इमरजेंसीः खामोख्याल विपक्ष

इमरजेंसी की घोषणा के साथ पहले से बनाई लिस्ट अनुसार रात में सोते हुए जितने नेताओं-कार्यकर्तार्ओं को गिरफ्तार किया गया था वहीं इमरजेंसी बंदियों का असली लब्बोलुआब है। घोषणा के अगले दिन सूरज निकला तो तब गिरफ्तार हुए अपने केसी की जुबानी का सत्य कि दिल्ली की सड़कों पर, जेपी के पटना में इमरजेंसी के खिलाफ कुत्ता भी भौंकता हुआ नहीं था! indira gandhi in 1975 अनुभव में इमरजेंसी दिखती नहीं थी। विपक्ष को सांप सूंघा हुआ था। न प्रदर्शन थे और न आंदोलन। सन् 1975-76 में देश की आबादी कोई 70 करोड़ थी। लेकिन इमरजेंसी के खिलाफ पर्चे बांटते पकड़े गए लोगों की संख्या थी सात हजार। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बीस महीने में एक लाख 40 हजार लोगों की गिरफ्तारी का अनुमान लगाया था। और पता है इनमें सर्वाधिक कौन थे? 40 हजार सिख थे। इनके बाद आनंदमार्गी, नक्सलियों-मार्क्सवादियों की संख्या थी। हां, सबसे बड़ी संख्या अकाल तख्त की तानाशाही के खिलाफ आवाज के चलते थी। अकालियों ने सर्वाधिक गिरफ्तारियां दी। ऐसा किसी हिंदू संगठन या आरएसएस से जेल भरने का आव्हान नहीं था। इमरजेंसी का मर्दानगी से विरोध पंजाब में सिखों का और केरल में सीपीएम के काडर का था, जबकि दिल्ली से लेकर बिहार के हिंदी भाषी… Continue reading इमरजेंसीः खामोख्याल विपक्ष

इमरजेंसी… मुझे दिखी नहीं!

जेएनयू और दिल्ली घूमते-देखते हुए लगा ही नहीं कुछ असामान्य है। जन-जीवन, आवाजाही और अखबार सब सामान्य। हां, अखबारों में विपक्ष और राजनीति की खबर ढूंढे नहीं मिलती थीं और न इमरजेंसी की खबर। मानों भारत बिना विपक्ष और राजनीति के हो। जेएनयू में बंदिश, घुटन जैसा कुछ महसूस नहीं हुआ। न ही सहपाठी छात्र-प्रोफेसर-स्टाफ उद्वेलित या बेचैन।…. जेएनयू की उन दिनों की याद से अब समझ आता है कि 26 जून 1975 से लेकर 10 जुलाई 1975 के पंद्रह दिनों में जो होना था वह हो गया। hari shankar vyas jindageenama : छब्बीस जून 1975 का वह दिन…मैं तब भीलवाड़ा में था। जेएनयू में दाखिले की तैयारी करता हुआ। जुलाई में दिल्ली आया और अपने जिले के एमफिल छात्रों रविंद्र व्यास, नंदलाल गुर्जर और राजस्थान से ही आए प्रो. कुरैशी की मदद व पिछड़े इलाके जैसी कसौटी से दाखिला हुआ। गंगा हॉस्टल में कमरा नंबर 317 रहने का ठिकाना। तीसरे फ्लोर पर सामने सीताराम येचुरी का कमरा था।…तब नए-पुराने दोनों कैंपस मुर्दनगी में शांत से लगे। उन दिनों भीड़ वैसे भी नहीं थी और मेरे जैसे, छोटे शहर के छोटे कॉलेज से आए छात्र के लिए भव्य, मगर खाली-खाली इमारतों में सामान्य हलचल हैरान करने वाली थी। आबोहवा में… Continue reading इमरजेंसी… मुझे दिखी नहीं!

फ्लैशबैक में, लम्हों की खता!

