमकाने के लिए दुनिया भर के देशों को पीपीई किट्स, मास्क आदि भिजवाए और जब वैक्सीन बन कर आ गई तो अपने लोगों को लगवाने की बजाय दुनिया के कई देशों को अनुदान में बांटने लगे। लेकिन इन सबका अंत नतीजा यह है कि भारत… Continue reading दुनिया में डंका बजने का मिथक टूटा

झूठ को फिर भी शर्म नहीं!

मैं थक गया, सूख गई स्याही.. पर झूठ न हारा। सांसे फडफडा कर मर गई… पर झूठ न पसीजा। गिद्धों ने नौचा जिंदा इंसानों (मरीजों) को.. पर झूठ नहीं लजाया। लोभी-लालची बन गए नरपशु…पर झूठ नहीं कांपा। चिताओं से जल उठे श्मशान …पर झूठ नहीं जला। शवों पर टूट पड़े कुत्ते… पर झूठ नहीं ठिठका।… गंगा रो पड़ी लाशों से… पर झूठ नहीं रोया। देवता हुए रूष्ट… पर झूठ नहीं घबराया। दुनिया सन्न लावारिश देश के लावारिशों को देख…पर झूठ आंकड़ों से चिंघाडता हुआ। दुनिया दौडी आई..पर झूठ मगरूर। गरीब-गुरबे बिना कफन रेत में दबते हुए… पर झूठ को फिर भी शर्म नहीं! हां, झूठ ही है कलियुग! हिंदुओं की काल नियति! कलियुगी हिंदुओं की गुरूता का गरूर! …बिना बुद्धी, बिना लाज, बिना शर्म, बिना भावना, बिना संवेदना और बिना आंसू के। हे झूठमेव जयते का कलियुग… और भय-भक्ति, दासता, दीनता-हीनता, नरसंहार, लूट के सतत सफर के बाद 21वीं सदी के सन् इक्कीस में गंगा किनारे जा बने हिंदू जीवन की टायर-घासलेटी चिता के मुक्ति फोटो… क्या कोई विचलित? 33 करोड़ देवी-देवताओं के कलियुगी रूपों के लाखों मठाधीश साधू-संतों, करोड़ों भक्तों में क्या किसी की उफ! यह भी पढ़ें: कहां है पुण्यभूमि का गौरव मैं फिर लिखने लगा.. जबकि निश्चय… Continue reading झूठ को फिर भी शर्म नहीं!

साहेब तुम्हारे रामराज में..

सन् इक्कीस का राजा… महाबली, महा भाग्यवान। पर क्या सचमुच? राजा का भाग्य तो प्रजा का सुख होता है। राजा भाग्यवान होता तो भला वह हेडलाइन बनवाने में क्यों खपा होता?  क्यों राजा को लंगूरों की फौज की जरूरत होती? क्यों वह आंकड़े बनवाते हुए होता? राजा का भाग्य प्रजा से है, प्रजा का भाग्य अच्छे वक्त से है तो वक्त का अच्छा या बुरा होना क्या राजा के कर्मों का परिणाम नहीं? वक्त का कमाल देखिए कि जिस कवियत्री (पारुल खक्कर) को गुजरात के लोग भजन लेखन के लिए जानते थे, उन्होने वक्त की हकीकत पर सिर्फ चौदह लाईनों में मन के उद्गार लिखे और राजा का कथित भाग्य कंपकंपा गया। वे और उनके ट्रौल-लंगूर सैनिक उन पर टूट पड़े… यह मजाल।… पर सत्य तो सत्य। अपने आप कविता का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और पारूल खक्कर गुजरात में घर-घर चर्चित। उस कविता का यह हिंदी अनुवाद हैः एक साथ सब मुर्दे बोले ‘सब कुछ चंगा-चंगा’ साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा ख़त्म हुए शमशान तुम्हारे, ख़त्म काष्ठ की बोरी थके हमारे कंधे सारे, आँखें रह गई कोरी दर-दर जाकर यमदूत खेले मौत का नाच बेढंगा साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा नित लगातार जलती चिताएँ राहत माँगे… Continue reading साहेब तुम्हारे रामराज में..

जान से बड़ा कुछ भी नहीं

आपने भी सुना होगा अच्छा सोचो, शुभ-शुभ सोचो, पॉजिटिव बनो! बकौल मोहन भागवत…. जो चले गए वो एक तरह से मुक्त हो गए,….ये जीवन मरण का चक्र चलता रहता है, जैसे मनु्ष्य मैले और पुराने कपड़े त्याग कर नए कपड़े बदलता है, वैसे पुराना शरीर छोड़ कर नया शरीर धारण करके आता है….हम अपने मन को निगेटिव नहीं होने देंगे। हमें मन को पॉजिटिव रखना है!….. तो विचार करे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना लिखित कविता पर और उसकी इस पंक्ति पर- जो विवेक, खड़ा हो लाशों को टेक, वह अंधा है। देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों तो क्या तुम दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो? यदि हां तो मुझे तुम से कुछ नहीं कहना है। यह भी पढ़ें: कहां है पुण्यभूमि का गौरव देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता कि एक हिस्से के फट जाने पर बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें और नदियां, पर्वत, शहर, गांव वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें अनमने रहें। यदि तुम यह नहीं मानते तो मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना है।… Continue reading जान से बड़ा कुछ भी नहीं

