संस्थाएं जर्ज तो लोकतंत्र, आजादी ?

आजादी के अमृत महोत्सव का साल इस तरह नहीं शुरू होना चाहिए था। संसद का मॉनसून सत्र 13 अगस्त को खत्म होना था और उसी दिन से अमृत महोत्सव के कार्यक्रम शुरू होने थे।

CORONA Arrangements : जिनके पास ऑक्सीजन उनको ही रेमडेसिविर ..इस व्यवस्था पर दिल्ली हाइकोर्ट की केंद्र पर टिप्पणी

देश के नागरिकों का हमेशा से ही न्यायपालिका पर विश्वास रहा है और हो भी क्यों ना..न्यायपालिका ने हमेशा से ही अपना काम बखूबी किया है। तो आज भी इस मुश्किल दौर में भारत की न्यायपालिका इस विश्वास की डोर को मजबूती दे रही है। न्यायपालिका में जहां नरमी दिखाते हुए सरकारों को समझाया है तो वहीं जरूरत पड़ने पर सख्ती दिखाने से भी परहेज नहीं किया। इसी का ताजा उदाहरण है कि दिल्ली हाइकोर्ट ।  दिल्ली हाइकोर्ट ने देश के मौजूदा हालात पर केंद्र सरकार द्वारा किये गए फैसलों पर तल्ख टिप्पणी की है। दिल्ली हाइकोर्ट ने कहा है कि केंद्र चाहता है कि लोग मरते रहें क्योंकि Covid-19 के इलाज में रेमडेसिविर के इस्तेमाल को लेकर नए प्रोटोकॉल के मुताबिक केवल ऑक्सजीन पर आश्रित मरीजों को ही यह दवा दी जा सकती है। इसे भी पढ़ें UP News : योगी सरकार ने दिया निर्देश, अस्पतालों में ऑक्सीजन सप्लाई की कन्ट्रोल रूम से होगी निगरानी जिनके पास ऑक्सीजन नहीं उनके नसीब में रेमडेसिविर भी नहीं जस्टिस प्रतिभा एम सिंह ने केंद्र सरकार से कहा, ‘यह गलत है. ऐसा लगता है दिमाग का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं हुआ है। अब जिनके पास ऑक्सीजन की सुविधा नहीं है उन्हें रेमडेसिविर दवा नहीं मिलेगी।… Continue reading CORONA Arrangements : जिनके पास ऑक्सीजन उनको ही रेमडेसिविर ..इस व्यवस्था पर दिल्ली हाइकोर्ट की केंद्र पर टिप्पणी

राहुल को कमान संभालनी होगी!

अब राहुल गांधी के पास कोई विकल्प  नहीं है। उन्हे नेतृत्व संभालना होगा और दो टूक, लाउड मैसेज (कड़ा संदेश) देना होगा कि कोई नहीं बख्शा जाएगा! कानून कड़ाई से अपना काम करेगा। देश इस समय भारी अनिर्णय के दौर से गुजर रहा है। उसे नहीं मालूम किधर देखना है, किससे उम्मीद करना है। डरा हुआ समाज अपनी आवाज नहीं उठा सकता। उसे जो कहा जा रहा है कर रहा है। तुम्हारी किस्मत खराब है वह मान जाता है, 70 साल से कांग्रेस दोषी थी, सात साल से सिस्टम, वह मान जाता है। मौतें आक्सीजन की कमी से नहीं हो रहीं, मृत्यु को कौन रोक सकता है, वह मान जाता है। प्रचार तंत्र जो बता रहा है वह सब मान रहा है। उसकी बुद्धि, विवेक सब मीडिया ने हर ली है। मोदी, मोदी के नशे में उसे नहीं मालूम कि आगे कुआ है या खाई। उसके बच्चों का क्या होगा?  नौकरी का क्या होगा? तनखाएं और कितनी कम होंगी? नए कृषि कानूनों के बाद कल जब अनाज भी आक्सीजन की तरह मुनाफाखोरों के पास पहुंच जाएगा तो रोटी का क्या होगा? उसे कुछ नहीं मालूम! न वह मालूम करना चाहता है। उसे उम्मीद है कि हिन्दु, मुसलमान से सब समस्याओं… Continue reading राहुल को कमान संभालनी होगी!

आत्म-आलोचना की आवश्यकता

प्रधान न्यायाधीश एसए बोबड़े के रिटायर होने पर सोशल मीडिया में वायरल हुए एक कार्टून में ऊंची कूद के पैमाने (बार) को दिखाते हुए पिछले तीन प्रधान न्यायाधीशों को एक के बाद एक नीचे दिखाया गया। कमेंट में लिखा गया- लोवरिंग द बार- यानी मानदंड को नीचा करते हुए। बात सिर्फ कार्टून तक सीमित नहीं रही। देश के जाने-माने वकीलों और टीकाकारों ने अखबारों और वेबसाइटों पर लिखे अपने आलेखों में जस्टिस बोबड़े के कार्यकाल की आलोचना की। यहां तक कहा गया कि जस्टिस गोगोई के बाद अगर सोचा गया था कि न्यायपालिका में उससे ज्यादा गिरावट नहीं आ सकती, तो ये बात गलत साबित हुई। न्यायपालिका में ऐसी आलोचनाओं पर कोई गंभीर आत्म- आलोचना होगी, इसकी आज उम्मीद कम ही है। लेकिन अगर इस पर ध्यान दिया जाए, तो ये बात समझ में आएगी कि न्यायपालिका आज अपनी साख किस हद तक खो चुकी है। यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक बात होती है। इसलिए कि लोकतंत्र में लोगों की आखिरी उम्मीद न्यायपालिका पर टिकी होती है। लेकिन अगर ये धारणा बनने लगे कि न्यायपालिका उम्मीदों की कसौटी पर खरी नहीं उतर रही है, तो फिर समाज में ऐसा गुबार जमने लगता है, जैसाकि कुछ प्रेशर कुकर में ताप… Continue reading आत्म-आलोचना की आवश्यकता