ख्याल कौंधा है कि महामारी काल में जो ठहराव है वैसा अपने अनुभव में पहले कब था? दूसरा सवाल है कि ठहरे वक्त की किंकर्तव्यविमूढ़ता में पुरानी घटनाओं को फ्लैशबैक में टटोलें तो क्या निकलेगा? … आजाद भारत के इतिहास में सिर्फ छह-सात क्षण हैं, घटनाएं हैं जो 75 साल का कुल अनुभव हैं। कौन सी हैं ये घटनाएं? एक, चीन से हार। दो, बांग्लादेश जीत। तीन, इमरजेंसी। चार, ब्लूस्टार ऑपरेशन। पांच, नरसिंह राव की अर्थ क्रांति। छह, अयोध्या में मस्जिद ध्वंस। सात, मंडल आयोग। आठ, कोविड-19 महामारी। पंडित का जिंदगीनामा: लंदनः समझदारी की पाठशाला पंडित का जिंदगीनामा-18:  ( hari shankar vyas ) महामारी काल….. अनिश्चित जिंदगी और उसे छोटा बनाता समय! तभी मुझे जीवन के उत्तरार्ध में वक्त को यादों में गुनगुनाते हुए होना चाहिए। जिंदगीनामा लिखते जाना चाहिए। लेकिन मैं भटका हूं! मान नहीं रहा हूं कि अखबारी सुर्खियों के खटराग में कुछ नहीं है। हिंदुओं का कलियुग कभी खत्म नहीं होगा। हमारे जीवन में देवत्व, आजादी, निर्भीकता, सत्यता और वह सभ्यता, वह सतयुग खिल ही नहीं सकता जो पशुता-एनिमल फार्म से दीगर पृथ्वी के कई मानवों का विकास है। यही सोचते हुए दिमाग फिर जिंदगी पर लिखने को कुलबुला रहा है। क्यों नहीं कुछ दिन दिमाग में… Continue reading फ्लैशबैक में, लम्हों की खता!

सब खलास, शिक्षा सर्वाधिक!

सत्य है मनुष्य जब है तो सब खत्म नहीं हुआ करता! फिर भारत तो 140 करोड़ लोगों की भीड़ है। उस नाते खत्म और खलास होने की बात में मेरा मतलब है कि जो इकट्ठा, संग्रहित था वह खलास। मैं नवंबर 2016 को भारत के 140 करोड लोगों का टर्निंग प्वांइट मानता हूं। तभी से लगातार लिख रहा हूं कि भारत का महा बरबादी काल प्रारंभ। लक्ष्मी की चंचलता खत्म सो भारत को वह श्राप, जिससे तय बरबादी। कोई न माने लेकिन गौर करें कि तभी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी गलती को अभूतपूर्व कामयाबी करार देने के लिए भक्त लंगूरों, आईटी टीम से ऐसा झूठ बनवाया कि पूरा देश ही झूठा हो गया। नोटबंदी से शुरू झूठ महामारी को भी ‘अवसर’ बना गया। तभी भारत का एकत्र सब, भारत की बचत, आर्थिकी, प्रगति, निर्माण, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, भारत की ऊर्जा याकि नौजवानी छीज-छीज कर खलास हुई। तभी कोरोना वायरस की महामारी आई तो उससे लड़ने के लिए हमारे पास कुछ नहीं था। हम पहले दिन से लेकर आज तक महामारी से लगातार झूठ में लड़ रहे हैं। यह भी पढ़ें: आर्थिकी भी खलास! यह भी पढ़ें: आधुनिक चिकित्सा पर शक! बारीकी से सोचें कि नवंबर 2016 से जून… Continue reading सब खलास, शिक्षा सर्वाधिक!

भारतः ये दो साल!