राष्ट्र के नाम

सब कुछ राष्ट्र के नाम पर है। भारत को महान बनाने के नाम पर है। गंगा-बनारस सब देश का गौरव बढ़ाने के लिए हैं। लोगों का मरना भी राष्ट्र के लिए है। अस्पताल, दवा और टीके के लिए भटकना और इस तरह मरना कि अंतिम संस्कार भी न हो पाए और यह सब होने के बाद भी चुप रहना राष्ट्र के लिए है। आखिर लोगों की लाशों पर ही तो देश को महान बनना है फिर लाशें चाहे गंगा में बहाई जा रही हो या गंगा के किनारे दफनाई जा रही हो या महाश्मशान बने देश में सतत जल रही चिताओं पर जलाई जा रही हो। पिता के कंधे पर पड़ी 11 साल की बेटी की लाश हो या ऑटोरिक्शा में पत्नी की बाहों में दम तोड़ते पति की लाश हो, सब राष्ट्र के लिए हैं!  सारा झूठ भी राष्ट्र के लिए है और सारी अनैतिकता भी राष्ट्र के लिए ही है। गौर करें विभिन्न कवियों की रजनाओं के कुछ अंशों को यह भी पढ़ें: कहां है पुण्यभूमि का गौरव राष्ट्र के लिए आइए! हम सब एक साथ दवा के अभाव में मरें इस तरह कि अंतिम संस्कार भी न हो हम टीके के जाल में छटपटाएं अव्यवस्था में पटपटाएं… Continue reading राष्ट्र के नाम

कहां है पुण्यभूमि का गौरव

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के नीति-सिद्धांत का कोर बिंदु पुण्यभूमि के गौरव में है। हम और वे का पूरा सिद्धांत इस बात पर है कि भारत जिनकी मातृभूमि है उनकी पुण्यभूमि दूसरी जगह कैसे हो सकती है? फिर इस पुण्यभूमि की आज ऐसी हालत क्यों है? इस पुण्यभूमि पर कैसा संकट आया हुआ है और इस संकटकाल में जिनके ऊपर इसकी रक्षा का भार है वे क्या कर रहे हैं? इस महान गौरवशाली सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने वाले कहां हैं? साहिर ने आजादी के थोड़े समय बाद ही लिखा था- जरा मुल्क के रहबरों को बुलाओ, ये कूचे-ये गलियां-ये मंजर दिखाओ। आज फिर यह कहने का समय है। मुल्क के रहबरों को बाहर निकलना चाहिए। गंगा की रेती में दबी या गंगा की लहरों में डूबती-उतराती लाशों को देखना चाहिए। गलियों से उठते क्रंदन को सुनना चाहिए। अस्पतालों के अंदर-बाहर हो रही प्रार्थनाओं की आवाजें सुनने की कोशिश करनी चाहिए। इंसानियत के नाते नहीं तो अपनी पुण्यभूमि की रक्षा करने की जिम्मेदारी के नाते ही इसे बचाने की कोशिश करनी चाहिए। राष्ट्रकवि दिनकर ने आजादी से पहले और बाद में भी कई मौकों पर पुण्यभूमि के संकट का आख्यान लिखा और मुल्क के रहबरों व नागरिकों को ललकारते हुए उन्हें हकीकत… Continue reading कहां है पुण्यभूमि का गौरव

जिंदगीनामा ठहरा, ठिठका!

 ‘पंडित का जिंदगीनामा’ लिखना कोई साढ़े तीन महिने स्थगित रहा। ऐसा होना नहीं चाहिए था। आखिर जब मौत हवा में व्याप्त है तो जिंदगी पर  सोचना अधिक हो जाता है। तब स्मृति, आस्था, जिंदगी के गुजरे वक्त की याद ज्यादा कुनबुनाती है।

लंदनः समझदारी की पाठशाला

जिंदगी को समझने और जीने की अपनी तीसरी लोकेशन लंदन है। मैं जनसत्ता की तरफ से 1985 में पहली बार लंदन गया। वह मेरी पहली विदेश यात्रा थी।

दिल्ली की चौखटः मेरा और भारत का सार!

लोग मेरा अहोभाग्य कहेंगे जो मैं देश की चौखट दिल्ली में रहा। हां, दिल्ली का एक अर्थ दहलीज, चौखट भी है। इस चौखट में छुपा हैभारत का तिलिस्म! मैंने इसलोकेशन के तिलिस्म को भेदने की कोशिश मेंजिंदगी के 45 वर्ष जाया किए।

भोपालगंज

जिंदगी लोकेशन और पात्रों की भीड़ लिए होती है। आपकी भी होगी। अपनी लोकेशन को याद करेंगे तो जिंदगी के शहर, कॉलोनी, मोहल्ले फ्लैशबैक में दौड़ेंगे।

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