अदालतों में अंग्रेजी की गुलामी

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भारत की न्याय-प्रणाली के बारे में ऐसी बातें कह दी हैं, जो आज तक किसी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ने नहीं कही। वे जबलपुर में न्यायाधीशों के एक समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कानून, न्याय और अदालतों के बारे में इतने पते की बातें यों ही नहीं कह दी हैं। वे स्वयं लगभग 50 साल पहले जब कानपुर से दिल्ली आए तो उन्होंने कानून की शिक्षा ली थी। राजनीति में आने के पहले वे खुद वकालत करते थे। उन्हें अदालतों के अंदरुनी दांव-पेंचों की जितनी जानकारी है, प्रायः कम ही नेताओं को होती है। उन्होंने सबसे पहली बात यह कही कि राज्यों के उच्च न्यायालय अपने फैसलों का अनुवाद प्रांतीय भाषाओं में करवाएं। उन्हीं के आग्रह पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसलों का अनुवाद हिंदी तथा कुछ अन्य भारतीय भाषाओं में करवाना शुरु कर दिया है। मैं तो कहता हूं कि सारी अदालतों के मूल फैसले ही हिंदी और उनकी अपनी भाषाओं में होने चाहिए और उनका अनुवाद, जरुरी हो तो, अंग्रेजी में होना चाहिए। यह तभी होगा, जबकि हमारी संसद और विधानसभाएं अपने कानून अपनी भाषा में बनाएं याने अपने आप को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करें। भारत—जैसे 60-70 पुराने गुलाम देशों के… Continue reading अदालतों में अंग्रेजी की गुलामी

अदालतों के गले में अंग्रेजी का फंदा

दुनिया के कई देशों में राजनीति शास्त्र पढ़ने और पढ़ाते वक्त हम कहते रहे हैं कि लोकतंत्र के तीन स्तंभ हैं— विधानपालिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका याने संसद, सरकार और अदालत। मैंने इसमें चौथा स्तंभ भी जोड़ दिया है।

जजों की बहाली क्यों नहीं हो रही?

भारत में कोरोना वायरस की वजह से ऐसा लग रहा है कि सब कुछ ठप्प पड़ा हुआ है। सेंट्रल विस्टा और नए संसद भवन के निर्माण के अलावा लग रहा है कि किसी और काम पर सरकार का ध्यान ही नहीं रहा

न्यायपालिका क्यों है निशाने पर?

भारत की सर्वोच्च न्यायपालिका के चार जजों की साझा प्रेस कांफ्रेंस के बाद न्यायपालिका पर संभवतः सबसे बड़ा हमला हुआ है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने सुप्रीम कोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्ठ जज के ऊपर आरोप लगाया है कि वे उनकी सरकार गिराने की साजिश में शामिल हैं।

पांच-छह लोगों की लॉबी न्यायपालिका के लिए खतरा

राज्यसभा सदस्य के तौर पर मनोनयन स्वीकार करने के बाद से आलोचनाओं का सामना कर रहे पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा है कि पांच-छह लोगों की एक लॉबी के शिकंजे की वजह से न्यायपालिका खतरे में है।

न्यायपालिका को कमजोर करने की कोशिश दुर्भाग्यपूर्ण: गहलोत

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केन्द्र सरकार पर न्यायपालिका को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एस मुरलीधर का स्थानांतरण

लैंगिक समानता के लिए उपाय करना जरूरी : सीजेआई

भारत के मुख्य न्यायाधीश् (सीजेआई) शरद अरविंद बोबडे ने आज कहा कि न्यायपालिका संवैधानिक मूल्यों की संरक्षक है और कानून के शासन की प्रतिबद्धता के साथ जनवादी ताकतों की सेवा करती है।

सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक ढांचे को किया मजबूत: कोविंद

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने देश में न्यायपालिका की प्रगतिवादी सोच की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए आज कहा कि उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों ने देश के कानूनी और संवैधानिक ढांचे को मजबूती प्रदान की है।

संविधान के तीनों स्तंभों ने देश को रास्ता दिखाया : मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज कहा कि तमाम चुनौतियों के बीच संविधान के तीनों स्तम्भों – न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका- ने संतुलन कायम रखते हुए देश को उचित रास्ता दिखाया है।

चीफ जस्टिस, गहलोत और सत्य!

आज सुप्रीम कोर्ट में हैदराबाद पुलिस एनकाउंटर पर सुनवाई है। मतलब न्याय के सत्व की परीक्षा। यह मामला 21वीं सदी में भारत की न्याय प्रक्रिया के औचित्य, साख को लिए हुए है। चीफ जस्टिस एसए बोबड़े ने जोधपुर हाईकोर्ट की इमारत के उद्घाटन में अपनी राय बताते हुए कहा है कि न्याय प्रतिशोध या बदला नहीं हो सकता।

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