मई 2019 में नरेंद्र मोदी की दुबारा शपथ से पूर्व मैंने लिखा था- आज सवा सौ करोड़ लोगों के साथ में भी उस विमान में बैठा हूं, जिसके कप्तान नरेंद्र मोदी और उप कप्तान अमित शाह की कप्तानी में मेरी नियति बंधी है। तभी हम सबको, सवा सौ करोड़ लोगों को नए पांच साला सफर के टेकऑफ के लिए प्रार्थना करनी चाहिए कि यात्रा मंगलमय हो। मेरी और जिनकी भी जो आंशकाएं थी या हैं वह गलत साबित हों। अगले पांच साल दुनिया जाने कि हिंदुओं को वैश्विक सभ्य समाजों जैसा राज करना आता है। इसके लिए मैं कुर्सी की बेल्ट बांध छह महीने तक चुपचाप बैठे रहने की कोशिश करूंगा। मन ही मन प्रार्थना करूंगा कि टेकऑफ सही हो और सभी का पायलट के प्रति विश्वास बना रहे (24 मई 2019)। यह भी पढ़ें: गद्दी पर रहेंगे, शासन क्या करेंगे! मगर कुछ दिन बाद मुझे लॉरेंस फरलिंगटन की कविता पढ़ने को मिली और उसका हिंदी अनुवाद बना मैं लिख बैठा- भेड़, गड़ेरिया देश पर क्या रोएं? (4 जून 2019)। उस कविता की पंक्तियां हैं- दया करो ऐसे देश पर, जहां लोग भेड़ हैं और गड़ेरिया, जिन्हें गुमराह करता है दया करो देश पर, जिसके लीडर झूठे हैं और मनीषी… Continue reading भारतः ये दो साल!

ऐसे दो साल पहले कभी नहीं!

सन् 2019-20 के दो वर्षों की तुलना वाले वर्ष भारत के इतिहास में ढूंढे नहीं मिलेंगे। पहला तथ्य कि ये दो वर्ष जनता द्वारा छप्पर फाड़ जिताने के तुरंत बाद के हैं। आजाद भारत के इतिहास में नेहरू से ले कर डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ऐसा कभी नहीं हुआ कि इधर शपथ हुई और उसके बाद कलह ही कलह के काम! तर्क के नाते ठीक बात है कि जम्मू-कश्मीर से 370 हटाना, सीएए कानून, राम मंदिर निर्माण का काम मामूली नहीं है। इस नाते चाहे तो इन दो सालों को उपलब्धियों के अभूतपूर्व वर्ष कह सकते हैं। जो कोई नहीं कर पाया वह नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने कर दिया। तब जरा ठंडे दिल-विवेक से सोचें क्या कश्मीर समस्या का समाधान हो गया? क्या मुसलमान और पाकिस्तान ठंडे पड़ गए? सीएए बना तो क्या बांग्लादेशी भारत से बाहर जा रहे हैं? मंदिर बन रहा है तो क्या रामजी का आशीर्वाद बना है? इतना बड़ा काम है तो रामजी, शिवजी, लक्ष्मीजी क्यों भारत के हिंदुओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से रूष्ट हैं? ऐसा क्यों लग रहा है कि भारत से कोई बड़ा पाप हुआ है जो महामारी की सर्वाधिक मार हिंदुओं को झेलनी पड़ रही है? क्यों भाग्यशाली मोदी बदकिस्मती… Continue reading ऐसे दो साल पहले कभी नहीं!

गद्दी पर रहेंगे, शासन क्या करेंगे!

दूसरे कार्यकाल के दो साल पूरे होते-होते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वहीं स्थिति है, जो 2014 से पहले तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हो गई थी। वे अपने आखिरी तीन साल प्रधानमंत्री रहे यानी गद्दी पर बैठे रहे लेकिन शासन नहीं कर पाए। उन्होंने अगले तीन साल सिर्फ घटनाओं पर प्रतिक्रिया दी। हवा के साथ बहते रहे और अंत नतीजा कांग्रेस की ऐतिहासिक पराजय का निकला। यह भी पढ़ें: भारतः ये दो साल! नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा भी उसी नतीजे पर पहुंचेगी यह अभी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि मनमोहन सिंह के मुकाबले मोदी प्रो एक्टिव होकर स्थितियों को संभालने का प्रयास करेंगे। परंतु मोदी सरकार का घटनाओं पर अब नियंत्रण नहीं है। इकबाल भी धीरे धीरे खत्म हो रहा है। सरकार की साख और विश्वसनीयता सात साल में सबसे निचले स्तर पर है। पहली बार ऐसा हुआ है कि उनके समर्थकों के मन में भी अविश्वास पैदा है। कोराना वायरस का संक्रमण शुरू होने से पहले सब कुछ मोदी के कंट्रोल में दिख रहा था। लेकिन पहले संकट ने ही सब कुछ संभाल लेने की उनकी क्षमता पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया। वे कोरोना संकट को नहीं संभाल सके, देश का आर्थिक संकट उनके… Continue reading गद्दी पर रहेंगे, शासन क्या करेंगे!

राजनीतिक नुकसान के दो बरस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके गृह मंत्री अमित शाह को दूसरे कार्यकाल के दो बरस में जितना राजनीतिक नुकसान हुआ है उतना उनके पूरे राजनीतिक करियर में नहीं हुआ होगा। भाजपा ने पिछले दो साल में अपने कई राजनीतिक सहयोगी गंवा दिए। महाराष्ट्र में दशकों से भाजपा की सहयोगी रही शिव सेना ने उसका साथ छोड़ दिया। शिव सेना की तरह ही सबसे पुरानी सहयोगियों में से एक अकाली दल ने कृषि कानूनों और किसान आंदोलन के मुद्दे पर भाजपा का साथ छोड़ दिया। महाराष्ट्र में राजू शेट्टी, बिहार में उपेंद्र कुशवाहा, असम में हाग्राम मोहिलारी जैसे अनेक छोटे छोटे क्षत्रपों ने भाजपा का साथ छोड़ दिया। हो सकता है कि भाजपा को अभी इसके नुकसान का अंदाजा नहीं हो रहा हो पर आने वाले दिनों में सहयोगियों की कमी उसे परेशान करेगी। यह भी पढ़ें: भारतः ये दो साल! लोकसभा चुनाव जीतने के बाद अगस्त के महीने में अनुच्छेद 370 का फैसला कराने और नागरिकता कानून बदलवाने के बाद लग रहा था कि अब आगे कोई भी चुनाव जीतने से भाजपा को कोई नहीं रोक सकता है। लेकिन इन दोनों फैसलों के बाद दो राज्यों- महाराष्ट्र व हरियाणा में में विधानसभा के चुनाव हुए। भाजपा ने महाराष्ट्र की सत्ता… Continue reading राजनीतिक नुकसान के दो बरस

दुनिया में डंका बजने का मिथक टूटा

जिस तरह से दूसरे कार्यकाल के दो साल में घरेलू मोर्चे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अजेय होने और सब कुछ संभाल लेने वाले नेता की छवि टूटी और लोगों को लगा कि वे भी एक आम नेता की तरह हैं, जो किसी बड़े संकट में फेल हो सकते हैं तो उसी तरह दुनिया में डंका बजने का मिथक भी टूटा। ध्यान रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद अपने भाषणों से, उनकी पार्टी के आईटी सेल ने, उनके प्रवक्ताओं और समर्थकों ने यह प्रचार किया हुआ है कि पहली बार दुनिया में भारत की आवाज गंभीरता से सुनी जा रही है और यह मोदी की वजह से हुआ है। यह भी पढ़ें: भारतः ये दो साल! मोदी ने इसके लिए सबसे ज्यादा मेहनत की। अमेरिका के राष्ट्रपतियों से दोस्ती दिखाने से लेकर चीन के राष्ट्रपति को झूला झुलाने और रूस के राष्ट्रपति के साथ अनौपचारिक वार्ता करने तक सब कुछ किया। उन्होंने अपनी वैश्विक छवि चमकाने के लिए दुनिया भर के देशों को पीपीई किट्स, मास्क आदि भिजवाए और जब वैक्सीन बन कर आ गई तो अपने लोगों को लगवाने की बजाय दुनिया के कई देशों को अनुदान में बांटने लगे। लेकिन इन सबका अंत नतीजा यह है कि भारत… Continue reading दुनिया में डंका बजने का मिथक टूटा

धीरज धरें, विध्वंस से बनेगी ‘भारत’ चिंता!

थाली बजाओ, मोदी भगाओ-3: भारत पहले या मोदी पहले? हिंदू पहले या मोदी पहले? सत्य पहले या झूठ पहले? मुर्दा कौम पहले या जिंदा कौम?.. इन सबमें फिलहाल हम मोदी पहले, मुर्दा कौम पहले वाली मनोदशा में जीते हुए हैं। इसलिए अंधेरी गुफा का अंत दिखाई नहीं देता। लोग झूठ, मुगालतों की संतुष्टि से अंधेरी गुफा में मजे से हैं। किसी को तबाही, महामारी, दिवालिया आर्थिकी, दुश्मन की घात, अंदरूनी बिखराव, टकराव, जर्जरता, बंगाल-तमिलनाडु जैसी उप राष्ट्रीयताओं का सुलगना, देशद्रोहियों बनाम देशभक्तों की पानीपत लड़ाई के मैदान का सिनेरियो नहीं दिख रहा है। भारत, भारत माता नहीं, बल्कि मोदी प्रथम हैं तो जाहिर है उनके बनवाए प्रोपेगेंडा से स्वभाविक तौर पर सब ठीक है। ताली-थाली-दीये, गोबर, गोमूत्र, रामदेव से हम कोरोना पर विजयी हैं। इसी झूठ में हम लगातार संक्रमित रहेंगे, मरेंगे। सवाल है कब तक ऐसा रहेगा? पता नहीं। सचमुच यह किसी को अहसास नहीं है कि अंधकार, झूठ का सफर करते-करते भारत अब कगार के उस बिंदु पर खड़ा है, जिससे ज्योंहि पांव फिसला कि हम वेनेजुएला जैसे दिवालिया होंगे और उसके आगे के साये में कथित देशभक्तों बनाम कथित देशद्रोहियों की लड़ाई में भारत सीरियाई गृहयुद्ध से कम दुर्दशा लिए हुए नहीं होगा। भारत प्रथम की सोच… Continue reading धीरज धरें, विध्वंस से बनेगी ‘भारत’ चिंता!

हिंदू जब मोदी से रोशन तो थाली…?

थाली बजाओ, मोदी भगाओ!-2: हां, बहुत हुआ मोदी और छोड़ो गद्दी की चाहना वाले लोग भूल रहे हैं कि बरबादी के खंडहर, लाशों के ढेर के बावजूद भक्त हिंदू प्रधानमंत्री मोदी से वह सुरक्षा, वह संतोष लिए हुए हैं, जो विकास-आधुनिकता, मानवीयता, राष्ट्र-राज्य की कसौटियों में भले पांवों पर कुल्हाड़ी है लेकिन मुर्दा कौम के लिए दर्प व गौरव की बात है। समझें कि संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने महामारी में लोगों की मौत को मुक्ति बता कर मोदी की लीडरशीप के सौ खून माफ की जैसी जो एप्रोच दर्शाई है वही पढ़े-लिखे, डॉक्टर, हिंदुओं का गोबर कैंप में शरीर पर गोबर लेप से कोरोना पर विजय के हुंकारे में भी भाव है। सब मोदी काल में हिंदू संस्कृति के रोशन होने, उसकी गौरव गाथा से इतने  गद्गद् कि सौ खून माफ! हैं। मोदी और मोदीकाल मतलब गाय, गोबर, गोमूत्र और हिंदू संस्कृति की वैश्विक कीर्ति। यह भक्तों का भाव है। दूसरे भले इसे विकार मानें। मसला क्या सही और क्या गलत का नहीं है, बल्कि कौम-नस्ल के मनोविज्ञान का है। यह भी पढ़ें: थाली बजाओ, मोदी भगाओ! मुर्दा कौम का मुर्दा ख्याल! यह भी पढ़ें: कलियुगी वज्रमूर्खता, गधेड़ापन! भक्त लोग मानते हैं कि गोबर, रामदेव, नरेंद्र मोदी आदि… Continue reading हिंदू जब मोदी से रोशन तो थाली…?

थाली बजाओ, मोदी भगाओ! मुर्दा कौम का मुर्दा ख्याल!

सवेरे-सवेरे सुनने को मिला- देशवासियों 30 मई 2021, रविवार का दिन। सब सुबह 11 बजे थाली बजा कर प्रधानमंत्री ‘गो बैक,’ ‘गो प्रधानमंत्री गो’, बोलो। मोदी की दुबारा शपथ के दो साल पूरे होने के दिन थाली बजाओ और हैशटेग चलाओ- मोदी भगाओ। जो कि झूठा है, झूठी बातें करता है! कोरोना से मरना है तो मर जाएंगे लेकिन आपकी कमान में नहीं।…..जाहिर है सोशल मीडिया का यह वीडियो दुखी नागरिक का है। उसके दुख-पीड़ा-गुस्से के दसियों कारण हो सकते हैं। लेकिन मुझे इस नागरिक की समझ पर वैसी ही तरस आई जैसे पिछले साल नरेंद्र मोदी के इस आह्वान पर कि थाली, ताली बजाओ, कोरोना भगाओ!…. माना कि कवि दुष्यंत कुमार ने कहां है कि ‘कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों’।  तो बेचारा दुखी नागरिक लोगों से तबियत से थाली बजाने के लिए कहे तो क्या मीनमेख निकालना! यह भी पढ़ें: एक थे शास्त्री, एक हैं मोदी: दो विपदा, दो प्रधानमंत्री ! यह भी पढ़ें: कलियुगी वज्रमूर्खता, गधेड़ापन! दिक्कत यह कि वह किससे कह रहा है और वह खुद क्या है? वह भी तो उस मुर्दा कौम का अंश है, जिस पर झुंझला कर दुष्यंत कुमार ने लिखा होगा… Continue reading थाली बजाओ, मोदी भगाओ! मुर्दा कौम का मुर्दा ख्याल!

झूठ को फिर भी शर्म नहीं!

मैं थक गया, सूख गई स्याही.. पर झूठ न हारा। सांसे फडफडा कर मर गई… पर झूठ न पसीजा। गिद्धों ने नौचा जिंदा इंसानों (मरीजों) को.. पर झूठ नहीं लजाया। लोभी-लालची बन गए नरपशु…पर झूठ नहीं कांपा। चिताओं से जल उठे श्मशान …पर झूठ नहीं जला। शवों पर टूट पड़े कुत्ते… पर झूठ नहीं ठिठका।… गंगा रो पड़ी लाशों से… पर झूठ नहीं रोया। देवता हुए रूष्ट… पर झूठ नहीं घबराया। दुनिया सन्न लावारिश देश के लावारिशों को देख…पर झूठ आंकड़ों से चिंघाडता हुआ। दुनिया दौडी आई..पर झूठ मगरूर। गरीब-गुरबे बिना कफन रेत में दबते हुए… पर झूठ को फिर भी शर्म नहीं! हां, झूठ ही है कलियुग! हिंदुओं की काल नियति! कलियुगी हिंदुओं की गुरूता का गरूर! …बिना बुद्धी, बिना लाज, बिना शर्म, बिना भावना, बिना संवेदना और बिना आंसू के। हे झूठमेव जयते का कलियुग… और भय-भक्ति, दासता, दीनता-हीनता, नरसंहार, लूट के सतत सफर के बाद 21वीं सदी के सन् इक्कीस में गंगा किनारे जा बने हिंदू जीवन की टायर-घासलेटी चिता के मुक्ति फोटो… क्या कोई विचलित? 33 करोड़ देवी-देवताओं के कलियुगी रूपों के लाखों मठाधीश साधू-संतों, करोड़ों भक्तों में क्या किसी की उफ! यह भी पढ़ें: कहां है पुण्यभूमि का गौरव मैं फिर लिखने लगा.. जबकि निश्चय… Continue reading झूठ को फिर भी शर्म नहीं!

साहेब तुम्हारे रामराज में..

सन् इक्कीस का राजा… महाबली, महा भाग्यवान। पर क्या सचमुच? राजा का भाग्य तो प्रजा का सुख होता है। राजा भाग्यवान होता तो भला वह हेडलाइन बनवाने में क्यों खपा होता?  क्यों राजा को लंगूरों की फौज की जरूरत होती? क्यों वह आंकड़े बनवाते हुए होता? राजा का भाग्य प्रजा से है, प्रजा का भाग्य अच्छे वक्त से है तो वक्त का अच्छा या बुरा होना क्या राजा के कर्मों का परिणाम नहीं? वक्त का कमाल देखिए कि जिस कवियत्री (पारुल खक्कर) को गुजरात के लोग भजन लेखन के लिए जानते थे, उन्होने वक्त की हकीकत पर सिर्फ चौदह लाईनों में मन के उद्गार लिखे और राजा का कथित भाग्य कंपकंपा गया। वे और उनके ट्रौल-लंगूर सैनिक उन पर टूट पड़े… यह मजाल।… पर सत्य तो सत्य। अपने आप कविता का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और पारूल खक्कर गुजरात में घर-घर चर्चित। उस कविता का यह हिंदी अनुवाद हैः एक साथ सब मुर्दे बोले ‘सब कुछ चंगा-चंगा’ साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा ख़त्म हुए शमशान तुम्हारे, ख़त्म काष्ठ की बोरी थके हमारे कंधे सारे, आँखें रह गई कोरी दर-दर जाकर यमदूत खेले मौत का नाच बेढंगा साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा नित लगातार जलती चिताएँ राहत माँगे… Continue reading साहेब तुम्हारे रामराज में..

जान से बड़ा कुछ भी नहीं

आपने भी सुना होगा अच्छा सोचो, शुभ-शुभ सोचो, पॉजिटिव बनो! बकौल मोहन भागवत…. जो चले गए वो एक तरह से मुक्त हो गए,….ये जीवन मरण का चक्र चलता रहता है, जैसे मनु्ष्य मैले और पुराने कपड़े त्याग कर नए कपड़े बदलता है, वैसे पुराना शरीर छोड़ कर नया शरीर धारण करके आता है….हम अपने मन को निगेटिव नहीं होने देंगे। हमें मन को पॉजिटिव रखना है!….. तो विचार करे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना लिखित कविता पर और उसकी इस पंक्ति पर- जो विवेक, खड़ा हो लाशों को टेक, वह अंधा है। देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों तो क्या तुम दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो? यदि हां तो मुझे तुम से कुछ नहीं कहना है। यह भी पढ़ें: कहां है पुण्यभूमि का गौरव देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता कि एक हिस्से के फट जाने पर बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें और नदियां, पर्वत, शहर, गांव वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें अनमने रहें। यदि तुम यह नहीं मानते तो मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना है।… Continue reading जान से बड़ा कुछ भी नहीं

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